December 04, 2016

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स्मरण: दयानंद की प्रासंगिकता

महर्षि दयानंद का संघर्ष मूलत: पौरणिक हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, बौद्धों, जैनियों व सिखों से था क्योंकि उनके धर्मग्रंथों को लेकर उन्होंने कठोर टिप्पणियां ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में की हैं।

महर्षि दयानंद सरस्वती

महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने विलक्षण व्यक्तित्व और कृतित्व से उन्नीसवीं सदी के पराधीन और जर्जरित भारत को गहराई तक झकझोरा था। उसका प्रभाव हम इक्कीसवीं सदी में भी महसूस कर रहे हैं और उनसे प्रेरणा पाकर उन सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक, अंधविश्वासों से लोहा ले रहे हैं जो दीमक बनकर समाज व धर्म को भीतर ही भीतर खोखला कर रहे हैं। सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक जगत की व्याधियों, दुर्बलताओं और त्रुटियों का तलस्पर्श अध्ययन उन्होंने किया था। रोग के अनुसार ही उन्होंने उपचार किया। तब तक ऐसा सर्वांगीण प्रयास किसी भी समकालीन सुधारक से न हो सका था।

महर्षि दयानंद का चिंतन मूलत: वेद पर आधारित था, जो अपने उद्भव काल से ही स्वप्रमाणित, चिरंतन और शाश्वत समझे जाते रहे हैं। दयानंद जितने प्रासंगिक उन्नीसवीं शताब्दी में थे उतने ही प्रासंगिक हर युग-खंड में रहेंगे। कारण, विज्ञान और तकनीक चाहे जितनी उन्नति कर ले मनुष्य की धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की भाव-भूमि वही रहेगी जो अनादि काल से चली आ रही है और अनंत काल तक चलती रहेगी। जीवन के इस क्रम, सत्य, तथ्य व लक्ष्य को न विज्ञान बदल सकता है और न ही तकनीक। महर्षि-दर्शन हर युग के मानव को दिशा-बोध प्रदान करता रहेगा और हर युग के लिए वह प्रासंगिक बने रहेंगे। दयानंद का जो मूलांकन किया गया वह अधूरा तो ही है, यथार्थ से भी कोसों दूर है। उन्हें मात्र हिंदू समाज सुधारक, कट्टर राष्ट्रवादी, पंथों का कटु आलोचक या आर्य समाज जैसी जुझारू व लड़ाकू संस्था का संस्थापक मान लेना उनके प्रति अन्याय है। इन चौखटों में उन्हें कैद करके हमने उनके द्वितीय और भव्य जीवन दर्शन का अवमूल्यन करने का अपराध किया है। यह ठीक है कि समकालीन समस्याओं से भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा था लेकिन यह उनके संघर्ष की इति नहीं आरंभ था। दयानंद का मूल्यांकन पूर्वाग्रहों से नहीं बल्कि उस दृष्टिकोण से होगा जो आगे चल कर रोम्यांरोला, योगी अरविंद घोष, साधु टीएल वास्वानी आदि ने अपनाया। दयानंद मानवतावादी, वैश्य-संस्कृति के उद्गाता, विश्व शांति के महानायक, सांप्रदायिक, सद्भावना के उन्नायक, समाजवादी मूल्यों के प्रवक्ता और अन्याय, अज्ञान, अभाव और शोषण के विरुद्ध संघर्षरत रहने वाले कालजयी योद्धा थे।

स्थूल रूप में देखें तो महर्षि दयानंद का संघर्ष मूलत: पौरणिक हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, बौद्धों, जैनियों व सिखों से था क्योंकि उनके धर्मग्रंथों को लेकर उन्होंने कठोर टिप्पणियां ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में की हैं। लेकिन ऐसा निष्कर्ष निकालने से पूर्व हम उनके ऋषित्व को भूल जाते हैं और यह भी भूल जाते हैं कि खंडन में अगर उन्होंने दस पृष्ठ लिखे है तो तो मंडन में सौ पृष्ठ लिखे हैं। उनका खंडन तर्कयुक्त, धर्मयुक्त, विज्ञानयुक्त और वैदिक गरिमा से ओत-प्रोत है। सत्यार्थप्रकाश के अलावा भी उन्होंने छोटे-बड़े लगभग साठ ग्रंथों की रचना की थी। उनके इन ग्रंथों के प्रचार एवं विशद व्याख्या पर इतना ध्यान नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए था, तथापि प्रभाव की दृष्टि से इन ग्रंथों को कम आंकना दुष्कर है। यही कराण था कि दनयानंद का आलोचक स्वरूप अधिक प्रखर और मुखर होकर सामने आया। इन उपेक्षित ग्रंथों में से कुछ की चर्चा यहां करना अप्रासंगिक न होगा।

सत्यार्थप्रकाश ने अंधविश्वास, कुरीतियों, मूर्तिपूजा, अवतारवाद, बहुदेववाद, श्रद्धा, तीर्थाटन पर जो जमकर प्रहार किया ही पर इसके साथ-साथ स्वाधीनता की रणभेरी भी बजाई, अपने इतिहास पर गर्व के भाव उत्पन्न किए, अपनी परंपरा के प्रति आस्था और संस्कृति के प्रति विश्वास जगाया, स्वदेशी का मंत्र जनमानस में फूंका, सेमेटिक संप्रदायों द्वारा चलाए जा रहे धर्मांतरण के अभियान पर रोक लगाई। नर-नारी की समानता की अलख जगाई और अस्पृश्यता के विरुद्ध शंखनाद किया। ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ लिखकर उन्होंने वेदभाष्य की कुंजी विद्वत् समाज को दी। पश्चिमी वेदज्ञों द्वारा वेदों पर हो रहे अनर्गल प्रहारों को रोका, वेदों के उदात्त, विशाल और गंभीर स्वरूप को प्रकट किया। ‘गोकरुणानिधि’ में उन्होंने जीव हत्या के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया। शाकाहार का पक्ष मजबूत किया और गोरक्षा आंदोलन का आह्वान गोरक्षिणी सभाएं गठित करके किया। अंग्रेज शासकों को उनके आंदोलन में 1857 के विप्लव की गंध आई और इसे खतरनाक आंदोलन मानते हुए अपने खुफिया तंत्र को सक्रिय कर दिया लेकिन उन्होंने एक बागी फकीर बनकर अपने ढंग से स्वराज का मंत्र जन-जन तक पहुंचाया। नीचे ही नीचे उन्होंने क्रांति की प्रचंड पृष्ठभूमि तैयार कर डाली। बहुत कम लोगों को पता है कि अपने इस अभियान के कारण ही ऋषि दयानंद को अपना बलिदान देना पड़ा। राजनीतिक हत्याओं के रहस्य शताब्दियों बाद जाकर खुलते हैं। यही त्रासदी ऋषि हत्याकांड के साथ हुई।

यह वह समय था जब पाश्चात्य जीवन मूल्यों के प्रति भारतीय जनमानस में कुछ लोग आस्था का भाव जगा रहे थे और अनेक सुशिक्षित भारतीय ईसाइयत की दीक्षा ले चुके थे। राजा राममोहन राय के ब्रह्मसमाज का केशवचंद सेन के नेतृत्व में ईसाईकरण हो रहा था। समय की इस मुखर चनौती का सामना करते हुए ऋषि दयनांद ने ‘संस्कारविधि’ लिखी और भारतीयों को इस देश की मिट्टी की परंपरा व संस्कृति से जोड़कर उन्हें सशक्त किया। यह अभियान उन मूर्तिपूजक पुजारियों के लिए एक सुविधाजनक आर्थिक विकल्प था जो सोचते थे कि मूर्तिपूजा छोड़ने से उनकी रोजी-रोटी छिन जाएगी संस्कारविधि ने यज्ञ, यज्ञोपवीत, संध्या आदि की प्राचीन विलुप्त परंपराओं को पुनर्जीवित किया, जिन पर केवल ब्राह्मणों का एकाधिकार हो गया था। नारी-शिक्षा व नर-नारी समानता की अलख भी संस्कारविधि ने जगाई। इसलिए इससे एक बहुआयामी मानसिक क्रांति का सूत्रपात हुआ। आज सर्वत्र भ्रष्चाचार, व्यभिचार, नशाखोरी, आतंकवाद, प्रदूषण, हिंसा, अपराधवृत्ति, विकसित राष्ट्रों की दादागीरी, शोषण, अन्याय, अज्ञान और अभाव का बोलबाला है। हर समाज व राष्ट्र इन सभी दोषों से आहत और व्याकुल है। दयानंद सरस्वती ने इन समस्त रोगों का उपचार पंचमहायज्ञ का विधान प्रस्तुत करके किया। विज्ञान और तकनीक अपने साथ उपभोक्तावादी संस्कृति के अभिशप्त परिणाम भी लाती है जिनका प्रतिकार आध्यात्मिक चेतन द्वारा ही संभव है। पंचमहायज्ञ इस आध्त्यात्मिक चेतना के मूल स्रोत हैं।

महर्षि दयानंद द्वारा पुनर्स्थापित जीवन दर्शन का मूल्यांकन भारतीय संदर्भ में करने के हम अभ्यस्त हो चुके हैं, जिससे उसका स्वरूप संकुचित और प्रभाव क्षीण होता है। महर्षि दयनादं ने वेद, योग, पंचमहायज्ञ, यज्ञोपवीत, आयुर्वेद, इतिहास, संस्कृति, संस्कार आदि के प्रति आस्था-भाव जगाकर उन ऋषिकृत परंपराओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया था। जिन परंपराओं ने अतीत में भारत को विश्वगुरु के पद पर स्थापित और प्रतिष्ठित कराया था। यह युग तुलनात्मक अध्ययन का युग है। तर्क और विज्ञान की कसौटियों में लोगों का विश्वास पहले से ही अधिक बढ़ा है, इसलिए दयानंद के जीवन-दर्शन के फलते-फूलने की व्यापक संभावनाएं आज भी मौजूद हैं। इन अवसरों व संभावनाओं का समुचित लाभ उठाकर महर्षि दयानंद की प्रासंगिकता विश्व स्तर पर भी सिद्ध और मुखर की जा सकती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि ऋषि दयानंद ने दिल्ली दरबार के अवसर पर सभी संप्रदायों के आचार्यों को आमंत्रित करके एक ऐसी मानव आचार संहिता तैयार करने का आह्वान किया था जो सर्वानुमोदित हो। आधुनिक विश्व आज इसी ओर बढ़ रहा है। महर्षि दयानंद ने जो प्रयोग डेढ़-दो सौ वर्ष पूर्व किए थे। धीरे-धीरे वे वे प्रयोग समय की कसौटी पर आज खरे उतर रहे हैं और विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त कर रहे हैं। जरूरत यह है कि दयानंद के जीवन दर्शन को विश्व पटल पर प्रस्तुत करने का अभियान शुरू हो। टेम्स, वोल्गा और गंगा की धाराएं मिलकर जब त्रिवेणी बनाएंगी तभी ऋषि दयानंद का कीर्तिध्वज विश्व भर में लहरा सकेगा।

 

 

 

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First Published on October 30, 2016 1:15 am

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