December 10, 2016

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कहां चले जाते हैं बाल कलाकार

सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों का असर फिल्मों पर हमेशा पड़ता रहा है। बस उसका अंदाज बदलता रहा है। श्रीश्चंद मिश्र का लेख।

Author October 30, 2016 01:31 am
एक अरसे बाद पिछले साल ‘बजरंगी भाईजान’ में एक बाल कलाकार ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।

श्रीश्चंद मिश्र

एक अरसे बाद पिछले साल ‘बजरंगी भाईजान’ में एक बाल कलाकार ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। करीब एक दशक पहले बाल मनोविज्ञान पर बनी ‘तारे जमीं पर’ के बाद कोई कलाकार फिल्म का भावनात्मक हिस्सा बना नजर आया। बीच में, हालांकि अमोल गुप्ते, विशाल भारद्वाज, प्रियदर्शन आदि ने बाल कलाकारों को लेकर फिल्में बनार्इं, लेकिन उनका व्यापक असर नहीं हुआ। यह शायद समय और स्थितियों में बदलाव का असर है कि पिछले दो दशक में फिल्मों और टीवी की भूमिका में अदला बदली हो गई है। टीवी सीरियलों में बाल कलाकार बहुलता में दिखने लगे हैं। जबकि फिल्मों में उनका अस्तित्व नाममात्र का रह गया है। बच्चों की मानसिकता और उनकी आकांक्षाओं पर सीरियलों या टीवी शो सामने आ रहे हैं। दूसरी तरफ बच्चों पर केंद्रित फिल्मों का अकाल सा है। कभी लोरी फिल्मों का खास हिस्सा होती थी।

सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों का असर फिल्मों पर हमेशा पड़ता रहा है। बस उसका अंदाज बदलता रहा है। इन दिनों जो फिल्में बन रही हैं, उनमें एक्शन और भव्यता इतनी हावी है कि बाल कलाकारों के लिए ज्यादा गुंजाइश ही नहीं निकल पाती। या तो ‘आत्मा’, ‘एक थी डायन’ आदि फिल्मों की तरह उन्हें भूत प्रेतों के आतंक का शिकार दिखा दिया जाता है या पति-पत्नी के रिश्तों में किसी तीसरे या तीसरी के प्रवेश से बनी तनावपूर्ण स्थितियों का उन्हें मूक दर्शक बना दिया जाता है। बाल मनोविज्ञान और बच्चों की स्वाभाविक जिंदगी पर पहले भी कम फिल्में बनीं और अब यह परंपरा ज्यादा सिकुड़ गई हैं। सौ साल के फिल्मी सफर में बचपन फिल्मों का हिस्सा रहा है। 1913 में बनी दादा साहब फालके की फिल्म राजा ‘हरिश्चंद्र’ से यह नाता जुड़ा जो एक अरसे पहले तक निभाया जाता रहा। तब हरिश्चंद्र के बेटे की भूमिका फालके की बेटी ने की थी।

उन्नीस सौ पचास का दशक पारिवारिक फिल्मों का एक ऐसा तूफान लाया जिसमें रिश्तों के टकराव को अतिनाटकीयता की सीमा तक ऐसे भावुक और मार्मिक अंदाज में परोसा गया कि नायिका के लिए जार-जार आंसू बहाना अनिवार्य हो गया। पति-पत्नी में में अनबन, पत्नी के चरित्र को लेकर कुटिल पात्रों की खड़ी की गई आशंकाओं और बहू-सास के संबंधों पर बनी इन फिल्मों में बाल कलाकारों को ज्यादा महत्त्व मिला। उनकी लोकप्रियता भी बढ़ी और मांग भी। लेकिन यह सिलसिला ज्यादा नहीं चला। रोमांटिक फिल्मों के दौर में बच्चों की ज्यादा जरूरत नहीं रह गई। चाय वाले या घरेलू नौकर के रूप में कामेडी की थोड़ी बहुत फुलझड़ी छोड़ना ही उनका काम रह गया। बाल कलाकारों का फिल्मों में रहना तब औपचारिक मान लिया गया जब ‘शोले’ ने फिल्मों को हिंसक बनाया और ‘जंजीर’ ने उसे प्रतिशोध का नया आधार दे दिया। शुरुआत तो खैर

‘यादों की बारात’ से हो गई थी लेकिन अमिताभ बच्चन के उदय ने इस चलन को तेजी से आगे बढ़ाया। ईमानदार पुलिस अफसर या सरकारी अधिकारी, नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला गांव या कस्बे का अध्यापक, गांव के महाजन या शहर के मिल मालिक के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाला मजदूर जब भी अपने परिवार के साथ फिल्म के शुरू में दिखता था, तय हो जाता था कि बुराई और अन्याय का विरोध करने की सजा उसे अपनी जान देकर चुकानी होगी। होता भी यही रहा। बच जाते एक दो बच्चे। वे भी पांच सात मिनट में आगे की रूपरेखा का आभास देने के बाद गायब हो जाते थे। इसके अलावा फिल्मों में बच्चों की कोई अहमियत नहीं रही। कुछ गिनी चुनी फिल्मों में बाल कलाकारों को व्यापक व मजबूत चरित्र मिला भी लेकिन ऐसी फिल्में कभी कभार ही दिखीं।

सड़क पर रहने वाले अनाथ बच्चों के संघर्ष पर 1954 में प्रकाश अरोड़ा के निर्देशन में राजकपूर ने ‘बूट पालिश’ बनाई। फिल्म में नाज और रतन कुमार की मुख्य भूमिका थी। मुसीबतों के बीच भी एक दूसरे का दुख दर्द बांट कर जिंदादिली से जीवन जीने का सबक देने वाली थी यह फिल्म। ‘कब से बैठे आस लगाए, हम मतवाले पालिस वाले’ और ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है’, जैसे गीतों की वजह से फिल्म काफी सराही गई।

बच्चों को केंद्रीय भूमिका में लेकर बचपन (1970), बालक (1969)बिन मां के बच्चे (1983), नौनिहाल (1967) विद्यार्थी (1968) सरीखी कई फिल्में बनीं, लेकिन ज्यादातर अतिनाटकीयता की शिकार रहीं और बच्चों की स्वाभाविक समस्याओं को नहीं छू पाई। यह सुखद आश्चर्य है कि सार्थक और उद्देश्यपूर्ण फिल्मों को आर्थिक मदद देने के लिए 1960 में फिल्म वित्त निगम का गठन करने से पांच साल पहले ही सरकार ने बाल फिल्मों को प्रोत्साहन देने के लिए बाल चलचित्र समिति की स्थापना कर दी। यह वही साल था जब सत्यजीत राय की पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ रिलीज हुई थी। समिति का नाम बाद में चिल्ड्रंस फिल्म सोसायटी हो गया। इस व्यवस्था के तहत बाल फिल्में तो बनी। विशुद्ध मनोरंजन की जगह उनमें ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक विषयों को प्राथमिकता दी गई। 55 साल में चिल्ड्रंस फिल्म सोसायटी ने करीब साढ़े चार सौ फिल्में बना डालीं। लेकिन उन फिल्मों के प्रदर्शन की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाई। अब तो खैर सरकारी मदद से किसी भी तरह की फिल्में बनने का चलन ही खत्म हो गया है।

हाल फिलहाल के सालों में भी बाल फिल्में कभी कभार बनती रही हैं, सबसे उल्लेखनीय रही ‘तारे जमीं पर’ जिससे अभिनेता आमिरखान पहली बार निर्देशक बने। उसी की तरह ‘पाठशाला’ भी बनाई गई लेकिन वह ज्यादा हास्यास्पद साबित हुई। ‘भूतनाथ’,‘तारा पम पम’, ‘चिल्लर पार्टी’ आदि में आज के बच्चों की मानसिकता को दिखाया गया जिसमें सुलभता कम, चपलता और समझदारी ज्यादा हावी रही। प्रियदर्शन ने ‘बम बम भोले’ में बाल भावनाओं का मार्मिक चित्रण करने की कोशिश की लेकिन एक तो वह ईरानी फिल्म की नकल थी, दूसरे विषय के लायक माहौल और स्थितियां रचने में वे सफल नहीं हो पाए। बाल फिल्मों में ‘आईएम कलाम’, ‘नन्हा जैसलमेर’, ‘मकड़ी’, ‘ब्लू अंब्रेला’ व ‘स्टेनले का डिब्बा’ जैसी फिल्मों ने सुरुचिपूर्ण धारा बहाने की कोशिश तो की लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।

एक समय वह जरूर था जब बाल कलाकार के रूप में करिअर शुरू करने वाले कलाकारों ने बड़े होकर भी ख्याति पाई। नरगिस, मीना कुमारी, मधुबाला, सुरैया, राज कपूर, शशि कपूर, आमिर खान, ऋतिक रोशन बाल कलाकार के रूप में अभिनय करते दिखे। खास बात यह है कि इनमें से नरगिस और मीना कुमारी के अलावा बाल अभिनय में कोई और प्रतिष्ठित नहीं हो पाया। उन्होंने तब अभिनय के करिअर को गंभीरता से नहीं लिया और सिर्फ शौकिया तौर पर फिल्मों में अपना चेहरा दिखा दिया। इन कलाकारों में शशि कपूर को छोड़ कर और किसी को बाल कलाकार के रूप में बड़ी व महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं मिली।

यही वजह है कि बाल कलाकार के रूप में उनकी कोई ऐसी लोकप्रिय छवि नहीं बन पाई जो बड़े होने पर उनके लिए बाधा साबित होती। जो बाल कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित या लोकप्रिय हो गए उन्हें एक सीमित समय के लिए खूब वाहवाही मिली लेकिन बचपन का असर खत्म होते ही उनकी मांग खत्म हो गई। बच्चियों के लिए तो मुश्किलें कुछ ज्यादा ही रहीं। बच्ची से युवती बनने की प्रक्रिया में डेजी ईरानी, हनी ईरानी, बेबी फरीदा, तबस्सुम जैसी कई बाल अभिनेत्रियां गुम हो गर्इं। बाल सुलभ चपलता के जो रंग उन्होंने दिखाए, वे बड़े होते ही उनकी कमजोरी बन गए। ‘चिराग कहां रोशनी कहां’ जैसी दर्जन भर फिल्मों में अपनी बड़ी बड़ी आंखों और मासूमियत से तहलका मचाने वाली डेजी ईरानी को बड़े होने पर बहन टाइप की छोटी भूमिकाएं ही मिलीं, वह भी गिनी चुनी। पिछले दिनों एक चाकलेट के विज्ञापन व एक टीवी धारावाहिक की मेहमान भूमिका में डेजी दिखीं।

उनकी बहन हनी ईरानी बाल अभिनय से आगे नहीं बढ़ सकीं। लेखक व गीतकार जावेद अख्तर से शादी करने के बाद उन्होंने ‘अमानत’ व ‘लम्हे’ जैसी फिल्में लिखीं। तबस्सुम की चटर पटर कर की गई बातें बाल कलाकार के रूप में तो सबको प्यारी लगी लेकिन कैशोर्य अवस्था में पहुंचते ही उनकी यह सबसे बड़ी अयोग्यता बन गई। अपने बाल हुनर का इस्तेमाल उन्होंने मंचों पर चुटकुले सुना कर या रेडियो व टीवी पर कार्यक्रम पेश करके जरूर किया। फिल्मी हस्तियों से बातचीत पर आधारित उनका टीवी शो ‘फूल खिले हैं गुलशन गुलशन’ काफी लोकप्रिय हुआ। लेकिन तबस्सुम की अभिनय की गाड़ी नहीं चल पाई। कई साल पहले फिल्म ‘चमेली की शादी’ में वे एक छोटी भूमिका में आईं।

‘आखिरी खत’ में एक साल की उम्र में आए बॉबी बाद में बाल कलाकार के रूप में भी नहीं चल पाए। महेश बाल अभिनय के बाद ‘राजा और रंक’ में नायक बने और वह भी दोहरी भूमिका में लेकिन आगे नहीं चल पाए। अलंकार की भी यही स्थिति रही। उनकी बहन पल्लवी की मासूमियत युवती बनते ही उनका अवगुण बन गई। ‘अनुराग’ से चर्चा में आए सत्यजित को ‘पहेली’ में नायक बनने का मौका मिला लेकिन उसके बाद उनके अभिनय की गाड़ी ‘शोला और शबनम’ व ‘दुलारा’ की चरित्र भूमिकाओं तक अटक कर रह गई।

सचिन, सारिका, सोनिया, राजू श्रेष्ठ आदि उन्नीस सौ सत्तर के दशक के सबसे सफल व लोकप्रिय बाल कलाकार रहे। इनमें सबसे ज्यादा फिल्में राजू ने की। लेकिन नायक बनने का उन्हें मौका ही नहीं मिल पाया। फिल्मों और टीवी पर सहायक भूमिकाएं ही उनके हिस्से में आती रही हैं। सचिन बड़े होकर अपेक्षाकृत ज्यादा चले। सोनिया का बाल कलाकार के रूप में करिअर ‘दो कलियां’ व ‘वारिस’ जैसी तीन चार फिल्मों तक सीमित रहा। बाल कलाकारों के सामने यही बड़ी बाधा रही कि प्रतिभा दिखाने के बावजूद बच्चे से बड़े होने की वे प्रक्रिया में लगभग गुम हो गए। १

 

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First Published on October 30, 2016 1:31 am

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