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लाइलाज शक: जान गंवाती औरतें

अपने समाज में मारपीट और घरेलू हिंसा का बड़ा कारण शक को ही माना जाता है। खैर, उस लड़की का अब दूसरा विवाह हो चुका है। पर हकीकत यही है कि निम्न वर्ग से लेकर मध्यवर्ग और उच्च वर्ग की औरतें शक के दायरे से परे नहीं हैं।
Author August 6, 2017 04:59 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कुछ दशक पहले तक जिस शक के कारण औरतों को अकसर निशाना बनाया जाता था, वह आज भी हमारे मन और जीवन में पूरी तरह से मौजूद है। हालांकि शक के बीज हमारे मिथकों में भी छिपे हैं।  बचपन में एक नाटक बहुत लोकप्रिय था। इसे पुरुषों के अलावा महिलाएं बड़ी संख्या में देखने आती थीं, जिसमें एक राजा दूसरे शत्रु राजा को युद्ध में नहीं हरा पाता, तो वह अपनी एक विश्वास पात्र कुटनी को उस राजा के रनिवास में भेजता है। वहां अपनी सेवा से वह पटरानी को प्रसन्न कर लेती है। रानी को नहलाती, धुलाती है और शृंगार करती है। एक दिन वह कुटनी गायब हो जाती है। जाकर शत्रु राजा को सूचनाएं देती है। तब वह उस राजा से कहता है कि उसे पता है कि उसकी पटरानी की जांघ पर कहां तिल है। बस, राजा को लगता है कि उसकी रानी के इस राजा से संबंध हैं। वह फांसी लगा कर मरने की कोशिश करता है, मगर अंत में कुटनी और शत्रु राजा के षड्यंत्र का भंडाफोड़ हो जाता है। यह एक ऐसा नाटक था, जिसे औरतें खूब देखने जाती थीं और अंत भला सो सब भला के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता था कि रानी तो बेचारी पतिव्रता नारी थी। सारा दोष उस कुटनी का था। यानी अगर कुटनी का पता न चलता तो अपनी पत्नी पर राजा का शक ठीक बैठता। ऐसे में या तो राजा जान दे देता या गुस्से में रानी की जान ले लेता। या रानी खुद फांसी पर लटक जाती।

तब कुटनियों की भूमिकाएं अकसर महिलाओं के हिस्से आती थीं। मगर लगता है कि बिकिनी के इस जमाने में औरतों का शारीरिक सौष्ठव तलाशने के लिए किसी कुटनी की जरूरत नहीं रही, जो एक तरीके से अच्छा भी है। हालांकि इस बिकिनी वाली औरत या आज की पढ़ी-लिखी, नौकरीपेशा, आत्मनिर्भर, स्मार्ट औरत को शक का सामना नहीं करना पड़ रहा, ऐसा नहीं दिखाई पड़ता। कुछ साल पहले टीवी पर एक धारावाहिक आया था- राहुल का स्वयंवर। उस धारावाहिक के अंत में राहुल ने प्रतिभागी लड़कियों में से एक का चुनाव, कार्यक्रम के दौरान ही माला डाल कर किया था और वहीं शादी हुई थी। उस लड़की ने खुश होकर कहा था कि वह तो पांच साल की उम्र से ही अपनी शादी के बारे में सोच रही थी। उन्होंने धारावाहिक के दौरान अपने को सेवाभाव वाली तथाकथित भारतीय नारी के रूप में पेश किया था, जिसे राहुल की मां ने भी बहुत पसंद किया था। मगर शादी के कुछ माह बाद ही उस लड़की और राहुल में खटपट की खबरें आने लगीं। एक अखबार ने लड़की का फोटो और बयान छापा, जिसमें लिखा था कि किसी भी परिचित या दोस्त का फोन आ जाए, तो राहुल उस पर शक करते हैं। शक के आधार पर मारपीट करते हैं। अपने समाज में मारपीट और घरेलू हिंसा का बड़ा कारण शक को ही माना जाता है। खैर, उस लड़की का अब दूसरा विवाह हो चुका है। पर हकीकत यही है कि निम्न वर्ग से लेकर मध्यवर्ग और उच्च वर्ग की औरतें शक के दायरे से परे नहीं हैं।

कुछ दिन पहले गुजरे जमाने की मशहूर अभिनेत्री रति अग्निहोत्री ने भी अपने पति पर इसी तरह के आरोप लगाए थे। ये वे मशहूर हस्तियां हैं, जिनकी बातें खबर बनती हैं, लोगों को पता चलती हैं। मगर ऐसी लाखों औरतें होंगी, जो शक के कारण तरह-तरह की हिंसा झेलती हैं और पत्नी या महिला मित्र पर शक के मामले में भारत के अधिकतर इलाके पीछे नहीं, एक-दूसरे से प्रतियोगिता करते नजर आते हैं। गांव या कस्बे तो छोड़िए, जो महानगर अपनी अमीरी और चमक-दमक पर अकसर इतराते दीखते हैं, वहां भी औरतों को तरह-तरह के शक को झेलना पड़ता है। कभी बॉस से संबंध, कभी पुराने दोस्त से कोई बातचीत, कभी किसी के साथ सिर्फ चाय-काफी पीने या फोन पर बात कर लेने से। ऐसी घटनाएं सिर्फ माता-पिता द्वारा तय की गई शादियों में ही नहीं, जिन लोगों ने खुद जीवन साथी का चुनाव किया, वहां भी हो रही हैं। कई बार ऐसी घटनाएं नजर आती हैं कि दिल दहल जाता है। पिछले दिनों हुई ऐसी ही कुछ घटनाओं के उदाहरण दिए जा सकते हैं। पति पचीस साल का था, पत्नी तेईस की। पति को पत्नी पर शक था, इसलिए दोनों में रोज लड़ाई होती थी। अंत में तंग आकर पत्नी अपने माता-पिता के घर रहने चली गई। फिर एक दिन पति ने बातचीत करने के लिए पत्नी को पार्क में बुलाया। दोनों के बीच कुछ कहा-सुनी हुई और उसने पत्नी को पेड़ से लटका दिया। दूसरी घटना में एक पति सऊदी अरब से लौटा। उसे शक था कि उसकी पत्नी के किसी मित्र से संबंध हैं। उसने भी पत्नी को मार डाला। पिछले छह महीनों में अकेले दिल्ली में ऐसी दर्जनों घटनाएं हुई हैं। कई घटनाओं में पति ने पत्नी या महिला मित्र को मार कर खुद को भी खत्म कर लिया। शक और क्रोध इन लोगों को ये भुला देते हैं कि अगर वे किसी को मार रहे हैं, तो खुद भी नहीं बचेंगे। देखा यह भी गया है कि अधिकतर मामलों में शक के किस्से झूठे साबित होते हैं। मनोवैज्ञानिक टीवी पर आने वाले बहुत से ऐसे धारावाहिकों और पापुलर कल्चर में दिखाए जाने वाले बहुत से कार्यक्रमों को भी इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि अकसर जोड़े इनकी नकल करते हैं और जान गंवा देते हैं।

अगर बात नहीं बन रही है, तो एक-दूसरे से अलग हो जाने के मुकाबले लोग शक के आधार पर अपनी पत्नियों या महिला मित्रों की जान ले रहे हैं। जान लेने की इस कवायद में पढ़े-लिखे, अनपढ़, अमीर-गरीब सब एक ही तरह से व्यवहार कर रहे हैं। एक समय में हिंदी फिल्में भी शक को आधार बना कर खूब तालियां बटोरती रही हैं। यहां तक कि पत्नी के साथ होने वाली मारपीट और हिंसा को प्रकारांतर से सही ठहराती रही हैं। इनमें बिना किसी कारण के शक करने पर पत्नियां पतियों के पैर पकड़ कर माफी मांगती रही हैं और उनकी हिंसा और बुरे व्यवहार को सही ठहराती रही हैं। आखिर जिसे देवता माना, वह गलत कैसे हो सकता है। कई बार यह देख कर बहुत आश्चर्य होता है कि इन दिनों चारों तरफ महिला सशक्तीरण और महिला उत्थान की बातें होती हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और उसे आत्मनिर्भर बनाओ के नारे हर ओर फिजां में गूंजते सुनाई देते हैं, मगर इन नारों के बीच ही शक के आधार पर हत्याएं हो रही हैं। इनमें से अगर बहुत-सी पता चल जाती हैं तो बहुत-सी ऐसी भी होंगी, जिनके बारे में कभी कुछ पता ही नहीं चलता होगा। पुराने जमाने में एक कहावत कही जाती थी कि शक का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। इसी तर्क के आधार पर अगर कोई मामूली बात पर अपने जीवन साथी पर शक करे, मात्र शक के आधार पर उसे प्रताड़ित करे, हर वक्त अग्निपरीक्षा ले तो कोई संबंध कैसे चल सकता है!

 

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