December 09, 2016

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बाल साहित्य की दिशाएं

हिंदी में बाल साहित्य का क्षितिज व्यापक और विविधवर्णी है। इसका इतिहास भी काफी पुराना है। इसके बावजूद अभी तक इसके सम्यक मूल्यांकन को लेकर कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई है। आज भी बाल साहित्य को ‘बचपने का साहित्य’ ही माना जाता है। क्यों हुई है ऐसी स्थिति और इस समस्या से उबरने का उपाय क्या है? बता रहे हैं दिविक रमेश।

Author November 27, 2016 02:21 am
बाल साहित्य ।

हिंदी का बाल साहित्य लोरी, पालना गीतों, प्रभाती, दोहा, गजल, पहेली, कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, जीवनी, नाटक आदि अनेक रूपों और विधाओं से संपन्न है। आज का बाल साहित्य तो कितने ही सार्थक प्रयोगों से समृद्ध है। लेकिन, इसके सही मूल्यांकन और उसके सही रेखांकन का अभी तक अभाव है। हिंदी के बाल साहित्य के प्रारंभ को लेकर थोड़ा विवाद है। इसे 14 वीं-15वीं शताब्दी के आसपास से उपस्थित माना गया है यानी अमीर खुसरो, सूरदास, जगनिक वगैरह को इसमें शामिल किया जाता है। राजस्थानी कवि जटमल की रचना ‘गोरा बादल’ को बाल साहित्य पहली रचना माना जाता है। अगर इस विवाद में न जाएं तो हिंदी के बाल साहित्य का वास्तविक प्रारंभ आधुनिक काल से यानी बीसवीं सदी के आसपास मानना होगा। बाल साहित्य की शुरुआत के कारणों में से एक शिक्षा के लिए पाठ्य पुस्तकों की तैयारी की जरूरत थी। ईसाई मिशनरी स्कूल स्थापित किए गए और उनके कारण नए प्रकार की शिक्षा प्रणाली ने नई शैली की कहानियां लिखने के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय बाल साहित्य में बच्चों के अनुकूल ऐसा साहित्य लिखा गया है जो पुराने साहित्य की तरह उपदेशात्मक नहीं है। बंगाली में जोगिंद्रनाथ सरकार द्वारा 1891 में लिखित कहानियों की पुस्तक ‘हांसी और खेला’ ने पहली बार कक्ष-कक्षा परंपरा को तोड़ा और यह बच्चों के लिए पूरी तरह मनोरंजक बनी।
रवींद्रनाथ ठाकुर ने इस किताब के बारे में 1893 में ‘साधना’ में लिखा था-यह पुस्तक छोटे बच्चों के लिए है। बच्चों को ऐसी पुस्तकों की जरूरत है, हमारी सभी बाल पुस्तकें कक्षा में पढ़ाने के लिए होती हैं। उन में कोमलता या सुंदरता का कोई निशान नहीं होता…।’ बाल साहित्य के नाम पर एक अरसे तक ‘बालक के लिए साहित्य’ लिखा जाता रहा है जबकि आज ‘बालक का साहित्य’ लिखा जा रहा है। पिछले वर्षों में यह समझ बहुत शिद्दत से आई है कि बालक के लिए नहीं बल्कि बालक का बाल साहित्य लिखा जाना चाहिए। बालक केवल सुनते रहने के लिए नहीं है। वह केवल कर्तव्य निभाने के लिए नहीं बल्कि अपने अधिकारों की मांग करने वाला भी है। नामवर सिंह ने ठीक ही लिखा है,‘उनके लिए तो साहित्य वह है जो उन्हें हिलाए, डुलाए और दुलराए भी। यानी वे खुशी से झूम उठें।’
आज भी ढर्रेदार यानी उपदेशात्मक बाल साहित्य की भरमार है। उसकी विरुदावलियां गाने वाले भी काफी मिल जाएंगे लेकिन विवेचन के मूल में तो उत्कृष्ट साहित्य ही रहना चाहिए। ऐसा नहीं है कि कल यानी पहले का सारा बाल साहित्य पुरानापन लिए हुए है, इसलिए त्याज्य है। स्वतंत्रतापूर्व के बाल साहित्य में भले ही वह काफी कम हो, बहुत उस्तादाना बाल साहित्य मिलता है जो न केवल आज के बच्चे को भी लुभा सकता है बल्कि आज के बाल साहित्यकार को भी प्रेरणात्मक समझ दे सकता है। श्रीधर पाठक की कविता ‘देल छे आए’ की कुछ पंक्तियां देखी जा सकती हैं-

बाबा आज देल छे आए
चिज्जी-पिज्जी कुछ न लाए!
बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए
इतनी देली छे क्यों आए?

विद्याभूषण विभू ने झूम हाथी झूम हाथी, तुन तुन तुन, हिल-मिल भाई, आंधी, खेल- रेल का आदि अनेक ऐसी बाल कविताएं लिखी हैं जिनमें भाषा का सहज खेल देखते ही बनता है। आज तक के बाल साहित्य को दो श्रेणियों में बांट सकते हैं। पहली श्रेणी में वह जिसे बच्चों के लिए विशेष रूप से नहीं लिखा गया था, भले ही कुछ संपादन के बाद उसमें बच्चों का मनोरंजन और उन्हें शिक्षित करने की क्षमता आ सकती हो और इस तरह वह प्रासंगिक भी बन सकता है। इस श्रेणी में कुछ ऐसे रचनाकार जरूर हैं, जिनकी बच्चों के लिए लिखी गई रचनाएं आज भी आनंद दे सकती हैं। सुभद्राकुमारी चौहान, दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त आदि की रचनाएं हैं। मैथिलीशरण गुप्त की ‘मां कह एक कहानी’ विशिष्ट है। दूसरी श्रेणी में वह बाल साहित्य आता है जो विशेष रूप से बच्चों के लिए लिखा गया है। प्रेमचंद के अनुसार बालक को प्रधानत: ऐसी शिक्षा देनी चाहिए कि वह जीवन में अपनी रक्षा आप कर सके। बालकों में इतना विवेक होना चाहिए कि वे हर एक काम के गुण-दोष को भीतर से देखें।

कुछ ऐसी कहानियां और उपन्यास हैं जिन्हें उन्होंने बच्चों के लिए लिखा है। ‘कुत्ते की कहानी’, जिसे हिंदी का पहला बाल उपन्यास कहा जा सकता है और ‘जंगल की कहानियां’ शीर्षक से बाल कहानियों की रचना की है जिनमें जानवरों की प्रमुख भूमिका देखी जा सकती है। जानवरों के मनोविज्ञान को भी प्रेमचंद बखूबी समझते थे। जानवरों के मन की बातों की ऐसी पकड़ और उसकी अभिव्यक्ति साहित्यकारों में दुर्लभ ही होती है। अक्सर तो जानवरों का मानवीयकरण ही कर दिया जाता है। लेकिन प्रेमचंद जानवरों को जानवरों के रूप में ही मौजूद रखते हुए उनके अंतर्मन को बाहर लाने में सक्षम नजर आते हैं। भले ही उन्हें वाणी मानवीय पात्रों की सी दी गई हो। यों ये निरी पशु-पक्षियों की कहानियों नहीं हैं। ये मानवीय संवेदनाओं का ही साक्षात् कराती हैं। उनकी अनेक कहानियां ऐसी भी हैं जो हैं तो वयस्कों के लिए, लेकिन जिनका आनंद बच्चे भी उठा सकते हैं। अच्छी बात यह है कि आज संयोग आदि के कारण नहीं बल्कि अलग से या समांतर रूप से भी बच्चों के साहित्य का सृजन हो रहा है।

आजकल बाल-विज्ञान लेखन और राजा-रानी, परी कथाओं, लोककथाओं पुराणों या इतिहास पर आधारित रचनाओं के संदर्भ में जो विवादयुक्त टिप्पणियां होती हैं उनके पीछे न तो रचनाओं के आधार पर सुचिंतित मंथन दिखता है और न ही खुला विचार। इसलिए जो थोड़ा-कुछ जैसा भी उपलब्ध है उसी को मानने को हम विवश है। बालविज्ञान- साहित्य के संदर्भ में समीक्षक ओमप्रकाश कश्यप का विचार ध्यान देने योग्य है-‘इतना तो तय हुआ कि कल्पना और सृजनात्मकता के बीच कोई बैर नहीं है। उनमें न तो कोई स्पर्द्धा है और न कोई बैर। दोनों एक-दूसरे की पूरक, समानांतर और सहायक हैं। अतएव मात्र अतिकल्पनाशीलता का तर्क देकर परीकथाओं की आलोचना को नीतिसंगत नहीं ठहराया जा सकता। परीकथाएं बालक के कल्पना-सामर्थ्य को निखारकर उसे कई वैकल्पिक समाधान दे सकती हैं।’ हिंदी बाल साहित्य के एक लेखक देवेंद्र मेवाड़ी के शब्दों में, ‘विज्ञान लेखन करते समय बच्चों को मन के आंगन में बुलाना होगा और जैसे उनसे बातें करते-करते या उन्हें किस्से-कहानियां या गीतों की लय में विज्ञान की बातें बतानी होंगी। विज्ञान की कोई जानकारी कथा-कहानी के रूप में दी जाएगी तो उसे बच्चे मन लगा कर पढ़ेंगे। आज बच्चों को विज्ञान की तर्क संगत कहानी चाहिए जो उसे कल्पना लोक में भी ले जाए और उसे यह भी लगे कि हां ऐसा हो सकता है।’

अगर विज्ञान की जानकारी कहानी या कविता आदि रूपों की शर्तों पर नहीं होगी तो भी उसे सर्जनात्मक साहित्य की श्रेणी में लेने में कठिनाई होगी, क्योंकि तब रूप मात्र सांचा भर बन कर रह जाएगा और उसे शिक्षार्थ लिखे गए उपयोगी साहित्य की ही श्रेणी में गिनने को बाध्य होना पड़ेगा। वास्तव में आज वैज्ञानिक सोच या दृष्टि पर बल दिया जाता है। बाल साहित्य से तात्पर्य ऐसे साहित्य से है जो बालोपयोगी साहित्य से भिन्न रचनात्मक साहित्य होता है यानी जो विषय निर्धारित करके शिक्षार्थ लिखा हुआ न होकर बालकों के बीच का अनुभव आधारित रचा गया बाल साहित्य होता है। वह कविता, कहानी नाटक आदि होता है न कि कविता, कहानी, नाटक आदि के चौखटे या शिल्प में भरी हुई विषय प्रधान जानकारी, शिक्षाप्रद या उपदेशपूर्ण सामग्री होता है। वह विषय नहीं बल्कि विषय के अनुभव की कलात्मक अभिव्यक्ति होता है। दूसरे शब्दों में कलात्मक अनुभव होता है। इसीलिए वह मौलिक भी होता है। आज का श्रेष्ठ बाल साहित्यकार पहले की सोच के अनेक बाल साहित्यकारों से इस दृष्टि से भी भिन्न है।

कल्पना पहले के साहित्य में भी होती थी और आज के साहित्य में भी उसके बिना काम नहीं चल सकता। अंतर यह है कि आज के बालक को कल्पनाविश्वसनीयता की बुनियाद पर खड़ी चाहिए। यानी ‘ऐसा भी हो सकता है’ दूसरे शब्दों में आज का बाल साहित्यकार ऐसी रचनाएं नहीं देना चाहता जो अंधविश्वास, सामंती परंपराओं, जादू -टोना, अनहोनियों या निष्क्रियता आदि मूल्यों की पोषक हों। आज की कहानियों में भी भूत, राजा, परी आदि हो सकते हैं, लेकिन वे अपने पारंपरिक रूप से हटकर, ऊपर संकेतित पुरानेपन से अलग तरह के होते हैं। आज की कहानी की परी ज्ञान परी हो सकती है। वह युवा लेखक पंकज चतुर्वेदी की कहानी ‘परी फिर आएगी’ की परी ‘रिमझिम’ हो सकती है, जिसका सरोकार इराक के बसरा में रहने वाली साहिबा, पाकिस्तान की मलाला, तर्की की रेहाना और गंदी होती धरती से है। वह बगदाद से गुजरते हुए रोशनी, संगीत में हर समय डूबे रहनेवाले शहर को आग, धुएं से पटा हुआ देखकर संवेदनशील मनुष्यों की तरह डरने वाली परी है।

आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक, आयु आदि कारणों से बालक का भी विविधताभरा स्वरूप है। महानगरीय बालक का स्वरूप वही नहीं है जो कस्बाई या ग्रामीण या जंगलों में रहने वाले बच्चे का है। आर्थिक दृष्टि से संपन्न बच्चे की मानसिकता वही नहीं है जो गरीबी में पल रहे बच्चे की है। आज के कितने ही बच्चों के सामने इंटरनेट, फिल्म और अन्य मीडिया की सुविधा के चलते एक नई दुनिया और उसके नए भाषा-रूप का भी विस्फोट हो रहा है और वे उससे प्रभावित हो रहे हैं। इसलिए आज का बाल साहित्यकार बालक के बारे में परंपरा भर से काम चलाते हुए यानी उसके विकास की उपेक्षा करते हुए सामान्य कुछ लिखकर अपने कार्य की इति नहीं कर सकता। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में हिंदी के बाल साहित्य में जहां भाव और भावबोध की दृष्टि से बालक के नए-नए रूप उभर कर आए हैं वहीं रूप और भाषा-शैली में भी नए-नए अंदाज और प्रयोग सम्मिलित हुए हैं, भले ही कुछ पहले की सोच में गिरफ्त जन उसे स्वीकार करने में कठिनाई झेल रहे हों। जब हम बालक की बात करते हैं तो हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में अमीरी-गरीबी, जाति-पांत, भौगोलिक और अन्य स्थितियों आदि के कारण बाल वर्ग बंटा हुआ है। आज के कुछ साहित्यकारों का उस ओर ध्यान है, लेकिन कल लिखे जाने वाले साहित्य में और ध्यान दिया जाना अपेक्षित है। अपने-अपने अनुभव के दायरों के बच्चों के बालमन को समझते हुए रचना होगा। ग्रामीण परिवेश के बच्चों के साथ-साथ आदिवासी बच्चों तक ठीक से पहुंचना होगा।

अच्छी बात यह है कि आज से आगे के बाल साहित्य को सशक्त बनाने वाली पीढ़ी हमारे सामने मजबूती से उभर रही है। इधर प्रदीप शुक्ल, वीणा भाटिया आदि बहुत से साहित्यकार हैं, जिनकी लेखनी की चर्चा होती है। आज के बाल साहित्य में हम आसानी से भाषा के कई रूप देख सकते हैं। लोकभाषाओं के, उर्दू के, अंग्रेजी के शब्द बाल साहित्य में धड़ल्ले से प्रयुक्त हो रहे हैं। लहजे की दृष्टि से भी आज का हिंदी बाल साहित्य बहुत विविधतासपन्न है। व्यंग्यात्मक, हंसीप्रधान, छेड़छाड़वाला, गंभीर, ध्वन्यात्मक, मुहावरेदार, बिंबात्मक, संवादात्मक आदि अनेक प्रकार का भाषा-लहजा आज के बाल साहित्य में चार चांद लगाए हुए है। असल में हिंदी बाल साहित्य की हिंदी का प्रश्न कम से कम दो आयामी है। एक तो यह कि पिछले कुछ वर्षों में श्रेष्ठ बाल साहित्य की हिंदी अपने सहज विविध रूप में विकसित हुई है और अपने समय के बच्चे के संग-साथ से भी संभव हुई है और दूसरी ओर बाल साहित्यकारों ने इस समझ का परिचय दिया है कि जैसे बालक पर खुद को लादना अनुचित है उसी प्रकार बालक पर कृत्रिम भाषा को लादना भी अनुचित है। उसका उद्देश्य अपने सीमित रूप में बालक के शब्दकोश में वृद्धि करना तो हो सकता है लेकिन वह होना चाहिए सहज रूप में ही, खेल-खेल की शैली में। भाषा की दृष्टि से भी बाल साहित्यकार का उद्देश्य बालक को बाल साहित्य का सहज भागीदार बनाना अधिक होता है बजाय उसे ज्ञानवान बनाने के।

शब्दों का उपयोग खपता हुआ होना चाहिए। अंग्रेजी के जो शब्द प्रचलित होकर हमारे रोजमर्रा के उपयोग का हिस्सा बन चुके हैं यानी हिंदी के द्वारा गोद ले लिए जा चुके हैं उनके उपयोग को (खिचड़ी भाषा के नाम) पर जबरन हटाकर कुछ गढ़े हुए अप्रचलित तत्सम आदि शब्दों का लादना कहां तो उचित होगा इस पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है। हां, इतना अवश्य माना जा सकता है कि बाल साहित्यकार की भाषा (हिंदी) संबंधी अपनी कमजोरी के कारण अंग्रेजी आदि अन्य भाषाओं के अशुद्ध शब्दों से बाल साहित्य को लाद देने की प्रवृत्ति से भी बचा जाना चाहिए। बाल साहित्यकार एक मार्गदर्शक भी होता ही है । आज हिंदी के बाल साहित्यकार भाषा-शैली की दृष्टि से भी अपने-अपने विशिष्ट पथ बनाने की ओर अग्रसर हैं, बड़ों के लिए लिखने वाले बाल साहित्यकरों की तरह। यह बात आज के बाल साहित्य के लिए तो शुभ है ही आने वाले कल के साहित्य के लिए भी शुभ होगी।

 

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First Published on November 27, 2016 2:19 am

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