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विमर्श- आक्रोश और साहित्य

दलितों को संघर्ष की पहली कतार में होना है, मगर उनका प्रतिनिधित्व कोई और कर रहा है। इस प्रतिनिधित्व की विकट सीमाएं हैं।
Author October 22, 2017 04:41 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

क्रोश के उद्भव के कारण विक्षोभ-काव्य में मौजूद थे क्षोभ। कविता ने मुक्ति के जो अप्रकट वादे किए थे उसका इंतजार अनंत काल तक किया जा सकता था। विक्षोभ-काव्य के वादों की प्रकृति कुछ ऐसी थी कि मुक्ति की प्रतीक्षा में बरस पर बरस नहीं गंवाए जा सकते थे। तत्काल और संपूर्ण मुक्ति का सपना मानवता ने पहली बार देखा था। उद्विग्नता स्वाभाविक थी। ‘युग की गंगा’ में केदारनाथ अग्रवाल ने लिखा था, ‘जल उठे हैं तन-बदन से/ क्रोध में शिव के नयन से/ खा गए निशि का अंधेरा/ हो गया खूनी सबेरा’। वास्तविक और आकांक्षित सबेरे में पसरती दूरी बेचैनी का सबब बनी। सबेरा सबके लिए है- यह ‘विश्वास’ मुक्ति चाहने वाले सभी तबकों तक पहुंचा। बहुत जल्दी इस विश्वास की सीमाएं भी प्रकट होने लगीं। फ़ैज़ की मशहूर नज्म ‘मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ का एक मिसरा है-‘लौट जाती है उधर को भी नजर क्या कीजे अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे’। रचनाकार यहां स्त्री को (जो उसकी महबूबा है); ‘पारंपरिक’ भूमिका में ही देख रहा है। यथार्थ को देखने और उसे बदलने का सारा जिम्मा क्रांतिकारी पुरुष का है। स्त्री इस मुक्ति-संघर्ष में भागीदार भी हो सकती है, शायर के यहां इसकी संभावना नहीं है। उधर, दलितों को संघर्ष की पहली कतार में होना है, मगर उनका प्रतिनिधित्व कोई और कर रहा है। इस प्रतिनिधित्व की विकट सीमाएं हैं। जिस पर दासता का बोझ जितना ज्यादा है उसे उतनी अधिक तवज्जो चाहिए। अपने को प्राथमिकता में न पाकर स्त्री और दलित की ऐसी दबी अस्मिताएं अपना स्वर अलग से बुलंद करती हैं।

आक्रोश का कोशगत अर्थ ही है- जोर से बोलना। अस्मिता-आंदोलन ‘आक्रोश’ को नया अर्थ देता है, उसे अवधारणात्मक पद बनाता है। आक्रोश दलित अस्मिता का निर्धारक बिंदु बन जाता है। तात्विक रूप से क्षोभ के मूल में अंतर्दृष्टिपूर्ण विचार है, विक्षोभ के मूल में क्रांतिकारी विचारधारा और आक्रोश के मूल में परिवर्तनकामी चिंतन। क्षोभ बेगमपुरा, कबिलास जैसे स्वप्नलोकों की सृष्टि करता है, विक्षोभ वर्गहीन समाज का यूटोपिया पेश करता है और आक्रोश डायवर्सिटी- सत्ता-संरचना में अपनी भागीदारी के लक्ष्य की तरफ बढ़ता है। क्षोभ अपने उद्देश्य-प्राप्ति में प्रेम को सहायक बनाता है, विक्षोभ हिंसा का सहारा लेने पर सैद्धांतिक सहमति व्यक्त करता है और आक्रोश अहिंसक आंबेडकरी प्रतिरोध में यकीन करता है।

आक्रोश का स्वरूप समझने के लिए पहली पीढ़ी के तीन प्रमुख दलित रचनाकारों को ध्यान से पढ़ा जाना अपेक्षित है- मलखान सिंह (1948), ओम प्रकाश वाल्मीकि (1950) और सीबी भारती (1957)। तीनों के प्रथम कविता-संग्रह थोड़े-थोड़े अंतर पर प्रकाशित हुए। इनका प्रकाशन-काल कवियों के वरिष्ठता-क्रम के अलग रहा। वाल्मीकिजी के संग्रह ने बीते युगों के संचित अनुभवों से साहित्य-जगत को जोड़ा, भारती के काव्य-संग्रह से युगांतर की सूचना मिली और मलखान सिंह के संग्रह ने संताप के हेतु को सार्वजनिक किया। अपने संग्रह के दूसरे संस्करण की भूमिका में वाल्मीकिजी ने लिखा- ‘दलित कविता का आक्रोश उसकी पहचान बना। दलित कविता में आक्रोश उस भोगी हुई वेदना, अपमान और यातना के विरोध में है, जिसे दलित समाज हजारों साल की संघर्ष-यात्रा में वहन करता रहा है।’

मलखान सिंह के दूसरे संग्रह का शीर्षक ‘ज्वालामुखी के मुहाने’ है। जैसे ज्वालामुखी दाहकता का सीमांत है वैसे दलित ‘आक्रोश’ अनुभवजन्य ताप का। आक्रोश का निर्माण जिन अनुभवों से हुआ है उसके तीन स्तर हैं। पहले स्तर पर भौतिक-सामाजिक हिंसा है, दलित बस्तियों की लूट, बलात्कार और आगजनी जैसे हिंसा के क्रूरतम रूप इसमें शामिल हैं। दूसरे स्तर पर वह अपमान के रूप में है, बल-प्रयोग किए बगैर सरे आम बेइज्जती करना, नीचा दिखाना इसके अंतर्गत आते हैं। पहले कमर में झाड़ू और गले में लटकी हांड़ी इसी उद्देश्य की पूर्ति करती थी। आज इसका स्थान अपमानजनक संबोधनों और गालीगलौज ने ले लिया है। तीसरे स्तर के अनुभव अवमानना के हैं, जब संकेतों, प्रच्छन्न गतिविधियों और ‘हैसियत’ का अहसास कराने वाले इशारों से अस्मिता पर आघात किया जाता है, तो अवमानना का अनुभव होता है। तथाकथित आधुनिक, सभ्य और प्रगतिशील लोग इसके अभ्यासी होते हैं। शहरों की सफेदपोश कालोनियां, उच्च शिक्षा संस्थान अवमानना के मुख्य स्थल हैं। सूक्ष्म कायिक चेष्टाओं के साथ ‘परिष्कृत’ भाषिक व्यवहारों में अवमानना के प्रसंग घटित होते हैं। शेष दोनों स्तरों के बरक्स अवमानना के अनुभवों को कानूनी दायरे में लाना खासा मुश्किल होता है। यह आक्रोश का सर्वाधिक प्रसरणशील स्रोत है और नई पीढ़ी के दलित रचनाकारों के सामने कठिन चुनौती का क्षेत्र।

क्षोभ-काव्य आत्म-ग्लानि पैदा करके आत्म-प्रक्षालन के उद्देश्य से संचालित था। विक्षोभ कविता में यह ग्लानि-बोध के रूप में जारी रहा। मेहतर न हो पाने की मुक्तिबोध की पीड़ा ग्लानिबोध से उपजी है। जब मेहतर स्वयं लिखने लगे तो वह ग्लानि की सृष्टि क्यों करेगा? आक्रोश का साहित्य इसीलिए अधिकार बोध को जन्म देता है। उसे कतई उम्मीद नहीं कि ‘सवर्ण’ अपना हृदय परिवर्तन करेंगे। वह शिक्षा, संगठन और संघर्ष के जरिए अधिकार बोध पैदा कर अपने समुदाय को अधिकारसंपन्न बनाने के उद्देश्य से लिखता है। आक्रोश के कवि को पता है कि प्रभुत्वशाली लोग अपना कब्जा नहीं छोड़ेंगे इसलिए वह अधिकारों को छीन लेने का आह्वान करता है- ‘मेरी पीढ़ी ने अपने सीने पर/ खोद लिया है संघर्ष/ जहां आंसुओं का सैलाब नहीं/ विद्रोह की चिंगारी फूटेगी/ जलती झोपड़ी से उठते धुएं में/ तनी मुट्ठियां/ तुम्हारे तहखानों में नया इतिहास रचेंगी।’

अपनी अभिव्यक्ति के संबंध में क्षोभ के कवि हमेशा सशंकित प्रतीत होते हैं। जो कहना है, जो कहा जा सकता है और जो कहा जा रहा है, इन तीनों स्तरों पर उन्हें अपने असामर्थ्य का, भाषा की अक्षमता का और रचना-प्रक्रिया की पेचीदगियों का बोध है। ‘हरुआ कहूं तो बहु डरूं, गरुआ कहूं तो झूठ’ (कबीर), ‘जिमि मुंह मुकुर मुकुर निज पानी। गहि न जाय अस अद्भुत बानी’ या ‘उर अनुभवति न कहि सक सोई। कवन प्रकार कहै कबि कोई’ (तुलसी)। विक्षोभ कवियों में यह बोध क्षीण हुआ। विचारधारा उन्हें अभिव्यक्ति के असमंजस में पड़ने से बचाती है तब भी ‘परम अभिव्यक्ति’ को लेकर उनमें दुविधा देखी जा सकती है।
आक्रोश के कवि में अपनी अभिव्यक्ति को लेकर कोई शंका नहीं है। कारण यह कि वे अनुभूति नहीं, अनुभव के रचनाकार हैं। अनुभव को किसी प्रक्रिया से गुजारे बगैर व्यक्त किया जाना है। प्रक्रिया से गुजारना ही ‘कलात्मक अभिव्यक्ति’ है। इससे आक्रोश के कवि दूरी बना कर चलते हैं। वे आत्मकथा लिखते हैं। उस विधा के अतिरिक्त अन्य विधाएं भी आत्मकथा का ही वहन करती हैं

क्षोभ कविता को किसी काव्यशास्त्र की आवश्यकता नहीं है। विक्षोभ-काव्य साहित्यशास्त्र के प्रति उदासीन दिखता है। उसे भूख, गरीबी और शोषण का यथार्थ चित्रण करते हुए क्रांति की तरफ बढ़ना है। यह विचित्र लग सकता है कि आक्रोश का लेखक प्रारंभ से सौंदर्यशास्त्र की जरूरत महसूस करने लगता है, उसकी मांग करने लगता है और किसी ‘शास्त्री’ की प्रतीक्षा किए बगैर स्वयं ही सौंदर्यशास्त्र की रचना करने लगता है।
शक्ति या सत्ता के संदर्भ में तीनों युगों की तुलना विचारणीय विषय है। सत्ता से टकराते हुए क्षोभ-काव्य शक्ति के अंत की कामना करता है, वह सत्ता का विसर्जन चाहता है। विक्षोभ-काव्य सत्ता केंद्रों का समापन कर श्रमशील जनता में शक्ति के विलय का कामना करता है। आक्रोश-काव्य को सत्ता का संचय काम्य है, उसे सत्ता का केंद्रीकरण करना है। शक्ति-प्रणाली के विघटन की जगह वह उस प्रणाली की बागडोर अपने हाथों में रखना चाहता है। मुक्तिद्वार पर लगे तमाम तालों को खोलने के लिए ‘गुरु किल्ली’ यही है। ०

 

 

 

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