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बदलाव की जरूरत

अनुराग कश्यप की फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ को लेकर भी अच्छा-खासा विवाद हो चुका है। सबको पता है कि सेंसर बोर्ड को किसी फिल्म में काट-छांट करने का अधिकार नहीं है।
Author July 16, 2017 03:48 am
प्रतीकात्मक चित्र

अजित राय

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की संहिताएं दूरदृष्टि के साथ बनी हैं, पर ह्यशिष्टता-नैतिकता की सीमाह्ण, ह्यकिसी समूह की मर्यादा का भंग होनाह्ण, और ह्यसमिति के अपने विवेक के इस्तेमाल की छूटह्ण आदि ऐसे वाक्य हैं, जिनकी अवधारणाएं गणितीय या तकनीकी ढंग से निर्धारित नहीं की जा सकतीं। कान फिल्म समारोह में जब सुधीर मिश्रा से पूछा गया कि भारत में वैसी फिल्में क्यों नहीं बनतीं जैसी यहां दिखाई जा रही हैं, तो उनका सीधा जवाब था कि भारतीय फिल्मकारों को वैसी आजादी नहीं है, जैसी अमेरिकी-यूरोपीय फिल्मकारों को हासिल है। यह पूछे जाने पर कि क्या यह दबाव सेंसर बोर्ड की सख्ती के कारण है, उनका कहना था कि नहीं, यह भारतीय समाज की मानसिक बनावट के कारण है। साफ है कि सेंसर बोर्ड पर जब भी बहस होती है, हम बुनियादी मुद्दों से भटक जाते हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, जिसे आम बोलचाल में सेंसर बोर्ड कहा जाता है, एक बार फिर चर्चा में है। इस बार नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन पर सुमन घोष की गैर-फीचर फिल्म ‘दि आर्गुमेंटेटिव इंडियन’ को प्रमाणपत्र देने को लेकर सेंसर बोर्ड के कुछ सदस्यों द्वारा ‘गुजरात’, गाय’, ‘हिंदू इंडिया’ और ‘हिंदुत्व’ शब्दों को मौन करने की बात पर विवाद हो रहा है। सेंसर बोर्ड का कहना है कि जिन संदर्भों में फिल्म में इन शब्दों का प्रयोग किया गया है, उससे सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952 के कई कानूनी दिशा-निर्देशों (गाइडलाइंस) का उल्लंघन होता है। अगर ये शब्द मौन कर दिए जाएं, तो सेंसर बोर्ड इस फिल्म को ‘यूए’ प्रमाणपत्र दे सकता है।

पिछले साल अनुराग कश्यप की फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ को लेकर भी अच्छा-खासा विवाद हो चुका है। सबको पता है कि सेंसर बोर्ड को किसी फिल्म में काट-छांट करने का अधिकार नहीं है। वह केवल प्रमाणन कर सकता है। प्रकाश झा द्वारा निर्मित अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ को लेकर भी सेंसर बोर्ड चर्चा में रहा। हालांकि यह फिल्म अगले हफ्ते प्रदर्शित होने जा रही है। काशीनाथ सिंह की कहानी ‘पांड़े कौन कुमति तोहे लागी’ पर प्रकाश द्विवेदी की फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ अब भी अदालत के फैसले का इंतजार कर रही है। इस समय ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो कह रहे हैं कि भारत में अब सेंसर बोर्ड की जरूरत नहीं है और फैसला दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए। इस पर विचार करने से पहले हमें एक नजर इतिहास पर भी डालनी चाहिए। विश्व सिनेमा के इतिहास में पहली बार सेंसर बोर्ड की जरूरत अमेरिका में 1915 में तब महसूस की गई, जब अमेरिकी गृहयुद्ध पर डीडब्ल्यू ग्रिफीथ की ऐतिहासिक फिल्म ‘द बर्थ आॅफ अ नेशन’ के प्रदर्शन के साथ ही कई इलाकों में नस्लवादी दंगे शुरू हो गए और अदालतों ने फिल्म को प्रतिबंधित कर दिया। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मोशन पिक्चर (फिल्में) विशुद्ध रूप से व्यावसायिक उत्पाद है, कला नहीं। इसलिए इस पर कलात्मक अभिव्यक्ति की आजादी का मामला नहीं बनता। यह फैसला 1952 तक बना रहा, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट ने राबर्तो रोसेलिनी की फिल्म ‘मिरैकल’ पर सुनवाई करते हुए इसे पलट नहीं दिया।

भारत में भी सिनेमा एक व्यावसायिक उत्पाद है। कला के सरोकार बाद में आते हैं। यहां तो हालत यह है कि सब कुछ- सेक्स, हिंसा, गाली-गलौज की भाषा- सिर्फ इसलिए डाला जाता है कि फिल्म बिक सके। राष्ट्रभक्ति, सामाजिक चेतना और न्याय सब कुछ सिनेमा के लिए एक बिकाऊ माल है। इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए।
केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के गठन में सूचना और प्रसारण मंत्रालय हमेशा से एक बुनियादी चूक करता रहा है। मंत्रालय एक तो सिनेमा व्यवसाय से जुड़े लोगों का नाम प्रस्तावित करता है, दूसरे सत्ताधारी राजनीतिक दल के प्रति वफादार पत्रकारों के नाम शामिल करता है। यह तो वही बात हुई कि कोई परीक्षार्थी खुद ही प्रश्नपत्र तैयार करे और खुद ही परीक्षक बन जाए। दुनिया में कहीं भी सिनेमा व्यवसाय से जुड़े लोगों को सेंसर बोर्ड का सदस्य नहीं बनाया जाता। अमेरिका-यूरोप में समाजशास्त्री, मनोविज्ञानी, बाल मनोविज्ञानी, फिल्म समीक्षक और इसी तरह के लोग फैसला करते हैं कि फिल्म का समाज पर क्या असर पड़ेगा। एक चीज और समझने की है कि अक्सर फिल्म निर्माता ही सेंसर बोर्ड से काट-छांट का सुझाव मांगते हैं। फिल्म निर्माताओं को या तो ‘यू’ या ‘यूए’ प्रमाणपत्र चाहिए, ताकि उनकी फिल्में टेलिविजन चैनलों पर दिखाई जा सकें, जिससे उन्हें मोटी कमाई होती है। वे बेचने की कला में माहिर लोग हैं। उन्हें नैतिकता या सामाजिक जीवन मूल्यों से कुछ लेना-देना नहीं है और अगर है भी तो वहीं तक, जहां तक इन्हें बेचा जा सके। अगर फिल्म एक व्यावसायिक उत्पाद है, तो उसे कलात्मक अभिव्यक्ति की आजादी से नहीं जोड़ा जा सकता। सेंसर बोर्ड से जुड़े मामले में यहीं बुनियादी चूक होती रही है।

यह भी एक मिथ्या धारणा है कि सेंसर बोर्ड फिल्मों पर कैंची चलाता है। वह कैंची नहीं चलाता, वह सुझाव देता है कि यदि फिल्म निर्माता को ‘यू’ या ‘यूए’ प्रमाणपत्र चाहिए, तो उसे फिल्म से क्या-क्या हटाना होगा, जो सेंसर बोर्ड के अनुसार कानूनी रूप से वांछित है। सेंसर बोर्ड के फैसले को मानना फिल्म निर्माता की मजबूरी नहीं है। वह पुनर्विचार याचिका दायर कर सकता है या रिव्यू ट्रिव्यूनल में जा सकता है या अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सेंसर बोर्ड के तौर-तरीकों में कभी भी सरकारों के बदलने से कोई बुनियादी फर्क नहीं पड़ा। ताजा मामले तो वर्तमान अध्यक्ष की लापरवाही, अति सक्रियता और बेमतलब की बयानबाजी से पैदा होते रहे हैं। इस पर भी विचार होना चाहिए कि समाज के लिए सेक्स अधिक नुकसानदेह है या हिंसा। ‘दबंग’ फिल्म में जिस तरह सलमान खान गुंडों-बदमाशों की पिटाई करते हैं, उसे देख कर वितृष्णा होती है। दुनिया भर में यह फिल्म हिंसा के कारण वयस्क श्रेणी में प्रदर्शित की गई, जबकि भारत में इसे ‘यूए’ प्रमाणपत्र के साथ रिलीज किया गया। विश्व सिनेमा के इतिहास में सबसे अधिक फिल्में हिंसा के कारण प्रतिबंधित की गई हैं, सेक्स के कारण नहीं। राजनीतिक कारणों से तो बिल्कुल नहीं। सिनेमा में सेक्स से जितना नुकसान समाज का नहीं हुआ है, उससे अधिक नुकसान हिंसा से हुआ है। आश्चर्य होता है कि भारत जैसे अहिंसा प्रेमी समाज में हिंसा को व्यापक स्वीकृति मिली हुई है, जिसका असर सिनेमा में अक्सर दिखाई देता है। जमाने से भारतीय सेंसर बोर्ड सेक्स को लेकर कुछ ज्यादा ही अनुदार रवैया अपनाता रहा है। आज इंटरनेट और तरह-तरह की नई तकनीकी डिवाइसों के जमाने में भी भारतीय सेंसर बोर्ड काफी पुरातन नजरिया रखे हुए है। दुनिया भर में आज यह मान लिया गया है कि मानवता के लिए सेक्स से ज्यादा नुकसानदेह हिंसा है। सेक्स से केवल दो इंसान प्रभावित होते हैं, पर हिंसा से सारा समाज प्रभावित होता है।

सिनेमैटोग्राफ एक्ट 1952 अब पुराना पड़ चुका है। उसमें बड़े बदलाव की जरूरत है। सिनेमा का सीधा संबंध व्यवसाय और तकनीक से है। जिस समय यह कानून बना था उस समय इंटरनेट नहीं था। उस समय डिजिटल तकनीक नहीं थी। अब देश की नई जरूरतों के हिसाब से कानून बनाने की जरूरत है। इसी तरह केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के गठन में भी आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। इसमें फिल्म व्यवसाय से जुड़े लोगों को शामिल करने और राजनीतिक व्यक्तियों की नियुक्ति की परंपरा बंद होनी चाहिए।
अमर्त्य सेन वाले मामले में जो भी हुआ उसका समर्थन किसी हाल में नहीं किया जा सकता, लेकिन भारत जैसे देश में, जहां आज भी अधिकतर आबादी गरीबी, निरक्षरता और राजनीतिक अस्थिरता में जी रही हो, यह कहना आत्मघाती होगा कि हमें सेंसर बोर्ड की जरूरत नहीं है और सब कुछ जनता पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

 

 

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First Published on July 16, 2017 3:44 am

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