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विदूषक का अंत

हंसाने वालों, हंसी-हंसी में जमाने पर करारा तमाचा जड़ देने वालों यानी विदूषकों, जोकरों, कॉमेडियनों की परंपरा प्राचीन है। संस्कृत नाटकों में विदूषक न सिर्फ हंसाता, बल्कि नायक-नायिका को मिलाने के उपाय करता, अनेक समस्याओं को हंसी-हंसी में सुलझा दिया करता था। बादशाह अपने दरबारों में विदूषक को सम्मानजनक जगह दिया करते थे। मगर जैसे-जैसे जमाना बदला, विदूषक की जगह सिकुड़ती गई। यों संचार माध्यमों के प्रसार से हंसी का कारोबार काफी फल-फूल रहा है, पर वास्तव में विदूषक वहां कहीं नहीं है। अगर कहीं दिखता भी है तो उस पर खतरे हैं। विदूषक की जगह और उसकी बदलती भूमिका के बारे में बता रहे हैं सुधीश पचौरी।
Author August 13, 2017 00:10 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

विदूषक यानी भाण यानी जोकर यानी हंसाने वाला यानी मजाक करने वाला यानी तनाव के क्षण में सीन में हंसी पैदा करने वाला। हंसाने वाला अंग्रेजी का क्लाउन, कॉमेडियन, जोकर जैसे हिंदी फिल्मों के पुराने जोकर गोप भगवान, जानी वॉकर, महमूद, जानी लीवर, गोविंदा, कादर खान; कवियों में काका हाथरसी, गोपाल प्रसाद व्यास, हुल्लड़ मुरादाबादी, सुरेंद्र शर्मा, अशोक चक्रधर या स्टैंडअप कॉमडियन्स में राजू श्रीवास्तव, जिस-तिस को रोस्ट करने वाले ‘एआईबी-रोस्ट’ वाले तन्मय भट्ट, रोहन जोशी, रणवीर सिंह, अर्जुन कपूर या कॉमेडी सेंट्रल के चार्ली शीन या जस्टिन बीबर…

संस्कृत नाटकों में निकल जाएं, तो एक से एक नर्म सचिव, चेटक, विदूषक मिलेंगे, जिनको नायक-नायिका को मिलाने, हंसाने का लाइसेंस प्राप्त है। शास्त्रों में विदूषक यानी दूषण करने वाला, दोष पैदा करने वाला या दोष दिखा कर उसका मजाक उड़ाने वाला या अपने अंग विकृत कर हंसाने वाला कहा गया है। शास्त्रानुसार विदूषक ‘नर्म सचिव’ की श्रेणी में आता है। इसमें ‘विट’ होते हैं, ‘चेटक’ होते हैं और ‘विदूषक’ होते हैं।विदूषक के बारे मे कवि पद्माकर ने कहा है: ‘स्वांग ठान ठानैं जु कछु, हांसी बचन बिनोद।’ यानी विदूषक कुछ ऐसा स्वांग भरता है और कुछ ऐसी वचन-वक्रता करता है कि दूसरों को हंसी आ जाए! यह विदूषक आज का कॉमेडियन ही है, जिसका एक काम नायक-नायिका को मजेदार तरीके से मिलवाना भी था। आज इस काम को आप दलाली कहेंगे, तो कहते रहें!ऐसा लगता है कि आजकल के विदूषक नाटकों, फिल्मों से निकल कर हमारे सार्वजनिक जीवन में आकर बैठ गए हैं और ये एक दो नहीं अनंत हैं। हर जगह हैं। हर मुकाम पर हैं। सत्ता के गलियारे में, हर कोने-अंतरे में, अंधेरे उजाले में, कहीं भी हमदर्दी का नाटक करते हुए, स्वांग भरते हुए मिल सकते हैं।
जिस तरह नाटकों के विदूषक नायक-नायिका को मिलवाने का धंधा किया करते थे लगभग वैसा ही धंधा ये करते हैं। फर्क है तो इतना कि यहां नायक का नाम नेता है और नायिका का नाम पैसा या कुर्सी है। ये छद्म विदूषक हैं, जो असली की भूमिका को भी हड़पे जा रहे हैं।

आज के समाज में जिस तरह का अवसरवाद, लंपटता, बदमाशी, कायरतापूर्ण बहादुरी हर जगह ताल ठोंकती नजर आती है, उसमें लाख दबाने पर भी विदूषक या जोकर या क्लाउन अपने आप उग आया करते हैं! विदूषक या कॉमेडियन सिर्फ हंसाने वाला नहीं होता। वह अपने समय की जनता का प्रतिनिधि होता है, जो जनता के नजरिए से सत्ता के साथ एक वक्रतामूलक संवाद पैदा करता है। वह कई बार सूत्रधार का काम भी करता है। सबसे बड़ी बात यह कि उसका व्यक्तित्व फिक्स्ड नहीं होता, वह चंचल और तरल होता है। वह अपने को बार-बार बदल सकता है, इससे वह पकड़ में नहीं आ पाता। यही उसकी ताकत है, जिसे जनता पंसद करती है और जिसे ताकतवर कभी दबा नहीं पाता! चैबीस गुणे सात के टीवी चैनलों में दिन-रात नए-नए कॉमेडियन बनते रहते हैं। बड़ी पूंजी, बड़े सेठ, बड़े नेता, बड़े अभिनेता, बड़ी-बड़ी बातें हांकने वाले, बड़े-बड़े जब टीवी में दिन-रात जिंदा कॉमेडी दिखाते रहते हैं, तो डर लगता है। वे अपनी ताकत, अपनी शोभा, अपना शृंगार लादे जनता पर लदते रहते हैं और अपने को ‘अनिवार्य’ बनाते रहते हैं। ऐसे ही ताकतवर गुब्बारों की हवा निकालने के लिए हर समय कोई न कोई विदूषक या कॉमेडियन या जोकर आता है और एक पिन चुभो कर उनकी सारी हवा फुस्स कर चला जाता है। जनता हंसने लगती है।

शायद इसीलिए ‘एआइबी-रोस्ट’ के कॉमेडियन अपनी अश्लीलता और भदेसपन के बावजूद लोगों में हिट हुए हैं। वे पेड शो करते हैं और हिट होते हैं, क्योंकि जनता उनके ‘भदेस’ को ही चाहती है। वे दबी हुई घृणा को बाहर निकालते हैं, वे दमित अवचेतन को बोलने देते हैं। इनको भी मोरल ब्रिगेड के हमले झेलने पड़े हैं, लेकिन जितने हमले हुए हैं उतने ही ये हिट हुए हैं। उनको एक जनता पसंद करती ही है। ताकतवर शायद नहीं जानते कि हंसी ऐसी छूत की बीमारी है कि जिसे जितना रोको उतना ही फैलती है।
विदूषक या जोकर वह है, जो हमारी बोरियत मिटाता है, हंसाता है, चोट करता-कराता है, हमें होश में लाता है, वह भी हंसते-हंसते!
और यह तो सोशल मीडिया का ‘राइट टू इंसल्ट’ का छापामार मजाकियों और मजाकों का जमाना है।
एक से एक चुटीली एक दो लाइन निशाने पर मारी कि निशाना बिलबिलाया और आपका निशाना वायरल हुआ और विदूषक फोकस में आया!
बदततीजी भी अगर कॉमेडी में शुमार हो चली है, तो उसका कारण यही है कि यह जमाना सुपर बदतमीजों का है, सुपर लंपटों का है।
जमाने की खाल बहुत मोटी हो चली है। बेशर्म समय में साफ्ट कॉमेडी मोटी खालों को चुभे बिना ऊपर से सहलाती हुई निकल जाती है, इसीलिए कई बार हास-परिहास को तीखे उपहास में बदला जाता है, जो कई बार बदतमीजी जैसा लगने लगता है, लेकिन आज के एआइबी-रोस्ट कॉमेडियनों के पास मोटी खाल वालों को टारगेट करने का इसके अलावा शायद कोई और विकल्प भी नहीं दिखता। जमाना बेशर्म है, तो कॉमेडी भी कुछ अधिक बेशर्म होगी।
कई बार ये स्टैंडअप कॉमेडियन्स अपनी ‘हद’ पार कर जाते हैं और इस कारण कष्ट पाते हैं। मोरल ब्रिगेडें ऐसे बदतमीज कॉमेडियनों के ‘बुरे लगने वाले’ मजाकों पर केस कर देती हैं। उनको डराया जााने लगता है। वह तो मीडिया उनका साथ देता है और उनके प्रति कुछ हमदर्दी बन जाती है। सोशल मीडिया के इस उजड्ड जमाने में ‘इंसल्ट’ करने का अधिकार एक नए अधिकार की तरह माना जाता है। इसीलिए कॉमेडी और कॉमेडियन मरते नहीं। वे बार-बार रूप बदल कर सामने आते रहते हैं।
जीवन में हास-परिहास-उपहास-व्यंग्य जरूरी है, वही स्वस्थ और जनतांत्रिक समाज की पहचान है। इसीलिए जनता अपने नए-नए विदूषक, कॉमेडियन या जोकर या क्लाउन गढ़ती रहती है।

तेलुगू की लोक परंपरा में तेनालीराम हुए हैं। गोनू झा, शेखचिल्ली, गोपाल भाण, लाल बुझक्कड आदि उत्तर भारत के बड़े ही प्रसिद्ध लोक विदूषक माने जाते हैं, जो अपने बुद्धि चातुर्य से अपने व्यंग्य और हास्य से अपने बादशाहों तक को नसीहतें दिया करते थे। अकबर-बीरबल के विनोद तो प्रसिद्ध हैं ही!
वह बादशाहत का जमाना था, जिसमें बादशाह सरेआम दरबार में हास-परिहास और उपहास करने वाले विदूषक के लिए एक जगह बनाए रखता था। संस्कृत के ‘मृच्छकटिकम्’ का शूद्रक तो इस मायने में एक अमर विदूषक है।
संस्कृत के प्रोफेसर बलराम शुक्ल बताते हैं कि संस्कृत में उनको विदूषक नहीं लिखा जाता, उनके नाम तय हैं। उनका नाम मैत्रेय, बसंतक या मांढव्य ही हो सकते थे। पद्माप्रभृतक और पादताडितक संस्कृत साहित्य के कुछ बहुत प्रसिद्ध भाण माने जाते हैं।
आज की नई बादशाहतें तो हंसने की जगह ही नहीं छोड़ना चाहतीं। आदमी हंसे तो कैसे हंसे, किस पर हंसे?
हिंदी कवि रघुवीर सहाय ने आपातकाल के दौर में हंसने को लेकर एक बेहद मानीखेज कविता लिखी थी। इस विदूषक प्रसंग में वह पढ़ने लायक है, क्योंकि वह ‘हंसने’ पर लगे पहरों, पाबंदियों और दमनों के बारे में बताती है और हंसी के आगे डरती हुई सत्ता की पोल भी खोलती चलती है, साथ ही हंसने के नए तरीके सिखाती चलती है। कविता का शीर्षक है: ‘हंसो हंसो जल्दी हंसो’:
‘हंसो हंसो जल्दी हंसो
हंसो कि तुम पर निगाह रखी जा रही है
हंसो, अपने पर न हंसना, क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी…
हंसते हंसते जानने मत दो कि किस पर हंसते हो…
हंसो पर चुटकुलों से बचो
उनमें शब्द हैं
कहीं उनमें अर्थ न हो
जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों..’

हंसने पर, हंसने वाले पर जब निगाह रखी जा रही हो और इतनी पाबंदियां हों, तब हंसने वाला क्या करे? वह इस कविता में हंसने की तरह ही हंस सकता है!
आपातकाल हंसी के अंत का काल था। विदूषक तक संकट में थे।
लेकिन हर तानाशाही विदूषक को नया जन्म देती है, क्योंकि वही उसका ‘क्रिटीक’ कर सकता है। यही हुआ।
पाकिस्तान में जब जिया-उल हक की तानाशाही थी, उर्दू के प्रोफेसर कमाल साहब बताते हैं कि, तब वहां इब्ने इंशा, हबीब जालिब, इफ्तखार आरिफ और अहमद फराज की शायरी बेहद हिट हुई। मुस्तंज हुसैन तारा और मुश्ताक यूसुफी जैसे कई सटायरिस्ट ऐसे रहे जिनने हंसी को, उपहास को अपनी अभिव्यक्ति का औजार बनाया।
तनाशाह किसी से नहीं डरा करते। डरते हैं तो सिर्फ विदूषकों से डरते हैं, क्योंकि वही हैं, जो भाषा के जरिए दुहरी-तिहरी मार करते हुए उनके दंभ की हवा निकालते हैं। तानाशाह हंसी से डरा करते हैं। हर विदूषक या कॉमेडियन जनता के लिए आनंदकरी होता है, जबकि सत्ता के लिए दुखदायी, क्योंकि वह उसकी मजाक-मजाक में पोल खोलता चलता है।
शायद सबसे रास्कल्ला विदूषक बर्ताेल्त बे्रख्त का ‘अजदक’ है, जो अपने चाल चेहरा चरित्र से एकदम बेहद दुष्ट है और उसके वक्त का राजा भी महादुष्ट है। होता कुछ ऐसा है कि जनता राजा से नाराज हो जाती है और वह भागा-भागा फिरता है। उधर उस राज्य के एक रास्कल जज को भी लटका दिया जाता है।
तब सवाल उठता है कि राजा को सजा कौन सुनाएगा। ऐसे में इस अजदक नाम के बदमाश को पकड़ा जाता है; जिसने पहले इसी राजा की मदद की होती है, ताकि राजा को सजा सुनाई जा सके। नाटक ‘काकेशियन चाक सर्किल’ में अजदक का परिचय कुछ इस तरह देता है:

‘इच्छुक जजों से सावधान,
सत्य एक काली बिल्ली है,
आधी रात में खिड़की विहीन कमरे में,
न्याय एक अंधा चमगादड़ है,
तीसरी पार्टी ही हमारी गलतियां ठीक कर सकती है,
हमें चाहिए अजदक
जो इस काम को सस्ते में ही निपटा देगा!’
अजदक न्याय को ऐसे ही अंजाम देता है! अपराधी को सजा सुनाते हुए अजदक एक जगह कहता है: ‘तुमने अपने प्रोफेशन में अक्षम्य अपराध किए हैं। तुमको माफ किया जाता है। अगला केस?’
ब्रेख्त का यह ‘डार्क सटायर’ नए विदूषक का व्यंग्य है। आजकल जैसे खल हैं वैसे ही विदूषक हंै, ऐसों को चाहिए एक नया अजदक एक नया विदूषक! ०

 

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