April 28, 2017

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दस्तावेज: भारतेंदु के पूर्वज

अमीचंद के पुत्र फतहचंद को बंगाल में रुके रहना सुरक्षित न लगा। वे बंगाल छोड़कर काशी चले आए।

Author November 13, 2016 00:54 am
भारतेंदु हरिश्चंद्र

वेंकटेश कुमार

भारतेंदु हरिश्चंद्र के बारे में यह प्रसिद्ध है कि वे पैसा खर्च करने में आगे-पीछे नहीं सोचते थे। एक बार काशी नरेश ने भारतेंदु से कहा, ‘बबुआ! घर को देखकर काम करो।’ इस पर उनका उत्तर था,‘हुजूर! इस धन ने मेरे पूर्वजों को खाया है, अब मैं इसे खाऊंगा।’ भारतेंदु के इस कथन के आधार पर पता नहीं कैसे यह धारणा प्रचलित हो गई कि भारतेंदु के पूर्वजों ने अंग्रेजों की चाटुकारिता करके अथाह संपत्ति बना ली थी, इसलिए वह ऐसे संपत्ति का नाश कर देना चाहते थे। दरअसल, भारतेंदु के इस कथन को सही संदर्भ में समझा ही नहीं गया।

भारतेंदु के पूर्वज पीढ़ी-दर-पीढ़ी व्यापार का काम करते आ रहे थे। पहले दिल्ली में रहकर व्यापार करते थे, फिर बंगाल चले गए। बंगाल में ही भारतेंदु के इतिहास प्रसिद्ध पूर्वज सेठ अमीचंद जगतसेठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। अमीचंद के समय ही बंगाल में अंगे्रजों ने बहुत तेजी से अपने पैर पसारने शुरू किए। उस समय बंगाल की गद्दी पर सिराजुद्दौला और मीर जाफर जैसे कमजोर शासक बैठे। अंग्रेजों की कूटनीति और बंगाल के शासकों ने मिलकर जनता को तबाह करना शुरू किया। सेठ अमीचंद से चार लाख रुपए लूट लिए गए।

अमीचंद से व्यापार में मदद करने का अनुरोध करने वाले अंग्रेज देखते-देखते शक्तिशाली हो गए। अंगे्रजों की मदद करने के अलावा अमीचंद जैसे व्यापारियों के सामने कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा। लेकिन अंग्रेजों को लगा कि अमीचंद उन्हें धोखा दे रहे थे। अंग्रेजों ने अमीचंद से यह वादा किया था कि सिराजुद्दौला को पदच्युत करने के बाद जो धन हाथ लगेगा, उसका एक हिस्सा उन्हें भी दिया जाएगा।  लेकिन लार्ड क्लाइव ने अमीचंद को पैसा देने से साफ मना कर दिया। लार्ड क्लाइव का यह कहना था कि अमीचंद उसके विश्वासपात्र नहीं हैं। क्लाइव की इस धोखेबाजी से अमीचंद को गहरा सदमा पहुंचा। लेकिन वे चाहकर भी अंग्रेजों का कुछ बिगाड़ न सकते थे। अंग्रेजों का साथ देने या साथ देने का नाटक करने के अलावा उनके पास और कोई दूसरा रास्ता न था।

अंग्रेजों ने अमीचंद को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन इससे अंग्रेजों का गुस्सा शांत नहीं हुआ। वे अमीचंद के पूरे परिवार को खत्म कर देना चाहते थे। अंग्रेजी सेना ने अमीचंद का घर चारों ओर से घेर लिया।अमीचंद के कर्मचारियों ने अपनी शक्ति भर अंग्रेजों का विरोध किया लेकिन आखिरकार वे मारे गए। कहते हैं कि- अमीचंद के एक जमादार ने जब यह देखा कि अंग्रेज सैनिकों के निशाने पर अब घर की महिलाएं हैं तो उसने जल्दी से एक बड़ी चिता जलाकर परिवार की तेरह महिलाओं की खुद ही हत्या कर दी और उनके सिर चिता में डाल दिए और अंत में उसी तलवार से खुद को भी मार लिया।

इतने बड़े आघात को अमीचंद झेल न पाए। धीरे-धीरे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा और एक-डेढ़ साल के भीतर ही उनकी मौत हो गई। उस समय के अंग्रेज सेनापति हॉलवेल का तो यहां तक मानना है कि ‘ब्लैक हॉल’ वाली घटना के पीछे अमीचंद का ही हाथ था। जाहिर है कि अमीचंद अंग्रेजों के लिए हमेशा धूर्त ही बने रहे। लार्ड मेकाले तो इन्हें धूर्त बंगाली कहा करता था। अंग्रेजों ने अमीचंद और उनके परिवार पर जो कहर बरपाया, उससे उबर पाना उनके परिवार के इक्का-दुक्का बचे हुए सदस्यों के लिए असंभव था।

अमीचंद के पुत्र फतहचंद को बंगाल में रुके रहना सुरक्षित न लगा। वे बंगाल छोड़कर काशी चले आए। इनका विवाह काशी के एक बड़े सेठ गोकुलचंद साहू की बेटी से हुआ। गोकुलचंद की कोई और संतान न थी इसलिए फतहचंद ही उनके उत्तराधिकारी हुए। संतान के नाम पर फतहचंद को एक बेटा हुआ जिसका नाम हर्षचंद्र था। हर्षचंद्र अपने सरल स्वभाव के कारण काशी की जनता के बीच काफी लोकप्रिय हो गए। हर्षचंद्र, काशीनरेश के भी विश्वासपात्र थे। रियासत की बहुमूल्य धनसंपदा उनके यहां रखी जाती थी। यही परंपरा हर्षचंद्र के बेटे गोपालचंद्र के समय भी जारी रही। 1857 के विद्रोह के समय अंग्रेजों के प्रति काशी नरेश का रवैया सहयोगात्मक था। ऐसे में 22-23 साल के युवक गोपालचंद्र से अंग्रेजों के प्रति विद्रोहात्मक रवैया रखने की मांग करना व्यवहारिक नहीं जान पड़ता। काशीनरेश की अनुमति से ही 1857 के समय अंग्रेजों के कुछ हथियार इनके घर पर रखे गए थे।

लेकिन इस बात को सही संदर्भ में न समझकर यह प्रचारित किया गया कि गोपालचंद्र ने 1857 के विद्रोह में तन-मन-धन से अंगे्रजों की मदद करके खूब संपत्ति अर्जित की। गोपालचंद्र की मृत्यु सत्ताईस साल में हो गई थी, लेकिन तब तक उन्होंने चालीस ग्रंथों की रचना कर डाली थी। उनके निजी पुस्तकालय में दुर्लभ पुस्तकों का भंडार था। उस समय एक व्यक्ति ने इनके पुस्तकालय की पुस्तकों की कीमत एक लाख रुपए आंकी थी। गोपालचंद्र को पूजा-पाठ और लिखने-पढ़ने के अलावा किसी और चीज से कोई लगाव न था। उनके घर पर हमेशा साहित्यिक लोग जुटते थे। लोग इन्हें गिरिधरदास के नाम से भी जानते थे। काशी में जब लड़कियों के लिए पहला स्कूल खुला तो इन्होंने अपनी बेटी को उसमें पढ़ने के लिए भेजा। उस जमाने के लिहाज से यह एक साहसपूर्ण कदम था।
इतिहास की यह विडंबना ही है कि ऐसे गोपालचंद्र को बाद में कुछ लोगों ने अंग्रेजों के चापलूस और गद्दार के रूप में प्रचारित किया।

गोपालचंद्र के संपूर्ण व्यक्तित्व को समझे बिना हम उनके बेटे भारतेंदु हरिश्चंद्र को नहीं समझ सकते। भारतेंदु को अपने पूर्वजों से विरासत में जो चीजें मिलीं, उसमें मुख्य है- अंग्रेजों का खौफ, पर्याप्त संपत्ति और साहित्यिक पृष्ठभूमि। भारतेंदु ने सिर्फ साहित्यिक विरासत को अपने पास संजोकर रखा। इसके अलावा उन्होंने कभी किसी चीज की परवाह नहीं की। नौ साल की उम्र में ही पितृहीन हो जाने वाले भारतेंदु के लिए जिंदगी का सफर कितना कठिन रहा होगा!
कुछ कुटिल लोगों की नजर भारतेंदु की संपत्ति पर थी। भारतेंदु ने अपने परिवार में अमीचंद वाली घटना सुनी थी और धन हड़पने के लिए षड्यंत्र कर रहे लोगों को देख भी रहे थे। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि साहित्यसेवी भारतेंदु के हृदय से धन का मोह खत्म हो जाए। किताब खरीदने में पानी की तरह पैसा बहाने वाले गोपालचंद्र के बेटे हरिश्चंद्र ने किताब छापने में पैसा पानी की तरह बहाना शुरू किया। किताबें और पत्र-पत्रिकाएं छापने में और लेखकों की आर्थिक मदद करने में भारतेंदु ने अतिशय उदारता का परिचय दिया। उनकी इसी अतिशय उदारता और उनके कुछ दोस्तों की अतिशय चालाकी ने भारतेंदु को उस मुहाने पर ला खड़ा किया जहां से वे एक-एक रुपए के लिए तरसने लगे। इतिहास की यह कैसी विडंबना है कि भारतेंदु के पूर्वजों को गद्दार के रूप में और भारतेंदु को राजभक्त के तौर पर देखा जाता है।

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First Published on November 13, 2016 12:53 am

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