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उद्यम- करघे पर सधे हाथ

असम के रंग-बिरंगे वस्त्रों को तैयार करने के पीछे आमतौर पर स्त्रियों के सधे हुए हाथ होते हैं। यहां का अस्सी फीसद हथकरघा उद्योग औरतें संभालती हैं। कपड़ा बुनाई महिलाओं के दैनिक कार्य में शामिल है।
Author November 12, 2017 04:44 am
असमी युवतियां कपड़ों पर परियों की गाथाएं बुनती हैं। प्रकृति के साथ पली-बढ़ी यहां की महिलाओं के रंगों की समझ देखते ही बनती है।

नूतन पांडेय

असम के रंग-बिरंगे वस्त्रों को तैयार करने के पीछे आमतौर पर स्त्रियों के सधे हुए हाथ होते हैं। यहां का अस्सी फीसद हथकरघा उद्योग औरतें संभालती हैं। कपड़ा बुनाई महिलाओं के दैनिक कार्य में शामिल है। असम के रास्तों से गुजरते हुए इस बात से कोई भी रूबरू हो सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे घरों या झोंपड़ियों के बाहर थोड़ी-सी जगह में भी एक करघा, भले वह बांस का हो या काठ का, उस पर बैठ कर कपड़े बुनती महिलाएं इस राज्य में आम दृश्य है।
असम का हथकरघा उद्योग काफी समृद्ध है। हथकरघे को कामरूप के ‘पाला’ और बाद में ‘अहोम’ राजाओं ने काफी बढ़ावा दिया। कपड़े बनाने की कला को उन्होंने पूरी तरह स्थापित किया। हालांकि तब यह राजा-महाराजाओं के बीच रेशमी वस्त्रों की बुनावट के तौर पर ही प्रचलित थी। लेकिन बाद में यहां घर-घर हथकरघे का इस्तेमाल किया जाने लगा। श्रीमंत शंकरदेव काल में उनके नेतृत्व में बना ‘वृंदावनी वस्त्र’ (सोलहवीं शताब्दी का), जिसमें कृष्ण के वृंदावन की गाथा बुनी गई है, आज भी लंदन के म्यूजियम में लोगों के आकर्षण का केंद्र है। तब से लेकर आज तक अनेक उतार-चढ़ावों को पार कर यह कला असम में विस्तार पकड़ती गई। राजा रजवाड़ों की सीमा से निकल कर हथकरघा घर-घर में पहुंचने लगा। लड़कियां इस कला में प्रवीण मानी जाती थीं। जिस तरह देश के अन्य हिस्सों में शादी-ब्याह के दौरान कढ़ाई-बुनाई से लड़कियों की योग्यता परखी जाती थी, वैसे ही असम में वस्त्र बुनाई की कला से कन्याओं की योग्यता को देखा जाता था। घर-घर में लगा करघा इस बात का आज भी साक्षी है। यही कारण है कि लंबे समय से चली आ रही यह वस्त्र बुनाई की कला असम की महिलाओं के प्रगतिशील समाज के लिए आज उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

कहते हैं असमी युवतियां कपड़ों पर परियों की गाथाएं बुनती हैं। प्रकृति के साथ पली-बढ़ी यहां की महिलाओं के रंगों की समझ देखते ही बनती है। असम के कपड़ों का जिक्र हो और रेशमी वस्त्र का नाम न लिया जाए, यह संभव ही नहीं है। यहां के रेशम और रेशम उद्योग से जुड़ा एक नाम है- रेशम नगरी ‘सुआलकुची’। यह एक ऐसा गांव है, जहां प्रवेश करते ही चरखे की चूं-चूं और करघे की खट-खट सुनाई पड़ने लगती है। करघे पर बैठी असमी महिलाएं और उस पर बनने वाला चमकता रेशमी वस्त्र इस ‘रेशम नगरी’ के अस्तित्व का आभास कराता है। यहां के मूंगा और पाट के बने वस्त्र दुनिया भर में मशहूर हैं। रेशमी वस्त्रों के अलावा यहां हर तरह के वस्त्र घर-घर में बुने जाते हैं। ‘सुआलकुची’ को देख कर महात्मा गांधी ने कहा था- ‘यहां नारियां हथकरघों पर अपने सपने बुनती हैं।’ आज भी असम एक ऐसा राज्य है जहां गांव तो गांव, शहरों में भी प्राय: घरों में करघे की ध्वनि सुनी जा सकती है। असमी औरतें रोजाना अपना थोड़ा वक्त कपड़े बुनने में लगाती हैं। खुद की बनाई मेखला-चादर पहनना आम बात है। अब तो सरकारी सहयोग और जागरूकता के कारण यह कुटीर उद्योग का रूप लेता जा रहा है। ऐसे भी असम का हथकरघा उद्योग उतना ही पुराना कहा जा सकता है, जितनी यहां की संस्कृति। यहां की संस्कृति में रेशम की बुनाई-कताई अत्यंत गहराई तक समाई हुई है। सूत की रंगाई, कताई और बुनाई का पारंपरिक ढंग आज भी ज्यों का त्यों विद्यमान है। प्रागज्योतिषपुर से लेकर असम तक के लंबे कालांतर में कई परिवर्तन हुए, पर कपड़ा उद्योग के क्षेत्र, खासकर रेशम उद्योग की परंपरा ज्यों की त्यों बनी रही।

रेशमी धागों के बने पारंपरिक असमी परिधानों के अलावा समयानुसार मांग और सप्लाई की तर्ज पर कई बदलाव आए हैं। ये बदलाव उभरते हुए नए-नए संस्थानों और नई पीढ़ी द्वारा की गई एक पहल कही जा सकती है। हालांकि असमी समाज अपनी संस्कृति से कुछ इस तरह बंधा हुआ है कि उन्हें अपनी बुनावट और डिजाइनों में अधिक छेड़छाड़ स्वीकार्य नहीं है, लेकिन उन्हीं डिजाइनों से विभिन्न तरह की वस्तुओं का उत्पादन आज किया जा रहा है। इसी कड़ी में मेखला-चादर के अलावा सलवार-सूट के कपड़े, शर्ट, टाई, छोटे-छोटे बैग, कुशन कवर, डाइनिंग मैट्स, विभिन्न तरह के पारी यानी बॉर्डर भी बनाए जा रहे हैं।इस राज्य के बने कपड़े आज काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। असमी समाज और गमछा एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं और इस पहचान को बना कर तैयार करने वाले और कोई नहीं असमी स्त्रियों के सधे हुए हाथ हैं। गमछा यानी गा+मोछा (शरीर पोंछने वाला तौलिया) शब्द सुनने में जितना सामान्य प्रतीत होता है, उससे कई गुना उसका महत्त्व होता है। यह असमी महिलाओं द्वारा बुना गया सफेद पर लाल काम किया वह वस्त्र सिर्फ देह पोंछने के काम नहीं आता, बल्कि यह असम को एक पहचान प्रदान करता है। असमी समाज विभिन्न तरह से इस गमछे को उपयोग में लाता है। सभा-समारोह में यह आदर का प्रतीक बनता है, वहीं नामघर और देवस्थान में पूजा के समय उपयोग में लाया जाता है। लोक नृत्य के दौरान नर्तक के शरीर से बंधा होता है, तो दूसरी ओर खेत-खलिहान में किसान के सिर पर। स्नान-ध्यान, उत्सव-पंडाल हर जगह गमछा जरूरी है।

पिछले कुछ वर्षों में कमजोर पड़ता हथकरघा उद्योग फिर से फलने-फूलने लगा है। उच्च शिक्षा और प्रगति के होड़ में जहां शहरी क्षेत्रों से कपड़ा बुनाई की कला नवयुवतियों से दूर होती गई, वहीं ग्रामीण युवतियां शिक्षित होकर इससे जुड़ती गर्इं। असमी समाज भी पारंपरिक बुनावट और परिधानों को विशेष महत्त्व देता है। नतीजतन, इतने पुराने और विस्तृत करघा उद्योग के बावजूद यहां मांग की तुलना में उत्पादन कम ही है। क्योंकि असम में करघे का इस्तेमाल आज भी गिने-चुने स्थानों पर ही होता है। पूर्णत: हाथ से बने कपड़ों को बनाने में वक्त लग जाता है। एक मेखला-चादर अगर अच्छे से फूल देकर बुना जाए तो बीस से पच्चीस दिन लग जाते हैं। इसलिए इसमें कोई शक नहीं कि आज भी असम में करघा उद्योग अगर फल-फूल रहा है, तो यह सिर्फ औरतों की बदौलत। इस लोक संस्कृति और कला को जीवित ही नहीं, बल्कि पूर्णत: स्थापित करने में यहां की महिलाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान है। ल्ल
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