December 11, 2016

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अवलोकन: कहां गईं दादी-नानी की कहानियांं

बचपन की प्यारी यादों का पिटारा जिन अनगिनत बातों को समेटे रहता है उनमें से एक दादी-नानी से सुनी कहानियां भी होती हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर ।

बचपन की प्यारी यादों का पिटारा जिन अनगिनत बातों को समेटे रहता है उनमें से एक दादी-नानी से सुनी कहानियां भी होती हैं। कहानियां जो समाज की व्यवस्था से लेकर परिवार और व्यवहार तक, जीवन के हर पहलू की सीख देती हैं। व्यवहार और संस्कार सींचती हैं। कहानियां बच्चों के व्यवहार और संस्कार दोनों को ही प्रभावित करती हैं। मासूम मन की सीखने की क्षमता और कल्पनाशीलता में किस्से कहानियां रचनात्मक और वैचारिक बदलाव लाते हैं। इनके जरिए उनका मन एक काल्पनिक यात्रा पर निकल पड़ता है लेकिन उसे मिलने वाली सीख जीवन के सच को समझने की राह सुझाती है। मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्तर पर कहानियों में की गई प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति बच्चों के मन मस्तिष्क में गहरी जगह बना लेती है। यही वजह है कि बच्चे कहानियां सुनते ही नहीं गुनते भी हैं। कहानियां बच्चों में धैर्य और सुनने की क्षमता भी बढ़ाती हैं।

कई अध्ययन ये बताते हैं कि जो बच्चे बचपन में कहानियां सुनकर बड़े होते हैं उनके व्यक्तित्व में सुनने का कौशल शुरू से ही समाहित हो जाता है जो आगे चलकर उनके व्यवहार और विचार दोनों को संयमित और संतुलित रखता है। कहानियां सुनकर बच्चों में उनका अपना एक दृष्टिकोण पनपता है। तभी तो वे किस्से में सुनाई जा रही नकारात्मक या सकारात्मक परिस्थिति के अनुसार ही प्रश्न करते हैं। इन प्रश्नों में उन्हें अपने भी कई सवालों के उत्तर मिल जाते हैं। यों बड़े-बुजुर्गों की अनुभवी समझ से निकला बच्चों के सवालों का हल उनके विचारों को सही दिशा और मार्गदर्शन देता है। कुछ समय पहले इंडियन साइको-सोशियो फाउंडेशन द्वारा बच्चों पर किए गए शोध में ये पता चला है कि किस्सागोई बच्चों को संस्कार देकर उनका व्यवहार तो परिष्कृत करती ही है उन्हें तनाव से भी बचाती है। कहानियां उनके मासूम मन को अवसाद और चिड़चिड़ेपन की मानसिक व्याधि से बचाकर बचपन को सुकून और खिलखिलाहट से जोड़े रखती हैं। करीब चार महीने तक बच्चों को किस्सागोई से जोड़े रखने के बाद इस शोध का जो निष्कर्ष सामने आया उसके मुताबिक कहानियां बच्चों के दिलोदिमाग पर गहरा और सकारात्मक असर करती हैं।

दरअसल, हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में आए बदलावों ने बचपन से बहुत कुछ छीन लिया है। एकल परिवारों से इस दौर में बचपन तो है पर बचपना गुम है। एक समय था जब गर्मियों की छुट्टियां कहानियों की सौगात लाया करतीं थीं। दादी-नानी के किस्से इन दिनों जाने कितने गुण और सीख बचपन की झोली में डाल दिया करते थे। लेकिन अब कहानियों के जरिए बच्चों का मनोरंजन करना बीते जमाने की बात हो गई लगती है। मोबाइल फोन और अन्य आधुनिक उपकरणों के दौर में अब कहानियां गुम सी गई हैं। ऐसे में यह एक विचारणीय पहलू है कि इन किस्सों के माध्यम जो परवरिश जो नैतिक आधार पाती थीं, वह भी खत्म हुआ है। कहानियां जो सरलता से आपसी सहयोग, संगठन, अनुशासन और सहनशीलता की शिक्षा देती हैं, अब बचपन का हिस्सा नहीं हैं। कामकाजी अभिभावकों के बच्चे तो स्कूल के अलावा मिलने वाले समय का बड़ा हिस्सा केवल बच्चे टीवी देखने में लगाते हैं। जीवन की भागदौड़ में उलझे अभिभावक भी इन कार्यक्रमों को बच्चों के लिए समय बिताने का आसान सा जरिया समझ बैठे हैं। ऐसे में एकल परिवारों में अब दादी बाबा हैं ही नहीं तो कहानियां सुनाए भी कौन? ऐसे में दुखद है इन किस्से कहानियों का गुम होना जो बचपन से ही बच्चों की वैचारिक सोच को सही दिशा देने में वाकई मददगार हैं।

कहानियां कहने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये बच्चों का भाषायी ज्ञान और शब्दावली बढ़ाती हैं। किस्सागोई से बच्चों के आईक्यू (इंटेलीजेंस कोशेंट) और ई-क्यू (इमोशनल कोशेंट)दोनों में ही बदलाव आता है। बालमनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि कहानियां बालमन को बौद्धिक और भावनात्मक दोनों ही स्तरों पर सकारात्मक ढंग से प्रभावित करती हैं। इसीलिए बच्चे कहानी से भावनात्मक रूप से जुड़कर तो सीख लेते ही हैं, सवाल करना भी सीखते हैं। उनको नए शब्द मिलते हैं। कहानी सुनने के दौरान बच्चों में इतनी उत्सुकता रहती है कि उनका मन मस्तिष्क सजग रहना सीखता है।

कई सारे पात्रों को समेटे रहने वाली कहानियां सही समझाइश और शब्दावली दोनों की सौगात देती है। सच में यह बदलाव बहुत सुखद अनुभूति देने वाला होता है जब बच्चे खेल खेल में नए शब्दों के प्रयोग और अर्थ समझ लेते हैं। इससे नैतिक मूल्यों के साथ-साथ बच्चों की तार्किक सोच और एकाग्रता भी बढ़ाती है। दादी नानी के संदेशपरक किस्से बच्चों में अनुशासन और अपनी सांस्कृतिक विरासत और मातृभाषा के प्रति लगााव को और पुख्ता करते हैं। बचपन भले ही बेफिक्र होता है पर जाने अनजाने कई समस्याओं से जूझता भी रहता है। ऐसे में बच्चों के मनोविज्ञान को रूपायित करने वाली कहानियां उन्हें मन की उलझनों से बाहर लाने का भी काम करती हैं। छोटी- छोटी कहानियां बच्चों के जीवन की कई बड़ी समस्याओं का संक्षिप्त हल लिए होती हैं ।

आजकल बच्चे स्मार्ट गैजेट्स के साथ अपना समय अधिक बिताते हैं। स्कूल की किताबों के इतर किस्से कहानियों की किताबें तो बचपन से गुम सी गई हैं। इसका परिणाम भी हमारे सामने ही हैं। एक अध्ययन के अनुसार आज देश में तीस प्रतिशत स्कूली बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को देखभाल की जरूरत है। मौजूदा दौर में महानगरों में बसे एकल परिवारों में बच्चों का मन और जीवन कई तरह के बदलावों से जूझ रहा है। वे अकेलेपन के शिकार हैं। हाल ही में एसोसिएटेड चैम्बर आॅफ कॉमर्स (एसोचैम) की ओर से देश के महानगरों में किए गए सर्वे में पता चला था कि 8-13 आयु वर्ग के 73 फीसद बच्चे इंटरनेट पर विभिन्न सोशल नेटवर्किग साइट से जुड़े हुए हैं। स्मार्ट फोन भी आजकल कम उम्र में दे दिया जाता है।

ऐसे में टीवी, वीडियो गेम, कम्प्यूटर और स्मार्ट फोन का मायावी संसार उन्हें जानकारियां तो दे रहा है पर मनोवैज्ञानिक सूझबूझ के साथ उनके मन में उपजते सवालों के उत्तर नहीं सुझाता, जो कि दादी-बाबा की सुनाई कहानियों के माध्यम से हुआ करता था। हकीकत तो यह है कि इन गैजेट के चलते बच्चे आत्मकेंद्रित हो संवादहीनता का शिकार बन रहे हैं। ऐसे में किस्से कहानियां बच्चों को फिर मासूमयित से जोड़ सकती हैं। यों भी हमारे देश में किस्सों-कहानियों का जितना समृद्ध इतिहास है दुनिया भर में शायद ही कहीं मिले। मनोरंजन के साथ ही जीवन जीने की सीख देने वाली कहानियां टीवी और इंटरनेट के जमाने में कहीं गुम हो गई हैं पर इनका महत्त्व न तो कम हुआ है और न ही कभी होगा। आज के दौर के बचपन को सहेजने के लिए हमें किस्से-कहानियों की और लौटना ही होगा ।

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First Published on November 20, 2016 2:16 am

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