December 10, 2016

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संगीत का आठवां सुर

भारतीय संगीत परंपरा में सुब्बुलक्ष्मी का नाम शीर्ष पर है। संगीत में सात सुर होते हैं, लेकिन उनके योगदान को देखते हुए उन्हें ‘आठवें सुर’ की संज्ञा दी गई। भारत सरकार के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से भी उन्हें नवाजा गया। उनकी जन्मशती पर उन्हें याद कर रहे हैं रघुवीर सिंह।

Author नई दिल्ली | November 6, 2016 01:17 am
सुब्बुलक्ष्मी ।

मंदिरों के शहर मदुरै के एक मंदिर में देवकन्या के रूप में जन्मी कुजम्मा का सारा जीवन उतारों-चढ़ावों से भरा रहा। जिस शहर से उनकी सांसें शुरू हुई थीं, वहीं से उनका नाम शुरू हुआ- मदुरै षण्मुखवडिवु सुब्बुलक्ष्मी, यानी एमएस सुब्बुलक्ष्मी। आगे चलकर उन्हें देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा गया। ब्रिटिश राज की मद्रास प्रेसीडेंसी (अब तमिलनाडु) में देवदासी परिवार में जन्मी सुब्बुलक्ष्मी की मां षण्मुखवडिवु वीणा वादक और नानी अक्काम्मल वायलिन वादक थीं। घर के पास में ही मीनाक्षी मंदिर का भक्ति से सराबोर वातावरण और परिवार में संगीत का माहौल था। मदुरै मंदिर में कुजम्भा के लिए कुजम्मा को सजाया जाता। उनके लंबे बाल बाल्टी को उल्टा करके उस पर फैला कर सुखाए जाते। उन्हें सुगंधित किया जाता। कांजीवरम की रेशमी साड़ी से सज्जित कर उन्हें नाक-कान में हीरे जड़े आभूषण पहनाए जाते, मानो वह देवी रूप हों। लेकिन उस समय भी उन्हें लगता कि देवी का असली रूप उनका शृंगार नहीं, उनकी अंतर्वृत्ति से, उनकी पवित्रता से है। महज आठ वर्ष की कुजम्मा ने कुम्बाकोनम में महामहम उत्सव के दौरान अपने पहले ही जन कार्यक्रम में संगीत विद्वानों और रसिकों को सोचने पर विवश कर दिया और आखिरकार वह कर्नाटक संगीत का पर्याय बन गर्इं।

सुब्बुलक्ष्मी के मस्तिष्क में कर्नाटक संगीत के स्वर संगीताचार्य शेम्मंगुडी श्रीनिवास अय्यर ने पिरोए और हिंदुस्तानी संगीत की सरगम नारायण राव व्यास ने। महज दस वर्ष की आयु में सुब्बुलक्ष्मी ने अपना पहला डिस्क रिकॉर्ड कराया, तो उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक संगीत जगत में हलचल मच गई। वह आगे की तालीम के लिए मद्रास संगीत अकादमी चली गर्इं। वहां सिर्फ सत्रह साल की उम्र में उन्होंने अपनी प्रस्तुतियों से श्रेष्ठ गायिका के रूप में नाम दर्ज कराया और गायन के क्षेत्र में पुरुष वर्ग के वर्चस्व को चुनौती दी। तब तक भारतीय संगीत में पुरुष गायकों का ही दबदबा था, लेकिन सुब्बुलक्ष्मी ने उस परंपरा को तोड़ा। उनकी मातृभाषा कन्नड़ थी, लेकिन जब उनके कंठ से स्वर निकले तो भाषाओं के बंधनों से मुक्त हो गए।

तमिल, मलयालम, तेलुगु, हिंदी, संस्कृत, बंगाली, गुजराती, पंजाबी- सभी भाषाओं के गीत उनकी मधुर आवाज में सजे। सुब्बुलक्ष्मी ने फिल्मों में अभिनय भी किया, लेकिन वहां भी भक्ति के संस्कार उनसे नहीं छूटे। 1945 में तमिल और हिंदी में बनाई गई फिल्म ‘भक्त मीरा’ में उन्होंने ऐसी यादगार भूमिका निभाई, मानो भक्तिकाल की मीरा ने आधुनिक काल में परदे पर जन्म लिया हो। उन्होंने मीरा के भजनों को अपने सुरों में पिरोया, जिनसे वह पूरे देश में प्रसिद्ध हो गई। सुब्बुलक्ष्मी की अन्य फिल्मों में ‘सेवा सदनम’ तथा ‘सावित्री’ भी भक्ति-भाव की पृष्ठभूमि पर आधारित थीं।

इन फिल्मों में अभिनय के बाद सुब्बुलक्ष्मी को महसूस हुआ कि उनका जन्म तो गायन के लिए ही हुआ है। एक बार उन्होंने कहा भी था, ‘प्रारम्भ से मेरे मन में अपने संगीत के संबंध में यह भावना थी कि मेरे संगीत को सुनकर मुरझाए हुए चेहरों पर भी परमानंद की झलक दिखाई दे।’1936 में सुब्बुलक्ष्मी स्वतंत्रता सेनानी सदाशिवम से मिलीं और 1940 में उनकी जीवन संगिनी बन गर्इं। सदाशिवम की पहली पत्नी से एक पुत्र विजी तथा पुत्री राधा थी, जिन्हें सुब्बुलक्ष्मी ने अपने बच्चों जैसा लालन-पालन दिया। इन दोनों बच्चों के अलावा, सुब्बुलक्ष्मी ने सदाशिवम की अनाथ भतीजी थंगम को भी पालना स्वीकार किया। बच्चे उनको बहुत प्यार करते थे और उन्हें ‘अमू पट्टी’ कहते थे। उनकी अपनी कोई संतान नहीं हुई। सुब्बुलक्ष्मी संगीत में अपनी ख्याति के लिए हमेशा पति सदाशिवम का आभार मानती रहीं।

इस बात को स्वीकार करते हुए उन्होंने एक बार कहा था- ‘यदि मुझे अपने पति से मार्गदर्शन और सहायता नहीं मिली होती, तो मैं इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती।’ दरअसल, गांधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी होने के बावजूद सदाशिवम ने जब से सुब्बुलक्ष्मी का हाथ थामा, ऐसा कोई प्रयत्न शेष नहीं छोड़ा, जिससे सुब्बुलक्ष्मी की ख्याति दिनों-दिन बढ़ती न रहे। उन्होंने सुब्बुलक्ष्मी की गायन सभाओं का इस प्रकार आयोजन कराया कि वह सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ती चली गर्इं और उनको ‘नाइटेंगिल आॅफ इंडिया’ कहा जाने लगा। उनसे पहले यह खिताब केवल सरोजिनी नायडू को हासिल था। रामधुन और भक्ति संगीत को गाने की प्रेरणा भी सुब्बुलक्ष्मी को सदाशिवम से ही मिली थी।

महात्मा गांधी का प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जो पीर पराई जाने रे’ गाकर सुब्बुलक्ष्मी ‘तपस्विनी’ बन गई थीं। वह जब यह भजन गातीं, तो श्रोताओं पर जादू-सा छा जाता। उन्होंने मीरा के भी अनेक भजन गाए। गांधीजी को तो उनकी आवाज में मीरा का एक भजन इतना अच्छा लगा कि उन्होंने कहा- ‘अगर सुब्बुलक्ष्मी ‘ हरि, तुम हरो जन की पीर’, इस मीरा भजन को गाने के बजाय बोल भी दें, तब भी मुझको यह भजन किसी और के गाने से अधिक सुरीला लगेगा।’ राजगोपालाचारी की रचना ‘कोराईओन रूम इल्लई’, ‘विष्णु सहस्रनाम’और ‘हनुमान चालीसा’ भी उनके मधुर कंठ से निकले स्वरों में सजकर भक्ति-यज्ञ में आहुति देते रहे हैं। सुब्बुलक्ष्मी ने लंदन, न्यूयार्क,मास्को ,कनाडा आदि स्थानों पर भी अपने गायन से भारतीय संगीत के स्वरों का जादू बिखेरा। 1966 में सुब्बुलक्ष्मी ने जब संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा में अपना गायन पेश किया, तो ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने लिखा, ‘वे अपने संगीत द्वारा पश्चिम के श्रोताओं से जो संपर्क स्थापित करती है, उसके लिए यह आवश्यक नहीं कि श्रोता उनके शब्दों का अर्थ समझें। इसके लिए उनके कंठ से निकला हुआ मधुर स्वर पश्चिमी श्रोताओं के लिए सबसे सरल और महत्वपूर्ण माध्यम है।’ 1982 में लंदन में भारत महोत्सव के उद्घाटन समारोह में भी विदेशी उनके स्वर संगीत पर मुग्ध हो उठे थे, भले ही वे गायन की भाषा नहीं जानते थे।

सुब्बुलक्ष्मी के बारे में कहा जाता है कि जो लोग उनकी भाषा नहीं समझते थे, वे भी उनकी गायकी सुनते थे। उस्ताद बड़े गुलाम अली खां उनको ‘सुस्वरलक्ष्मी’ कहते थे, तो आम लोगों में एमएस लावण्या के साथ उनकी पहचान ‘सेक्सोफोन सिस्टर’ के रूप में थी। उन्हें संगीत आठवां सुर कहा जाने लगा था। उनके जन्म शताब्दी पर संयुक्त राष्ट्र के डाक प्रशासन ने 1.20 डॉलर मूल्य का डाक टिकट जारी किया है। भारत के ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते के अनुमोदन के विशेष अवसर पर यह डाक टिकट जारी किया गया। उन्होंने अपनी आवाज का योगदान जनकल्याण के लिए आयोजित कार्यक्रमों में भी खूब किया। 1944 में कस्तूरबा गांधी के सम्मान में एक मेमोरियल फंड के लिए उन्होंने पांच प्रस्तुतियां दीं।

कई-कई बार खुले मंच से और अन्यत्र सुब्बुलक्ष्मी ने ऐसे कार्यक्रमों में गायन किया, जहां लोग महज चार आने देते थे और इस तरह जुटाया धन कल्याणकारी योजनाओं में खर्च किया गया। कीर्ति के शिखर को छूने पर भी बीसवीं शताब्दी की इस महान भक्ति गायिका में वही भोलापन बना रहा और वह सदैव नम्र बनी रहीं। उनकी इसी मासूमियत पर प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू उन्हें ‘संगीत की रानी’ बताते हुए कह उठे थे- ‘ओह, मैं एक अदना-सा प्रधानमंत्री, इस संगीत की मल्लिका के आगे कहां ठहरता हूं!’ वे पहली महिला संगीतकार थीं, जिन्हें 1998 में भारत रत्न से नवाजा गया।  पुरस्कारों की कोई गिनती ही नहीं थी उनके पास। पद्म भूषण, संगीत नाटक अकादमी सम्मान, संगीत कलानिधि, रेमन मैग्सेसे सम्मान, इंदिरा गांधी पुरस्कार वगैरह उनकी झोली में जाकर खुद सम्मानित हुए। ०

 

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First Published on November 6, 2016 1:17 am

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