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आजकल बच्चे अपने लिए अलग और अपनी पसंद से सजाया हुआ कमरा चाहते हैं।

आमतौर पर घर की सजावट करते समय बहुत से लोग बच्चों के कमरे की साज-सज्जा में उनकी रुचि का ध्यान नहीं रखते। उनसे सलाह-मशविरा किए बगैर उनके कमरे के लिए परदे, बेडशीट, सजावट के सामान खरीद लाते हैं। दीवारों पर रंग-रोगन कराते समय भी इस बात का ध्यान नहीं रखते कि उन्हें कौन-सा रंग अधिक पसंद है। उनके कमरे में दीवारों पर चित्र वगैरह किस तरह के होने चाहिए, परवाह नहीं करते। बच्चों का कमरा तैयार करते समय किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, पेश हैं रवि डे के सुझाव।
Author August 6, 2017 05:32 am
प्रतीकात्मक चित्र।

जकल टीवी पर एक वज्ञिापन आता है। उसमें एक बच्ची नए घर में जाने पर अपने माता-पिता से सवाल करती है कि इस घर में सब कुछ तो आप लोगों की पसंद का है। सोफे आपकी पसंद के, कुर्सी आपकी पसंद की, परदे आपके पसंद के- मेरी पसंद का क्या है। माता-पिता के पास कोई जवाब नहीं होता। दरअसल, आजकल बच्चे अपने लिए अलग और अपनी पसंद से सजाया हुआ कमरा चाहते हैं। उसमें उनकी पसंद के ही परदे हों, कुर्सी-मेज, बिस्तर, यहां तक कि बेडशीट और तकिया भी उनकी पसंद का हो, उनके मन के अनुकूल हो। इसलिए आजकल माता-पिता घर बनवाते समय या नए घर में जाते समय बच्चों के कमरे की साज-सज्जा का खास खयाल रखते हैं।

बच्चों का कमरा बड़ों से कई कारणों से अलग होना चाहिए। बच्चे अपने कमरे में न सिर्फ सोते-बैठते, बल्कि वे उसमें पढ़ते-लिखते, खेलते-कूदते, सपने देखते और बहुत कुछ नया रचते हैं। इसलिए बच्चों के कमरे में बिस्तर के अलावा कपड़े और किताबें रखने की आलमारी, पढ़ने की टेबल-कुर्सी, खिलौने रखने की जगह वगैरह की दरकार होती है।
बच्चों का कमरा तैयार कराते समय यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि उसमें रहने वाले बच्चे या बच्चों की उम्र और रुचि क्या है। मसलन, उनकी उम्र क्या है, वे किस तरह के चित्र पसंद करते हैं, वे किससे प्रभावित हैं। उनका पसंदीदा व्यक्ति, कार्टून चरित्र कौन है, किस फिल्मी अभिनेता या अभिनेत्री को पसंद करता है, किस खिलाड़ी को पसंद करता है।
अगर बच्चे बहुत छोटे हैं तो उनके कमरे में किताबें रखने की आलमारी, टेबल-कुर्सी की जरूरत नहीं होती। उनके कमरे में खाली जगह अधिक रखी जा सकती है, ताकि वे खेल सकें।
’अगर एक कमरे में दो बच्चों को रहना है, तो उनके बिस्तर के अलावा अलग-अलग कपड़े रखने की आलमारी, खिलौने रखने की आलमारी या कबड, किताबें रखने की आलमारी और टेबल-कुर्सी रखने की जगह होनी चाहिए। मगर महानगरीय जीवन और फ्लैट संस्कृति में आमतौर पर कमरों का आकार बड़ा नहीं होता, इसलिए बच्चों का कमरा तैयार करते वक्त कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में बच्चों के लिए दुमंजिले बिस्तर का उपयोग किया जा सकता है। आजकल ऐसे बिस्तरों में किताबें, खिलौने आदि रखने की जगहें भी बनी होती हैं। उससे कमरे में काफी जगह बच जाती है।

’ अगर बच्चों के लिए अलग-अलग बिस्तर लगाना चाहते हैं, तो दीवारों में आलमारी की जगह निकाली जा सकती है। खिड़की के पास पढ़ने की मेज लगाई जा सकती है, जिसके कोने वाले हिस्से में किताबें रखने की जगह बन सकती है। ’ दीवारों पर बच्चों की रुचि का ध्यान रखते हुए चित्रकारी कराएं। आजकल बच्चों के कमरों के लिए आकर्षक वाल पेपर भी बाजार में सहज सुलभ हैं। उनमें बच्चों की उम्र और रुचि का ध्यान रखते हुए कार्टून चरित्रों वाले, पेड़-पौधों, जंगल-पहाड़ आदि के चित्र वाले वाल पेपर या पोस्टरों की मदद से कमरे को आकर्षक बनाया जा सकता है। ’कमरे की छत पर चमकने वाले चांद-सितारे चिपकाएं, जो रात के अंधेरे में चमकते रहते हैं, जिससे खुले आसमान का आभास होता है। बच्चे कल्पनाशील होते हैं और चांद-सितारों को देखते हुए वे अपनी कल्पना की दुनिया में विचरने लगते हैं। ’दरवाजे और खिड़कियों पर उनके पसंदीदा कार्टून चरित्र वाले गहरे रंग के परदे लटकाएं। बाथरूम के दरवाजों पर भी इसी तरह के चरित्रों की तस्वीरें लगाई जा सकती हैं। उनके बाथरूम में साबुन-शैंपू-ब्रश वगैरह रखने की जगह ऐसे तय की जानी चाहिए, ताकि उनका हाथ उन तक आसानी से पहुंच सके।

’बच्चों के कमरों की रंगाई कराते समय इस बात का ध्यान रखें कि बच्चे अक्सर अपने पसंदीदा टीवी कार्यक्रमों या पुस्तकों के चरित्रों की तस्वीरें पत्र-पत्रिकाओं से काट कर या बाजार से खरीद कर दीवारों, खिड़की-दरवाजों पर चिपकाना पसंद करते हैं। इसलिए दीवारों और खिड़की दरवाजों पर ऐसे रंग लगवाएं, जिस पर कुछ चिपकाने से उसका पलस्तर न उखड़े।
’अक्सर बच्चे अपने कमरे में ही खाना पसंद करते हैं। बिस्तर पर खेलते समय या लेट कर पढ़ते समय कुछ न कुछ खाते रहते हैं। इस तरह बिस्तर पर भोजन के गिरने से बेडशीट वगैरह पर दाग लगने और कमरे में काक्रोच, चूहे, दीमक के पनपने की आशंका रहती है। इस तरह बच्चों में बीमारियां फैलने की आशंका भी बनी रहती है। इसलिए बच्चों के कमरे में समय-समय पर पेस्ट कंट्रोल कराते रहना चाहिए। दिन में दो बार उनकी सफाई होनी चाहिए। अगर रोज संभव न हो तो हफ्ते में तीन बार उनकी बेडशीट और तकिए के कवर जरूर बदलें।
’बच्चों के कमरे में टीवी न रखें, नहीं तो वे रात को समय से सोने के बजाय छिप कर टीवी देखना पसंद करेंगे और इस तरह उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।’बच्चों का कमरा हवादार होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि खिड़कियां खोल कर धूप भी ली जा सके।

आजकल फ्लैटों में कमरों का आकार सामान्य होता है। ऐसे में एक ही कमरे में सोने और पढ़ने की जगह बना पाना कठिन हो जाता है। बहुत सारे फ्लैटों में स्टडी रूम की जगह नहीं होती। ऐसे में कई लोग किसी बॉलकनी को घेर कर पढ़ने की जगह बना लेते हैं। अगर ऐसा करना हो, तो कोशिश होनी चाहिए कि बच्चों के कमरे की बालकनी को ही घेर कर पढ़ने की जगह निकाली जाए। उसके बाहरी हिस्से में कांच की स्लाइडिंग खिड़कियां लगवाएं, ताकि कमरे में पर्याप्त रोशनी बनी रहे और जरूरत पड़ने पर खिड़िकियों को खिसका कर धूप और हवा का आनंद लिया जा सके। ’अगर कमरे में पढ़ने की मेज लगाने से जगह संकरी हो रही हो तो बिस्तर की तरफ दीवार में इस तरह पट्टी लगा कर मेज बनाने की व्यवस्था की जा सकती है, जिसे जरूरत पड़ने पर खोला और जरूरत न रहने पर समेटा जा सके। इस तरह कुर्सी की जगह बच्चे बिस्तर पर ही बैठ कर पढ़ाई कर सकते हैं। आजकल बिस्तर पर रख कर पढ़ाई करने वाले फोल्डिंग टेबल भी बाजार में खूब उपलब्ध हैं।’पढ़ने की जगह पर रोशनी का माकूल इंतजाम होना चाहिए। उनकी टेबल के ऊपर बल्ब या टेबल लैंप जरूर लगवाएं। ’बच्चों का कमरा तैयार करते समय, उनकी जरूरत की चीजें खरीदते समय उन्हें अपने साथ जरूर रखें और उनकी रुचि के हिसाब से ही सजावट करें। अगर वे अपने कमरे में चित्र वगैरह चिपकाते हैं, तो बेवजह टोकाटाकी न करें, क्योंकि इस तरह उनकी कल्पनाशक्ति बाधित होती है। जब भी उन्हें किसी चीज के लिए मना करें, पूरे तर्क के साथ समझाएं और बताएं कि उन्हें क्या नहीं करना चाहिए। ०

 

 

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