June 29, 2017

ताज़ा खबर
 

कहानी- खामोश कारीगर

‘भला इतना महंगा वार्डरोब बनवाने की क्या जरूरत है हरिराम?’ अपने खर्चे से कुछ उकताया हुआ मैंने उससे पूछा। ‘जिनके पास पैसे कम हैं, वे अपने घरों में लोहे की कोई अलमारी लाकर रख देते हैं।

Author May 21, 2017 01:29 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

‘भला इतना महंगा वार्डरोब बनवाने की क्या जरूरत है हरिराम?’ अपने खर्चे से कुछ उकताया हुआ मैंने उससे पूछा। ‘जिनके पास पैसे कम हैं, वे अपने घरों में लोहे की कोई अलमारी लाकर रख देते हैं। जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे बिना उसके ही रह लेते हैं।’ हरिराम सुथार ने बड़े सहज भाव से कहा। हरिराम सीकर का एक कारीगर है और इन दिनों मेरे फ्लैट में मॉडुलर किचन, वार्डरोब और शो-केस बना रहा है। मुझे उसकी साफगोई थोड़ी चुभी, मगर कहीं न कहीं अच्छी भी लगी। लंबे-लंबे और बीच में खाली छूटे दांतों वाला कारीगर हरिराम अपनी धुन में आगे बोलता जा रहा था, ‘इतना महंगा वार्डरोब बनवाने से आखिर फायदा क्या है!’ ‘यार, तुम तो अपने धंधे पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रहे हो। अगर सभी लोग तुम्हारी तरह सोचने लगें तो तुम्हारी रोजी-रोटी का क्या होगा?’ मैं उसकी आंखों में संशयपूर्वक झांकता हुआ बोला। मगर उसकी थकी और लकड़ी के महीन बुरादों से ढंकी आंखों में एक अपराजेय चमक थी। उसमें एक हुनरमंद का आत्मविश्वास चमक रहा था। अविजित भाव से वह बोला, ‘ऐसा नहीं है सर। जिसको काम कराना होगा, वह तो करवाएगा ही न। आप लोगों के सामने भला मेरी क्या औकात है! आप जैसे सेठ भला मेरी बात क्यों सुनने लगे!’

इस समय मेरे लिए उसका ‘सेठ’ संबोधन मुझे किसी गाली से कम नहीं लग रहा था। मैं पिछले सोलह दिनों से उसके कामों का पारखी था, जिसे आप एक ‘पैसिव आॅबजर्वर’ कह सकते हैं। वह तो नियंता था। चौरस और बेजान बोर्डों को आकर्षक रूप देने में माहिर। खुद अपने परिवार को गांव में छोड़ दस बाई बारह के एक कमरे में रहते हुए जाने कितने फ्लैट्स को वह मॉडर्न फर्नीचर से सजा-संवार चुका था। सशंकित भाव से उसके पूर्ववर्ती कुछ कामों को देखता हुआ मैंने उसे यह काम दिया था। फिर क्रमश: मुझे उसकी ईमानदारी और हुनरमंदी ने प्रभावित किया। मैं बीच-बीच में अपने कॉलेज से छुट्टी लेकर किसी एक बोर्ड पर बैठा उसके और उसके साथी के काम देखा करता था।  ‘आदमी कमाता काहे के लिए है? शौक के लिए ही न! बस इतनी-सी बात है।’ हरिराम ने अपनी ऐनक के पार झांकते और मुझे कुछ तौलते हुए कहा। मुझे लगा, एमए अंतिम वर्ष का कोई विद्यार्थी मुझसे सवाल करता हुआ मानो खुद जवाब भी दे रहा हो। मुझे इस समय उसकी आंखें कुछ अतिरिक्त रूप से बड़ी लगीं।  ‘थाली बारह इंच की आती है। बड़ी से बड़ी। कोई-सी भी इन दराजों में रख दो। आराम से आएगी।’ हरिराम ने मुझे मेरे मॉडुलर किचन की विशेषता समझाई।  ‘पड़ोस के झा जी वाले की ट्रे में थाली नहीं आती। बस प्लेटें आती हैं।’ उसने खुद अपनी पीठ थपथपाई।
शीशे की खिड़कियों से जाड़े की धूप छन कर किचन तक आ रही थी। हरिराम के तेल से तह किए केशों को पीछे दीवार से टिक कर खड़े-खड़े मैंने बड़े ध्यान से देखा और पूछा, ‘उनके कारीगर ने क्या गलती की?’

‘उनके कारीगर ने दोनों ट्रे के बीच पूरी जगह नहीं छोड़ी। एक-दो इंच जगह कम हो गई।’ ‘अच्छा! ये किसने कहा कि थाली नहीं आती?’ मैंने पूछा।  स्लैब के नीचे सिर झुका कर काम करते हरिराम ने कहा, ‘मैं देख कर आया था।’ मेरे फ्लैट की दोनों बालकनी पश्चिम की तरफ खुलती थीं। शाम के साढ़े पांच बज रहे थे। लकड़ी की ‘घोड़ी’ पर बैठा मैं कुछ सोच रहा था। दिन की जाती हुई धूप सेंक रहा था। तभी हरिराम का कारीगर अजीम आया और पच्च से नाक का पानी बाहर निकाल दिया। मुझे अंदाजा हुआ कि अजीम की नाक बह रही है।
सिर पर टोपी लगाए और स्वेटर पहने अजीम चुपचाप अपना काम करता रहता था। एक दोपहर जब वह उकड़ू बैठ कर पहले से तैयार दरवाजों में कब्जे लगा रहा था, मुझे उसका अंडरवियर दिख रहा था। सूती पतले कपड़े के अंडरवियर से कोई चार इंच नीचे उसकी पैंट सरक आई थी। मैंने गौर किया, उसकी पैंट में बेल्ट नहीं थी। वह अपने काम में मगन था। जब वह अंतिम रूप से स्लैब में बाहर पहले से ही नाप-जोख कर बनाए गए दरवाजों को फिट करने लगा, तो एक-एक कब्जे को बाहर से फिर लगा कर वह उनका मिलान करने लगा। उसे ‘ग्रुपिंग’ का विशेष ध्यान रखना था। किचन के ऊपर बने पत्थर के स्लैब पर पालथी मारे मैं यह सब देख रहा था। किसी हुनर में ऐसी आस्था के आगे मैं नतमस्तक था। इस समय किचन में हेड मिस्त्री हरिराम समेत कुल चार लोग काम कर रहे थे। दरवाजे के एक-एक पल्ले को अजीम ऐसे उठा रहा था जैसे कोई पेंटर अपनी तैयार पेंटिंग को उठाता है। मुझे लगा, आखिरकार यह उसके लिए पेंटिंग ही तो है। कोरे बोर्ड को यूं अपने हिसाब से आकार देना, उसमें सनमाइका लगाना, उसे सुखाना, हर पल्ले पर नंबर देना… ये सब काम उसने इन कुछेक दिनों में तो पूरा किया ही है न! तभी मेरी नजर उसकी ओर गई। लगे हुए पल्लों को वह वापस खोल चुका था। मैंने पूछा,‘इन्हें खोल क्यों दिया?’

अपने काम से बगैर नजर हटाए उसने कहा, ‘ठीक करके देना पड़ता है न! सब कुछ सेट करके।’ अजीम ने धीरे से कहा। मुझे लगा, कोई साधक साधना में लीन रह कर अपनी आंखें बंद किए कुछ कह रहा हो। अब तक अजीम को मैं कई बार कुरेदना चाहा था। मगर वह हर बार मेरी बात टाल दिया करता। उसके साथ उसके दो अन्य साथी फुंदन और सिकंदर भी काम करते थे। उन्होंने भी इस बारे में कभी कुछ नहीं बताया। वे दोनों बरेली के थे। अजीम पीलीभीत का था। तीनों में दांत-कटी रोटी के कई दृश्य मैं देखा करता था, जब वे एक साथ खाना खाया करते थे। हरिराम ने इसी अपार्टमेंट के दो अन्य फ्लैटों में भी काम ले रखा था। वह एक जगह टिक कर नहीं रह पाता था। अमूमन वह लंच नहीं लाया करता था। कभी कारीगरों के इस समूह में तो कभी उस समूह में खाना खा लिया करता था। मगर ये तीनों बिला नागा एक साथ खाना खाया करते थे। अजीम अमूमन कम बोलता था। खासकर मुझसे तो लगभग नहीं। शायद मुझसे एक परदा रखता हो। बहुत पूछने पर कुछ बोल देता। मैं उसे सहज करने की कोशिश करता, मगर उदासी का कोई काला बादल उस पर हमेशा मंडराया करता था। एक शाम अपने काम में डूबा वह बोर्ड के पल्लों को किनारे से काटता जा रहा था और उसके किनारे में फेवीकोल से ‘चिप’ भी चिपकाता चला जा रहा था। उसे काम में यों डूबा देख फुंदन ने फब्ती कसी, ‘जिसने अपने हाथ से फेवीकोल नहीं लगाया और मुंह में कील नहीं रखी, वह कारीगर नहीं। क्यों अजीम, तुम क्या कहते हो?’

अजीम हल्का-सा मुस्कुरा कर रह गया। वह जानता था कि यह उसे लक्षित करके ही कहा गया है। फुंदन ने मेरी ओर देखा और मैं भी हल्का मुस्कुरा दिया। हमें ऐसा लगा कि अजीम को हंसा कर हमने दुनिया जीत ली हो। वह फिर वापस अपने काम में लग गया, मानो चंद्रमा को बादल के घने टुकड़े ने वापस ढंक लिया हो। बोर्ड कटने से लकड़ी के बुरादे अजीम के चेहरे और बाल पर फैले हुए थे। फुंदन की यह पंक्ति सुन मेरे सूखे होंठों पर अचानक मुस्कुराहट तैर गई थी। उसकी यह पंक्ति खूब भाई। मैं कुछ देर के लिए अपनी थकान भूल बैठा।
मैं अपने आसपास कार्यरत इन नियंताओं को बड़े गौर से देख रहा था। वक्त ने इन्हें आधुनिक बना दिया था। अपने कई काम ये अब अत्याधुनिक मशीनों की मदद से करने लगे थे। कुछ सालों पहले नफासत के कई कामों को करने में इन्हें वक्त अधिक लग जाया करता था। मगर तेजी से बदलती दुनिया में इधर ‘कारपेंटरी’ भी खूब बदली है। इनका काम पहले की तुलना में आसान और ज्यादा आकर्षक हुआ है। सभी कारीगरों के हाथों में मोबाइल है और वे उनसे गाना सुनते हुए अपना काम करते हैं। मुझे अपने घर में बच्चों का मोबाइल बजाना एकदम पसंद नहीं है, लेकिन इन कारीगरों के मोबाइल बजाने का मैं बुरा नहीं मान रहा था।

जब मॉडुलर किचन के स्लैब के नीचे पल्ले भी अंतत: लग गए, तब उन्हें बाहर से सही लेबलिंग करने के लिए फुंदन उनकी घिसाई करने लगा। पत्थरों की घिसाई होते मैंने देखी थी, मगर लकड़ी के बोर्डों की घिसाई मेरे लिए नई बात थी। फुंदन जब किचन से बाहर निकला, उसका पूरा शरीर बुरादे से भरा हुआ था। इधर काम कराते-कराते मेरी कचूमर निकल गई थी। मेरी तनख्वाह हालांकि अच्छी है, मगर उसके हिसाब से खर्च और बैंक का लोन कुछ ज्यादा हो गया। बहुत मुश्किल हो रही थी, गृह प्रवेश कैसे करूं! इस बीच हरिराम और उसके इन कारीगरों से कुछ दोस्ती-सी हो गई थी। इनसे अपनी परेशानी साझा की। बड़े दुकानदार तो कुछ दिनों में पेमेंट न होने पर आफत मचाने लगते थे। जबकि इन्हें मैं हर बार मोटी राशि का भुगतान किया करता था। अगर ये कुछ दिनों के लिए उधार देने पर राजी भी होते, तो ऐसे जैसे मुझ पर कोई बड़ा अहसान कर रहे हों। ऐसे में हरिराम ने मेरी बड़ी मदद की। उसने कहा, ‘आप तो काम करवा लो प्रोफेसर साहब। पैसे बाद में देते रहना। मेरे कारीगर भी बड़े संतोषी हैं। पैसे लेने के लिए कोई हील-हुज्जत नहीं करते। और अजीम… वह तो ऐसा सीधा है कि उसके ज्यादातर पैसे मेरे पास ही रहते हैं। जब वह गांव जाता है, तब जरूरत के मुताबिक मुझसे ले लिया करता है।… हरिराम के इतना कह भर देने से मुझे बड़ी तसल्ली मिली।
एक दिन अजीम काम पर नहीं आया। मुझे इतने दिनों में उसकी खामोश उपस्थिति की आदत हो गई थी। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने हरिराम से पूछा, ‘हरिराम, आज अजीम क्यों नहीं आया?’

हरिराम ने सहज भाव से कहा, ‘आज महीने का पहला शुक्रवार है न! वह बरेली गया है। वह हर महीने के पहले शुक्रवार को अपने माता-पिता के मजार पर जियारत करने और चादर चढ़ाने जाता है। एक दंगे में उसके माता-पिता की मौत हो गई थी। अपने परिवार का एकमात्र सदस्य वही था, जो उस रात जिंदा बच गया था।’मेरी आंखों में कौंधते प्रश्न को वह समझ रहा था, ‘मदरसे में गरमी की छुट्टियां थीं उन दिनों। वह अपनी खाला के पास गया हुआ था। इसलिए भगवान ने उसे बचा लिया।’ थोड़ा रुक कर हरिराम कहने लगा, ‘क्या हिंदू और क्या मुसलमान बाबूजी! जाने कितने हिंदुओं की रसोई को यह अजीम सजा-संवार चुका है। और हर दूसरे घर में रखे जाने वाले लकड़ी के मंदिरों पर ऐसी नक्काशी करता है कि इसके बराबर क्या कोई हिंदू कारीगर टिकेगा! कई हिंदू सेठ आगे बढ़ कर इसको लेकर आने की मुझे खास हिदायत देते हैं। धरम-वरम सब बकवास है प्रोफेसर साहब, अगर उसकी वजह से कहीं कोई दंगा-फसाद होता हो। किसी निर्दोष की जान जाती हो। हम तो कारीगर लोग हैं बाबूजी। हमारा ‘करम’ ही हमारा ‘धरम’ है। बंदे की जात-पांत से नहीं, हां उसकी हुनर से हमारे यहां ऊंच-नीच जरूर चलता है। उसमें भी हम अपने से पीछे वाले को अधिक से अधिक काम सिखाने की कोशिश करते हैं। कोई मेरी माने तो यह जो ‘धरम’ है न वह एक अंकुड़ा है। वही अंकुड़ा, जो हमारे बुनकर भाइयों के काम आता है। अब वे अंकुड़े हमारे शातिर नेता और ‘धरमगुरु’ अपने साथ रखने लगे हैं। ये उसी अंकुड़े से सीधे-सादे लोगों को फंसाते हैं। वरना आप ही बताएं, हिंदू-मुसलमान के खून में क्या कोई अंतर है! इस हरिराम और अजीम में कोई भेद है? उल्टे मैं तो यह मानता हूं कि जबसे मेरे साथ यह अजीम आया है, मेरे काम में बरकत ही बरकत हुई है।’ अपनी प्रोफेसरी भूल मैं चुपचाप हरिराम की बातों को तौल रहा था। मुझे आज अजीम की चुप्पी का रहस्य पता चल गया था। ०

 

 

.अर्पण कुमार

मोदी सरकार के 3 साल: 61 प्रतिशत लोगों का कहना- 'सरकार उम्मीदों पर खरी उतरी'

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on May 21, 2017 1:29 am

  1. No Comments.
सबरंग