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कहानी- चादर

दिन का काम खत्म हो चुका था। वह ब्रीफकेस में अपना सामान सहेज कर घर लौटने की तैयारी में था कि सिक्योरिटी गार्ड ने उसके केबिन के दरवाजे पर दस्तक देकर प्रवेश किया।
Author October 22, 2017 04:33 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सुधेंदु ओझा 

दिन का काम खत्म हो चुका था। वह ब्रीफकेस में अपना सामान सहेज कर घर लौटने की तैयारी में था कि सिक्योरिटी गार्ड ने उसके केबिन के दरवाजे पर दस्तक देकर प्रवेश किया।
‘साहब कोई औरत आप से मिलना चाहती है, यह दोपहर में भी आई थी। मैंने बताया कि साहब शाम को आते हैं, इसलिए अभी आई है।’
‘भेज दो।’
थोड़ी देर बाद अट्ठाईस से तीस वर्ष की साफ रंग, तीखे नयन-नक्श की एक दुबली-पतली युवती साड़ी में लिपटी हुई उसकी टेबल के सामने खड़ी थी। घर से बाहर निकलने वाली कामकाजी औरतों की तरह उसने पैरों में सैंडल नहीं, बल्कि हवाई चप्पल पहनी हुई थी। उसने महिला को बैठने का इशारा किया।
‘इतनी देर रात आई हैं!’
‘जी। मैं दिन में आई थी, पर बताया गया कि आप शाम को आते हैं इसलिए…’
‘तुम्हारा नाम क्या है?’ उसने पूछा।
‘शकुंतला।’ जितना पूछा गया था, युवती ने उतना ही जवाब दिया।
‘शकुंतला, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हंू?’ उसने पूछा।
‘सर! काम की तलाश में आई थी, अखबार में आपका विज्ञापन देखा था।’ युवती ने छोटा बटुआ खोला और उसमें सहेज कर रखा एक पुर्जा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।
‘यह विज्ञापन तो लगभग छह महीने पहले का है। अब तो कोई वेकेंसी भी नहीं है।’ उसने पुर्जा युवती को लौटाते हुए कहा।
‘सर! मैं जानती हूं कि यह विज्ञापन बहुत पुराना है। मैं पहले भी कई बार आई थी, पर हर बार यही जवाब मिला कि आप देर शाम को आते हैं, इस वजह से लौट जाती थी।’ युवती ने धीमी आवाज में जवाब दिया।
‘सर! मैं आपके पास मदद की उम्मीद से आई हूं। आप मुझे काम पर रख लीजिए। बुरा समय चल रहा है, इस वजह से मुसीबत में हूं।’ शकुंतला ने उसकी तरफ देखते हुए कहा।
वह तय नहीं कर पा रहा था कि युवती के अनुरोध पर वह उसे क्या जवाब दे। जहां तक बात आॅफिस स्टाफ की थी, उसे कोई जरूरत नहीं बची थी। पर युवती की दयनीय स्थिति और उसकी बातें उसे कुछ सोचने पर विवश करती थीं।
मेज पर रखे फोन की घंटी बजने लगी। दूसरी तरफ से उसकी पत्नी थी, जो अभी तक उसके घर न पहुंचने का कारण जानना चाहती थी। बस जल्दी ही निकलने की बात कह कर उसने फोन रख दिया।
तभी अचानक उसके केबिन के दरवाजे पर तेजी से दस्तक हुई। दरवाजे को धकेलते हुए बिल्डिंग के गार्ड ने कमरे में प्रवेश किया। ‘सर! गली में दंगा भड़क उठा है। बाहर निकलना खतरनाक है। आप आॅफिस अंदर से बंद कर लें, हम लोग बिल्डिंग में बाहर से ताला लगा कर पीछे की तरफ से फिर बिल्डिंग में आ जाएंगे। आप कमरे की लाइट बुझा देंगे तो भीड़ को ऐसा लगेगा कि बिल्डिंग में कोई नहीं है। हम बिल्डिंग के इस समय खुले दूसरे आॅफिसों को भी ऐसा करने को कह रहे हैं।’ एक सांस में अपनी बात कह कर गार्ड कमरे से बाहर निकल गया।
उसने दफ्तर की सारी ट्यूबलाइटें बुझा दीं। कोने में छोटे से मंदिर में दीये की शक्ल में जल रहे बल्ब के प्रकाश पर कमरे का अंधेरा हावी था।
वह खुद को दुरूह स्थिति में फंसा पा रहा था। रात बढ़ रही थी, बिल्डिंग के बाहर का माहौल खराब था। उसके आॅफिस में एक नितांत अपरिचित युवती थी और वह अकेला। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या बोले, या फिर सामने बैठी युवती से क्या कहे।
‘तुम अपने बारे में कुछ बताओ।’ उसने कहा।
‘जी! मैं अपने बारे में क्या बताऊं? कुछ भी नहीं है बताने को। जो कुछ है उसे भुला देना ही बेहतर है।’ उसने एक दीर्घ निश्वास छोड़ी।
जाड़े की रात में भी उसे लगा कि युवती की सांस काफी गरम थी, जो उसके हृदय तक पहुंच गई थी।
अचानक उसे लगा कि उससे बहुत बड़ी गलती हो गई थी। रात लगभग साढ़े दस बजे का समय हो रहा था और उसने युवती से खाने के बारे में नहीं पूछा था।
‘सुनो! देखो शायद फ्रिज में कुछ खाने का सामान मिल जाए।’
युवती जो अब तक सहज और शायद आॅफिस के भूगोल से परिचित हो चुकी थी। उठ कर फ्रिज तक पहुंच गई। उसने फ्रिज का दरवाजा खोला और बहुत उत्फुल्लता से कहा- ‘सर! यहां तो बहुत कुछ रखा हुआ है, क्या-क्या लाऊं? अच्छा आप कुछ न बताइए आज का डिनर मैं ही तैयार करती हूं, बस इतना बता दीजिए कि प्लेट्स वगैरह कहां रखी हुई हैं।’
उसे लगा कि बिना उसके उठे बात नहीं बनेगी। कमरे में प्रकाश बहुत कम था और प्लेट्स उस जगह रखी हुई थीं जहां घुप्प अंधेरा था।
जैसे ही वह अपनी कुर्सी छोड़ कर उठा, मंदिर की बत्ती का साथ भी छूट गया। उसे कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा था। आगंतुकों के लिए रखे सोफे से सट कर, तिपाई से टकराते हुए वह प्लेटों तक पहुंच गया। उन्हें लेकर एक बार फिर वह अनुमान से उस दिशा की तरफ बढ़ा, जिस तरफ फ्रिज रखा हुआ था। कमरे के इस कोने में घुप्प अंधेरा था। उसे लगा कि वह फ्रिज के पास पहुंचने वाला है।
‘अब तुम जरा फ्रिज खोल दो, फ्रिज की लाइट से कुछ देख सकूंगा।’
‘कब तक?’ उसने फ्रिज का दरवाजा खोलते हुए कहा।
प्लेटें उसके पास रख कर वह वापस अपनी जगह लौट आया।
दस मिनट की मेहनत के बाद युवती दो प्लेटों में ब्रेड-बटर उसकी मेज पर रख कर फिर दो ग्लास में कोल्ड ड्रिंक लेकर आ गई।
‘क्या आप अक्सर रात यहां रुकते हैं?’ उसने पूछा।
‘नहीं तो।’
‘फिर फ्रिज में इतना सामान क्यों भरा हुआ है?’
मैं लिखते-पढ़ते हुए कुछ न कुछ चरता रहता हूं।’
अन्न पेट में जाने के बाद उसे लगा कि वह और शिथिल हो गया है। पर सामने बैठी युवती का व्यवहार उसमें कौतूहल जगा रहा था। वह उस युवती के बारे में सोचने लगा।
यह औरत प्रोफेशनल है? नहीं… नहीं लगता। इसकी स्थिति और मजबूरी इसे इस तरह के व्यवहार के लिए मजबूर कर रही है। वह अनुमान के इन्हीं दो पासंग के मध्य झूल रहा था।
‘आप क्या सोच रहे हैं?’ युवती ने उसे खामोश देख कर प्रश्न किया।
‘कुछ नहीं।’ उसने कहा।
रात भागी जा रही थी। सर्दी बढ़ रही थी।
‘ऐसा करो! तुम सोफे पर आराम कर लो, बगल की सेटी से एक-दो चद्दर निकाल लो।’ उसने युवती से कहा।
‘और अगर मैं कहूं कि मुझे अभी नहीं सोना है तो?’
वह सोचने लगा कि उसने कैसे उस युवती से सोफे पर सोने के लिए कह दिया? कोई अपरिचित महिला किसी अनजान व्यक्ति के कमरे में रहते क्या ऐसा करेगी?
‘क्या यहां चाय बन सकेगी?’ युवती के इस प्रश्न ने उसे हतप्रभ कर दिया।
‘वहां परकोलेटर है, कॉफी बन सकती है।’
‘मुझे उसे इस्तेमाल करना नहीं आता। आप एक बार समझा दो।’ कुर्सी से उठ कर वह कॉफी बनाने लगा।
शकुंतला उसके शरीर के साथ लग कर खड़ी हो उसे कॉफी बनाते देखती रही।
वह कॉफी लेकर मेज पर उसके सामने बैठ गई।
कॉफी बनाते हुए शकुंतला का उससे सट कर खड़ा होना उसके शरीर में एक अजीब सनसनाहट पैदा कर गया था। शकुंतला के शरीर से उठती गर्मी परकोलेटर में खौल रही कॉफी से कहीं अधिक थी। उसके मन में नर-नारी संबंधों की एक नई इबारत गढ़ी जा रही थी।
‘शकुंतला तुम अपने बारे में कुछ बताओ।’ उसने मन में उठ रहे विचारों पर नियंत्रण करते हुए उससे कहा।
‘तो आपने मुझे मेरे नाम से बुला ही लिया। मैंने तो समझा कि मैं इतनी बुरी हूं कि आप मेरा नाम भी अपनी जुबान पर कभी नहीं लाएंगे।’
‘मेरे पति स्कूटर चलाते हैं, किराए का। उनका स्वास्थ खराब रहता है। उनकी शराब की आदत है, जो मेरी मुसीबत की जड़ है। मुश्किल से महीने में आठ-दस दिन वे काम करते हैं। आमदनी का ज्यादा हिस्सा शराब पर उड़ा देते हैं। एक बेटी और एक बेटा है। बेटी बड़ी है बारह-तेरह साल की। बेटा छोटा है, अभी आठवें साल में गया है’।
‘आप सो रहे हैं क्या?’ मुझे चुप देख कर उसने पूछा। ‘कम से कम हां-हूं तो कर दीजिए।’
‘हां।’ उसने कहा।
‘मां-बाप की मैं चौथी लड़की थी। दो मेरे बाद में भी थीं। पिताजी खारी बावली में परचून की दुकान करते थे। आय इतनी नहीं थी कि वे बच्चियों को ज्यादा पढ़ा लिखा सकते। जो जैसा लड़का सामने आया मां-बाप ने हमारे हाथ समय-असमय पीले कर दिए।’
‘हां।’
‘मेरी शादी भी सुरेश से ऐसे ही हुई थी। ये हमारे मुहल्ले में ही सुबह शाम स्कूल के बच्चों को स्कूटर पर ढोते थे। इनकी मां ने मेरी मां से बात बढ़ाई और हमारी शादी हो गई, मैं मुश्किल से तेरह-चौदह साल की थी तब।’
‘हूं।’
‘मेरे माता-पिता की मौत हो चुकी है। दुकान भाइयों के पास है। दुकान से किसी तरह उनकी गरीबी ढंकी रहती है। सुरेश की मां भी मर चुकी है।’
‘मैंने अभाव में अपनी एक बेटी को बारह साल की उम्र में तड़प-तड़प कर जान देते हुए देखा है। भगवान किसी मां को अपने बच्चे की ऐसी मौत न दिखाए।’ शायद उसकी आंखों के कोर गीले हो गए थे। उसकी आवाज में भावुकता की वजह से कंपन था।
‘क्या हुआ था उसे?’ उसने पूछा।
‘टीबी!’
‘हां’
‘मेरा आदमी जब शराब नहीं पीता तो सब ठीक-ठाक रहता है। शराब पीते ही वहशी हो जाता है। एक बार शराब को हाथ लगा लेता है तो हफ्ते भर तक बोतल से ही चिपका रहता है। घर में चूल्हा जलता है या नहीं, उसे कोई फिक्र नहीं। बच्चों के पेट में अन्न गया या नहीं, उसे कोई सरोकार नहीं। वह मुझे बहुत चाहता है, पर शराब के आगे बेबस है। मुझे कहीं काम नहीं करने देता। बड़ी बेटी के टीबी के इलाज के लिए मैंने एक-दो घरों में रोटी बनाने का काम शुरू किया था। पर सुरेश शक्की मिजाज का है। जरा देर-सवेर होने पर मेरी बेइज्जती करता और लड़-झगड़ कर मेरा काम छुड़वा देता था।’
‘जब मैं दो-तीन हफ्ते पहले आपके यहां आई थी, मेरी बेटी जिंदा थी। उसकी मौत को अभी एक हफ्ता हुआ है। उसकी मौत से मुझे जो दुख पहुंचा वह तो एक मां ही जानती है, पर उसने मुझे मजबूत भी किया है। वह समझदार बिटिया मुझे काम करता देखना चाहती थी, अपनी बहन और भाई को शिक्षित देखना चाहती थी।’
उसे लगा शायद वह हिचकियां ले रही थी।
‘अब तुम्हारा आदमी?’ उसने प्रश्न किया।
‘सुरेश को तीन दिन पहले पुलिस उठा ले गई।’ अब मैं दोबारा उस नरक में नहीं जाऊंगी।’ उसने निर्णय के भाव से कहा।
‘बच्चे कहां हैं अभी?’
‘घर पर ही हैं, पर मैं वह अभिशप्त घर भी छोड़ दूंगी। जैसे वहां किराए पर थी, वैसे कहीं और मिल जाएगा।’
‘मैं तुम्हारे स्वभाव से परिचित नहीं हूं’।
‘मेरा स्वभाव आपकी आंख का इशारा है। मुझे धन-जायदाद का लोभ नहीं है। मेहनत, परिश्रम और हया यही मां-बाप की देन है।’
‘हया?’
‘हां, इसे नीलाम नहीं किया है।’
‘तुम सो जाओ। रात बहुत हो चुकी है।’
‘आप सोफे पर लेट जाएं, मैं यहीं फर्श पर लेट जाती हूं।’
‘नहीं, तुम सोफे पर आराम से लेट जाओ। मैं इस कुर्सी पर आराम से हूं।’ उसने पैर फैलाते हुए कहा।
शकुंतला काफी ना-नुकुर के बाद सोफे पर जाकर लेट गई।
वह कुर्सी पर उनींदी आंखों के साथ बैठा रहा। नींद आना चाहती थी, पर कोई आगत, हठ करके उसे उसकी आंखों में नहीं उतरने दे रहा था। उसने कोहनी के सहारे अपने चेहरे को हाथ से ढंक लिया। वह ऊहापोह, असमंजस, किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में था। सर्द रात उसे एक प्रश्न में धधका कर भागी जा रही थी। वह खुद को अजीब सी स्थिति में पा रहा था।
उसे लगा वह अचानक ही जीवन के दोराहे पर आ-खड़ा हुआ है। एक ऐसे स्थान पर, जहां वह खुद चल कर नहीं आया था, पर जहां उसे परिस्थिति ने पहुंचा दिया था।
बाहर कुछ कोलाहल शुरू हो गया था। स्तब्ध रात का आखिरी पहर था।
शकुंतला सोफे पर अस्त-व्यस्त वस्त्रों में सिमटी हुई सो रही थी।
उसने आहिस्ते से अपनी कुर्सी छोड़ी और सेटी से चादर निकाल कर उसके बदन को ढंक दिया।
ग्लानि के स्थान पर उसे मन में संतोष का भाव मिला। कुर्सी पर वापस आकर जो बैठा तो उसे कब नींद ने अपने आगोश में ले लिया, पता ही नहीं चला। ०

 

 

 

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