December 04, 2016

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Diwali 2016: बाजार और दिवाली

दिवाली को लेकर एक आइडियोलाजीकल प्राब्लम इस बार आन खड़ी हुई है। जिस ओर न मीडिया ध्यान दे रहा है, न नेता ध्यान दे रहे हैं।

Author नई दिल्ली | October 29, 2016 23:40 pm
दिवाली।

ये सेल वो सेल, ये डील वो डील, ये स्नेपडील वो अमेजन डील, ये बिग बाजार डील ये कार डील से स्मार्टफोन डील, ये थ्री जी, फोर जी डील, ये नेरोलेक पेंट जो धूल नहीं जमने देगा, ये सामसुंग सेविन गेलेक्सी वो मोटो जी, मोटो जेड वो एपल सेविन, वो हीरा है सदा के लिए, वो पत्नी रूठी है पति से कि इस दिवाली नहीं दिया कुछ तो तीन तलाक दे दूंगी, पति मुस्कुराकर डिब्बा आगे करता है ये लो हीरों का हार। हाय ये इतना महंगा पति, कहता है तुमसे महंगा कुछ नहीं।
तभी एक चैनल बताने लगता है कि हीरा लें तो देखकर लें, चीनी हीरा नकली है, उसे जांचें। अरे भइया, जिसकी बीवी हीरा न मिलने पर शादी तोड़ने की कसम खाए बैठी हो वह नकली असली की परख करे या बीवी को मनाए? दिवाली इसी तरह आ रही है इस बार जरा जोर से आ रही है। हर अखबार विज्ञापनों से लदा है। तीन तीन, चार चार, छह छह पेज नहीं सारे अखबार ही विज्ञापन बन गए हैं। अमेजन कह रहा है दस करोड़ आइटम बेचता हूं मैं। आॅन लाइन आर्डर दो घर बैठे एंजाय करो, मनवाऊंगा आपकी दिवाली! स्नैपडील कह रहा है मुझसे लो मैं सस्ता दे रहा हूं, मैं मनवाता हूं आपकी दिवाली। आर्डर करने की देर है कि घर तक पहुंचाऊंगा आपकी दिवाली! मनाओ मेरी वाली आॅन लाइन दिवाली!

दस दिन पहले से एक लड़का अपनी पीठ पर अमेजन और स्नैपडील के पचास आइटम लादे दिल्ली भर में दौड़ लगा रहा है और एक अखबार बता रहा है कि यह दिन भर दौड़ता रहता है उसकी कमर झुकी जा रही है, वो मनवा रहा है आपकी दिवाली।  वो खुद क्या कभी मना पाएगा अपनी दिवाली?
हर तरफ सेल है लेकिन ‘सेल्समैन’ गायब हैं। सब कुछ आॅनलाइन है। दुकान तक जाने की जरूरत नहीं, सेल्समैन की जरूरत नहीं। ये है सेल विदाउट सेल्समैन! उन्नीस सौ उनचास में आर्थर मिलर का लिखा ‘डेथ आॅफ ए सेल्समैन’ नाटक याद आता है जिसका नायक विली एक असफल सेल्समैन है जो बडेÞ बिजनेस के सपने देखते-देखते मर जाता है। वह मंदी के बाद के दौर में मरा था, अपना सेल्समैन बूम के दौर में ही गायब हो गया है। यह है असली ‘डेथ आफ एक सेल्समैन’ का समय! सेल्समैन अब डिलीवरी बॉय है। वह बस में मेट्रो में बाइक पर बोझ लादे दौड़ रहा है क्योंकि जितने आइटम पहुंचाएगा उतने आइटमों पर दो चार रुपए कमीशन कमाएगा और तब जाकर दिवाली मनाएगा।

इन दिनों दिवाली जब भी आती है इसी तरह आती है। हम दिवाली नहीं मनाते, वही हमें मनाती है। बड़ी- बड़ी कारों में बड़े-बड़े आदमी बैठे हैं, बडेÞ- बड़े डिब्बे लिए वे अफसरों मंत्रियों आलाकमानों, लालाकमानों की ड्योढ़ियों पर शीश नवाते हैं, गिफ्ट है सरजी को दे दीजिएगा अच्छा नमस्कार!
आदमी गिफ्ट बन गया है, वह दिल्ली मुंबई कोलकाता बेंग्लुरु और हर दिवालीवादी शहर में दौड़ रहा है कि इस दिवाली में किसे गिफ्टें, किसे मनाएं कि अगले साल तक उसकी तिजोरी भरी रहे, उसका पद उसका कद बढ़ता रहे वह टॉप पर पहुंचे। सारी दिवाली गिफ्ट में बदल गई है। पैक हो गई है। इस दिवाली आप उसे अनबाक्स करिए प्लीज! कहंीं दसलाख की हीरे वाली घड़ी है, कहीं पचास लाख का पेन है, कहीं नई कार की चाबी का छल्ला है तो कहीं कार को सरपट दौड़ाता लल्ला है, कोई मालिक है तो कोई दल्ला है। सब दौड़ रहे हैं दिल्ली की सडकें हांफ रहीं हैं, धुआं बढ़ रहा है।

एनजीओ नसीहत दे रहे हैं कि पिछली दिवाली हवा में पटाखों से इतना जहरीला धुआं घुला, इस बार इतना घुलेगा, खांसी होगी,फेफडे बर्बाद हो रहे हैं। बच्चों को बड़ों को ये बीमारी वो बीमारी लग रही है। दिल्ली बीमार हो रही है। उधर, पुलिस कह रही है दिवाली सावधनी से मनाएं। रिपोर्ट बता रही है कि देशभक्ति के इस मदमाते दौर में सबसे बड़े खलनायक चीन के पटाखे हैं। जहर भरा है उनमें। इस बार चीनी पटाखों को न कहें। वह दुश्मन देश का साथ देता है, हम उसके बनाए पटाखे क्यों चलाएं? जिस तरह पाकिस्तानी कलाकारों को वापस किया है, उसी तरह चीन का बायकाट करेंगे। जब तक वो हमारी दिवाली को दस करोड़ दान में नहीं देता तब तक ‘मेड इन चाइना’ नहीं चलेगा! दिवाली पर नई देशभक्ति चमक रही है। दिवाली पर सावधान! ये बदमाश आतंकवाद ी दिवाली टाइप के मौकों की तलाश में रहते हैं। हमारे पटाखों में कहंी अपना न बजा दें इसलिए सावधान! खबरें दी जा रही हैं कि सब तरफ सुरक्षा का कड़ा बंदोबस्त है लेकिन सावधान… हर होली, दिवाली, पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी मनाने के ऐन पहले कोई सबको सावधान करता रहता है, सावधानी से मनाएं, सावधानी से नाचें, सावधानी से गाएं सावधानी से खाएं।

यार इतनी ताकत इतनी विजय कि रावण मारा जा चुका है, अधर्म पर धर्म की जीत कई दिन पहले हो चुकी है। फिर भी सावधान! यह कैसा गर्व है जो हर वक्त दूसरे को सावधान करता फिरता है?आप दिवाली मनांएगे तो बेमन से मनाएंगे। हर चीज का दाम बढ़ा हुआ है, बैंक का ब्याज कम हुआ पड़ा है। आपकी जेब सिकोड़ दी गई है। मिठाई के दाम आसमान पर हैं। दीपक की रुई तक के दाम आसमान पर हैं और अच्छी रेशे वाली रुई कहां मिलती है? तेल में मिलावट है, माचिस तक सीली है, दिए जलाएं तो कैसे? जलाते हैं तो दो मिनट बाद ही बुझ जाता है। मोमबत्तियां महंगी हैं। हर मोमबत्ती भी तो एक प्रदूषण है महाराज! तो क्या जलाएं?  चलो दिल जलाएं। इन दिनों वही सबसे ज्यादा जलता है और प्रदूषण भी नहीं करता। जो सत्ता में है सारी गिफ्टें सारे डिब्बे उनके हैं। जो बाहर हैं उनको एक डिब्बा नहीं!सत्ता की दिवाली ही असली दिवाली है। बाकी हमारी तुम्हारी तो कंगाली है। लक्ष्मीजी तो साफ-सुथरे घरों में रात को दिया जलाने के बाद पूजा पाठ के बाद चुपके से आया करती थीं। तब उनका नाम शुभ दीपावली कहा जाता था। अब वे हैप्पी दिवाली होने लगी हैं। हर कोई हैप्पी दिवाली कहने लगा है। हैप्पी दिवाली कहने से यह पता नहीं चलता है कि दिवाली हैप्पी है कि आदमी हैप्पी है। लगता है कि सिर्फ दिवाली हैप्पी हो रही है। उसे मनाने वाला हैप्पी नहीं है। उसकी जेब कट रही है। अमेजन की तिजोरी भर रही है, चीन का खजाना भर रहा है और हमसे कह रहा है कि हैप्पी दिवाली और बेचे जा रहा है पटाखें और लक्ष्मी गणेश और हनुमान मेड इन चाइना और जलती बुझती म्यूजिक बजाती लाइटों की लड़ियां, सुर्रियां, फुलझड़ियां और हम फूल बने जाते हैं। प्रधानमंत्रीजी ने कह दिया है कि छोटी दिवाली तो मन चुकी है यानी कि छोटी तो लाइन पार मन चुकी हमें सिर्फ बड़ी वाली मनानी है लेकिन हम तो छोटी भी मनाएंगे क्योंकि अगर न मनाई तो पता नहीं कौन सा ठाकरे, कौन सा स्वामी हमको ‘सिडीशन’ में अंदर करा दे।

दिवाली को लेकर एक आइडियोलाजीकल प्राब्लम इस बार आन खड़ी हुई है। जिस ओर न मीडिया ध्यान दे रहा है, न नेता ध्यान दे रहे हैं। वह है गोवर्द्धन की पूजा की प्राब्लम। मन तो है कि इस बार सौ फीसद भारतीय संस्कृति में डूबा जाए और दिवाली के पहले धनतेरस और बाद में गोवर्द्धन पूजा भी की जाए, क्योंकि बचपन में यही किया है लेकिन एक सवाल यह है कि धनतेरस पर कौन सा बर्तन खरीदें? चांदी का वो सिक्का खरीदें जिस पर एक ओर लक्ष्मी गणेश उकरे हों, दूसरी ओर शुभदीपावली लिखा हो, जिसे बड़ी दिवाली की रात लक्ष्मीजी के माथे पर चिपकाया जाए और नीचे दिया जलाकर सोचा जाए कि अब आर्इं लक्ष्मी कि अब आर्इं? लक्ष्मीजी के पोस्टर पर सिक्का चिपकाकर मन को न जाने कितनी दिवालियों से समझाता आया हंू कि एक न एक दिन लक्ष्मीजी मुझ पर जरूर कृपालु होंगी लेकिन आज तक नहीं होती दिखीं। तनखा गिनी चुनी रही और ब्याज दर घटती रही दाम बढ़ते रहे और हम रोते रहे। धनतेरस पर बाजार से एक चमचा जरूर ले आएंगे क्योंकि अब आकर चमचे का महात्म्य जाना है। सिक्के से बड़ा है चमचा! चांदी के सिक्के से बड़ा है चमचा।

बहरहाल दूसरी बड़ी आइडियोलाजिकल प्राब्लम गोबर्धन की पूजा को लेकर आ रही है। गोबर्द्धन के लिए गोबर चाहिए। उसमें भी गाय का गोबर हो तो बेहतर लेकिन लगता है कि इस बार गोबर का मिलना मुश्किल है। कारण कई हैं। पिछले दिनों कुछ गोभक्तों ने ऐसी अद्भुत गोभक्ति की है, गोमाता के पास जाने तक से डर लगता है। पता नहीं कौन सा गोभक्त देख ले और हमारी सुटाई करने लगे! प्यारी दुलारी आदरणीय नित्य पूज्य गो माता इस कदर थ्रेटनिंग लगने लगी हैं कि उनकी ओर देखने तक से डर लगता है। क्या पता कौन सा भक्त उनके नाम पर हमें अंदर करा दे। गोमाता ने कभी हमें सींग तक न मारा लेकिन इन नए गोभक्तों का कुछ ठिकाना नहीं कि किस बात पर अपने सींग मारने लगें। पहले गली में मुहल्ले में गोबर दिख जाता था जब से स्वच्छता अभियान चला है, गोबर दिखता ही नहीं। कोई कह रहा था कि जबसे गोबर के ब्यूटी प्रोडक्ट चले हैं तब से सारा गोबर ब्यूटी में जा रहा है। प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ का गोबर तो शहर चला गया था लेकिन इस शहर का गोबर कहां गया पता ही नहीं। और गोमाताजी भी हमारे मुहल्ले में अब कम ही दर्शन देती हैं। गोशालाओं में गोबर का रेट ऊंचा है, पहले जहां गो माता फ्री में देती थी अब उसी के दाम वसूले जाते हैं। पता नहीं गोमाता को यह मालूम है?

नई गोबर इंडस्ट्री गोबर की मारकेटिंग करने लगी है। गोबर के पैकेट मिलते बताए जाते हैं उनका दाम भी रखा गया है। आप आॅन लाइन तक मंगा सकते हैं, पता नहीं अमेजन या स्नैप डील इसमें डील करते है या नहीं लेकिन गोबर का पैक हो यह बात कुछ जंचती नहीं। कहां सड़क पर पड़ा गोबर जिसको घर लाकर गोबर्द्धन बनाए गए, पूजा की गई कहां बिकने वाला गोबर! हे गोमाता, इस दिवाली आपका गोबर भी बिकने लगा है क्या? आपकी सहमति है?  इससे निपटने का एक ही उपाय है वो है आन लाइन गोबर्द्धन पूजा की जाए! वही कर लेंगे। गोबर की महिमा का बखान करेंगे और इस तरह गो से ज्यादा नए गोभक्तों को खुश रखेंगे! सबसे चोखी अपनी आॅन लाइनदिवाली! न धुआं न धक्कड। अपनी दिवाली आॅन लाइन फक्कड़। न पटाखा न पैकेट न लड़ियां न झड़ियां, बस साइबर फुलझड़ियां। सबको कहिए आन लाइन ‘शुभ दिवाली।’ लेकिन उससे भी अच्छी है मनसा दिवाली। मन में मनाइए दिवाली गोबर्द्धन धनतेरस हर्रा लगे न फिटकरी और दिवाली हो जाए। ‘डेथ आफ ए सेल्समैन’ का हीरो विली इसी तरह के मनसा बिजनेस के सपने देखत देखते मर गया लेकिन हम सब किसी की सेल के डिलीवरी बॉय बन गए हैं! हम आ रहे हैं आपके घर डिलीवरी करने एक शुभ दिवाली की!
आमीन! १

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First Published on October 29, 2016 11:30 pm

सबरंग