December 05, 2016

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विमर्श: वाहवाही का बाल साहित्य

आजादी के बाद से ही अगर संजीदगी से बाल साहित्य में उक्त चारों अपना धर्म निभाते तो अब तक के बच्चे सजग पाठक बन जाते।

Author November 13, 2016 00:37 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

मनोहर चमोली ‘मनु’

बाल साहित्यकार अपने आयुवर्ग में चाहे जितने भक्त बना लें, आखिरकार उनकी रचना ही बोलेगी। अपनी रचना तो सबको प्यारी लगती है, पर आनंद की अनुभूति तो तब होती है जब किसी और की रचना पर बोलने वाला कोई दूसरा हो। यह दूसरा कौन होगा? रचनाकार के मुरीद तो उसके पाठक हुए। भक्त तो रचना को समय की आंच पर रख कर आलोचना करने से रहे। तीसरा ही कोई होगा, जिसे आलोचक कहा जाएगा।

यह तय है कि रचना और रचनाकार में जब आलोचना सहने की ताकत नहीं होगी तो वह अल्पजीवन जीकर काल के गाल में समा जाएगी। मैं खुद बतौर पाठक तत्काल बाल साहित्य की चार-छह रचनाएं अंगुलियों पर नहीं गिना सकता। मैं यह तो कह सकता हूं कि बाल साहित्य में इन दिनों अमुक-अमुक बहुत अच्छा लिख रहे हैं। पर वह बहुत अच्छा क्या है! इस पर विचार करते ही मेरे माथे पर बल पड़ने लगते हैं। कारण? मेरे जेहन में बाल साहित्य की इतनी रचनाओं ने स्थायी जगह नहीं बनाई है। यही कारण है कि बाल साहित्य की अधिकतर रचनाएं काल के गाल में समा रही हैं।

आखिर हम अपनी रचनाओं पर मनचाही स्तुतियों से फुर्सत कब पाएंगे? शायद कभी नहीं। अधिकतर अपने और अपनी रचनाओं के बारे में अच्छा ही सुनना चाहते हैं। वहीं स्वस्थ आलोचना का आधार हमेशा आलोचक के अपने तर्क, निष्कर्ष, समझ, अनुभव, विचार, रचना के औचित्य, कथ्य और रचना की बुनावट होती है। यह जरूरी नहीं कि आलोचक की आलोचना से पाठक भी सहमत हों। लेकिन रचनाकार? रचनाकार को चाहिए कि वह आलोचना सुन-पढ़ कर कुपित न हो। आलोचना को सहजता और सरलता से सुने, पढ़े और समझे। उसे माने ही, यह कतई जरूरी नहीं।

हम आलोचना में उदारता की उम्मीद क्यों करते हैं? क्या यह सही है? अगर ऐसा है तो यह हमारा हल्कापन है। पाठक तो उदारता से रचनाएं पढ़ता है। न पसंद आए तो नहीं पढ़ेगा। ऐसा प्राय: कम होता है कि अमुक रचनाकार की कोई रचना मुझे पसंद नहीं आती तो ऐसा नहीं कि मैं निकट भविष्य में उसकी कोई भी रचना नहीं पढ़ना चाहूंगा। लेकिन आलोचक के मामले में ऐसा नहीं होता। आलोचक क्यों किसी रचना के प्रति प्रेम और निर्ममता दिखाए? उसे तो वही करना चाहिए, जो उसे पढ़ते समय महसूस होता है। अलबत्ता आलोचक रचना को पढ़ते समय तिहरी भूमिका में होता है। एक तो वह पाठक होता है। दूसरा, वह उसे बतौर रचनाकार भी देखता है कि अगर वह लिखता तो उसे कैसे और क्या आकार देता। तीसरा, वह पाठक और रचनाकार से इतर उस रचना के गुण-दोष देखता है। उसी के आधार पर उसकी टिप्पणी रेखांकित होती है।

ऐसा नहीं कि आलोचक जानबूझ कर किसी रचना को अच्छा या बुरा बता दे। कमियां होते हुए भी कमियां छिपा दे। अच्छाई होते हुए भी अच्छाई की चर्चा न करे। अगर ऐसा वह नहीं करता तो उस आलोचक की तटस्थता पर जल्दी ही सवाल खड़े होने लगेंगे। फिर एक दिन ऐसा आएगा कि उसकी आलोचनात्मक दृष्टि ही हास्यास्पद मानी जाएगी। उसकी आलोचना पर रचनाकार ध्यान नहीं देंगे। आखिर आलोचक की मंशा क्या है? यह हमें समझना होगा। क्या वह सिर्फ कमियां निकालने के लिए होता है। क्या वह किसी रचना की तारीफ ही करता फिरे? तो फिर? आलोचक को उन पक्षों पर भी दृष्टि डालनी होती है, जिन पर न तो रचनाकार का ध्यान गया, न आम पाठक का। अगर आलोचक उदारता बरतेगा तो संभव है कि रचनाकार अपनी रचनाओं के पुराने पाठकों को धीरे-धीरे खोता चला जाएगा। फिर जब रचना पढ़ी ही नहीं जाएगी, तो यह रचनाकर्म किस काम का?

बगैर आलोचना के आत्ममुग्धता का कवच पहन कर और झूठी वाहवाही की चादर ओढ़ कर भी किसी रचनाकार की रचनाएं छपती रह सकती हैं। पर पढ़ी और गुनी जाएंगी, ऐसा विश्वास करना गलतफहमी में रहना है। बाल साहित्य में अब भी कमोबेश वाहवाही का चलन अधिक दिखता है। फलां को यह गलतफहमी है कि अब तक उसकी दर्जनों रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं। फलां पत्रिका ने उसकी रचना क्यों रोक रखी है। या क्यों अस्वीकृत कर दी है। अमुक को यह गलतफहमी है कि अब तक उसके दर्जनों संग्रह आ चुके हैं। वह स्थापित बाल साहित्यकार है। इन अमुक और फलां को यह कहते सुना जा सकता है कि हमारी रचनाओं की कसौटी तो बच्चे हैं। आज तक बच्चों ने रचना में कोई मीन-मेख नहीं निकाली है। ये आलोचक कौन होते हैं?

बच्चों की पढ़ने की गति क्या है। वे कितना पढ़ते हैं, यह हम सब जानते हैं। रचना, रचनाकार, पाठक और आलोचक चारों स्वस्थ चित्त से अपना धर्म निभाएं तो हिंदी बाल साहित्य आजादी के आसपास के साहित्य से आगे बढ़ सकता है। वरना, बाल साहित्य का अंतिम ध्येय भी अखिल भारतीय स्तर के सम्मान-पुरस्कार पाना मात्र रह जाएगा। इससे अधिक हुआ तो पत्रिकाओं के संरक्षक मंडल में सदस्य बन जाएंगे। और अधिक हुआ तो नई पौध की पुस्तकों की समीक्षाएं लिखते रह जाएंगे। कुछ और हुआ तो पुस्तक मेलों के उद्घाटनों में, पुस्तक विमोचनों में फोटो खींचते नजर आएंगे। और अधिक हुआ तो पाठ्य पुस्तकों में एक अदद रचना पढ़ाए जाने से प्रफुल्लित होते रहेंगे। क्या बाल साहित्य का मकसद इतना ही है?

आजादी के बाद से ही अगर संजीदगी से बाल साहित्य में उक्त चारों अपना धर्म निभाते तो अब तक के बच्चे सजग पाठक बन जाते। साहित्यिक पत्रिकाओं के साथ पढ़ने का रिवाज बना रहता और बढ़ता। पुस्तकालयों की संख्या बढ़ती। नित नए खुल रहे मॉल्स, सुपर मार्केट्स में एक नहीं, कई दुकानें किताबों की भी होतीं। हर घर में हर माह बीस-पच्चीस पत्रिकाएं घर बैठे हॉकरों के माध्यम से आतीं। गली-मुहल्लों में जागरण, भंडारे, धार्मिक जमात-पंगतों की संख्या नहीं बढ़ती। नई किताबों पर इस तरह चर्चा होती, जैसे दुपहिया-चौपहिया खरीदने की खबर बैठकों-रसोइयों का विषय बनती है। नई किताब और रचनाकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर बातें होतीं। किताबों-रचनाओं पर विचार गोष्ठियां बढ़तीं।

इन सबसे आगे की बात यह होती कि संवेदनशीलता, मानवता, नैतिकता, सामुदायिकता, सहभागिता से भरे आयोजन हमें दिखाई देते। अब भी वक्त है। बाल साहित्यकार को अपनी रचना छपने-छपाने से पहले एक-दो पाठकों को पढ़ानी चाहिए। हर रचना को छपने-छपाने से पहले एक-दो मित्रों को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़वानी चाहिए। हर बाल साहित्यकार को हर माह अपने एक मित्र की रचना पर आलोचनात्मक दृष्टि डालनी चाहिए। वक्त निकाल कर उस रचना पर लिखित राय बना कर मित्र को जरूर भेजनी चाहिए। यह स्वस्थ और जरूरी परंपरा हिंदी बाल साहित्य में जब तक नहीं बनेगी, तब तक बाल साहित्यकार गफलत में रहेंगे कि वे बाल पाठकों के मन-मस्तिष्क में अपनी रचना की मार्फत सम्मानजनक जगह बनाए हुए हैं।

यह भी कि आज के दौर में यह कहने से बाल साहित्यकार को बचना चाहिए कि साहित्य तो अपने आनंद के लिए लिखा जाता है। अगर ऐसा ही मानना है तो लिखिए और लिख कर सहेज लीजिए। यहां-वहां मत भेजिए। संग्रह भी छपवाना है तो छपवाइए। उसे यहां-वहां मत बांटिए। पुरस्कारों और सम्मानों के लिए गुहार मत लगाइए। जब स्वांत: सुखाय लिखा है, तो बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों को दोष देना बंद कीजिए कि वे पढ़ने की आदत छोड़ चुके हैं। पढ़ने लायक उपलब्ध हो तो ये तीनों खरीदी जाने वाली वस्तु के लिए सुपर मार्केट या आम मार्केट की दर्जनों दुकानें छान आते हैं। आॅन लाईन मंगाते हैं। इसे पढ़ने मात्र से, सोचने-विचारने मात्र से काम नहीं चलेगा। इस दिशा में व्यावहारिक कदम भी उठाइए।

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First Published on November 13, 2016 12:37 am

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