December 10, 2016

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कहानी: पत्ता टूटा डाल से

बचपन हमारे हाथ से रेत की मानिंद फिसल रहा था और इस आपाधापी में हमारी घड़ियां चार बजने का अर्थ बदल चुकी थीं।

Author November 27, 2016 02:26 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अंजू शर्मा

‘गामे की मां, कुछ सुना तूने, पाई बीमार है बड़ा।…’ ईश्वरी देवी ने अपने सिर की सफेद चुन्नी संभालते हुए, घुटनों पर हाथ रख, मंजी पर बैठते हुए एलान कहा, तो मंजी पर बैठी गामे की मां चौंक गई!  ‘क्या कह रहे हो भेन जी… पाई बीमार है? की होया पाई नूं?’ गामे की मां ने जरा परे सरकते हुए ईश्वरी देवी के बैठने के लिए जगह बनाते हुए कहा।  वहीं समीप ही एक कोने में पीढ़ा डाल कर बैठी, सूरज को पीठ दिखा धूप सेंकते हुए माला फेरती सोनबाई ने भी पीढ़ा आगे सरका कर वार्तालाप में अपनी रुचि दिखाई! गामे की मां के अनवरत चलते हाथ ठिठक से गए और कब से युद्धरत ऊन-सलाइयों ने मानो राहत की सांस ली! सामने के दरवाजे पर खड़ी सूखे तौलिए समेटती विमला देवी और अचार की बरनी संभालती भागवंती भी आकर यही सवाल पूछने लगीं तो ईश्वरी देवी ने सस्पेंस से पर्दा उठाया!

‘रात मेरे पुत्तर जीते को बताया किसी ने! जीते का वहां आना-जाना है बस्ती में। बीमार तो पहले से चल रहा था, अब उमर भी हो गई गामे की मां! हम सब आगे-पीछे के हैं! ज्यादा दिन नहीं हैं, बस जी, चलाचली का टैम समझो!’ अपने ठंड से जमे घुटनों को सहलाते हुए, गहरी सांस भर कर वे बोलीं, ‘क्या कहते हो, पता कर आएं एक बार! फिर रब जाने मिलना हो के ना हो!’ जाड़ों की इस उनींदी सुबह के बीतने पर गली के एक कोने में धूप सेंकती वृद्धाओं के इस समूह के लिए पाई की अहमियत गली के एक मामूली चने-मुरमुरे बेचने वाले वेंडर से कहीं अधिक थी! नई पीढ़ी शायद इस चिंता में इस तरह शामिल न हो पाती, पर उन सभी वृद्धाओं ने उदास मन से गामे की मां की बात पर सहमति की मुहर लगा दी।

जीवन के इस संध्याकाल में घुटनों और जोड़ों के दर्द से व्यथित, अशक्त झुकते शरीर, कमजोर चश्मा लगी या मोतियाबिंद से धुंधलाई आंखों, झुर्रियों से भरे चेहरों और सन से सफेद बालों वाली इस पीढ़ी की मेहनतकश जवानी का सूरज तो कब का डूब चुका था और ‘चलाचली की बेला’ शब्द उनके बीच इस गहराई से पैठ बना चुका था कि अब किसी की बीमारी की खबर उन्हें अलविदा की आहट के समकक्ष सुनाई पड़ती! ‘बिछड़े सभी बारी-बारी’ की तर्ज पर पुराने साथी एक-एक कर साथ छोड़ रहे थे और अपने पीछे छोड़ जाया करते थे यादों का अनमोल, न चुकने वाला खजाना! उन्हें लग रहा था, उसी कड़ी में शायद पाई की बारी आ गई थी! उम्र के उस धरातल पर साथ खड़े हुए उन्होंने बीते को वहीं कहीं साथ खड़े पाया!

हिंदी का ‘भाई’ शब्द पंजाबियत के असर से ‘भ’ का उच्चारण बदल कर ‘प’ के निकट होने के कारण पाई बन जाता है! पाई का असली नाम शायद ही किसी ने सुना हो, पर पुराने लोग बताते हैं कि उसका मां-बाप का दिया नाम कुंदन सिंह था, जो अब बड़े-बूढों-बच्चों सभी के लिए ‘पाई’ बन कर रह गया था! उम्र ने साढ़े छह दशक देखे होंगे! छोटा-सा कद, इकहरा शरीर, झुकी कमर और गहरे रंग के चेहरे पर किसी पहलवान-सी बड़ी-बड़ी, मेहंदी से रंगी मूंछें, उसकी शख्सियत से बिल्कुल मेल नहीं खाती थीं! सिर पर बचे बालों के विषय में कुछ भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सिर हमेशा हल्की-सी पगड़ी से ढका रहता था! वह गोल घेरे वाली पंजाबी बुशर्ट पहने रहता, जिसकी बाजुएं हमेशा मुड़ी रहतीं और जिसके दोनों तरफ कमर पर दो और बार्इं तरफ सीने पर एक जेब जरूर हुआ करती थी! नीचे के हिस्से में चैक के प्रिंट का एक पंजाबी तहमद (लुंगी) और पांव में आगे से मुड़ी पंजाबी जूतियां अपना रंग खोने से पहले शायद कभी काली रही होंगी, पाई की खास पहचान थी!

ठीक चार बजे जब वह श्रवण कुमार की तरह अपने कंधे पर बहंगी लेकर गली के कोने से आवाज लगाता दाखिल होता, तो माएं आराम कर रहे बच्चों को जगा, शाम की चाय की तैयारी में लग जातीं! ट्यूशन जाने वाले बच्चे अपना बैग सहेजते और बड़े-बुजुर्ग चाय के बाद झोला लेकर सब्जी-मंडी या ताश पीटने पार्क जाने की सोचने लगते! हमारे घर के निकट चौराहे के एक किनारे पाई की यह छोटी-सी दुकान जमने से पहले ही छोटे बच्चे घरों से निकल कर उस दिशा में भागते, जहां पाई अपनी बहंगी में जमी दो बड़ी टोकरियों में सामान ठीक कर रहा होता! बड़े-बड़े लिफाफों और डिब्बों में चना, मुरमुरा, मूंगफली, मीठी खील, चना जोरगरम, दालसेव, दालमोठ, आलू के चटपटे चिप्स, शक्करपारे, गुड़ के सेव, गुड़गट्टा, गुडपट्टी, तिलपट्टी और न जाने क्या-क्या भरा होता, जो बच्चों के लिए कारूं के खजाने से कम नहीं था!

‘पाई मुझे चवन्नी के चने चाहिए। नहीं… मीठी खील… अ-अ-नहीं-नहीं दोनों मिला दो।’ बच्चों की भीड़ बार-बार फरमाइश बदलती, किसी एक पर राजी न हो पाती, पर घनी मूछों के पीछे की स्नेहिल मुस्कान को किसी ने कभी खीज में नहीं बदलते देखा था! बच्चे दस्सी, बीसी, चवन्नी से भरे हाथ आगे करते और मनचाही चीज पाकर खुशी से झूम उठते! उस भीड़ में पाई की अनुभवी निगाहें उन उदास निगाहों और झिझकते हाथों को जाने कैसे ढूंढ़ लेतीं, जिन्हें आज कोई सिक्का नहीं मिला था और जो डांट कर या कल के वादे पर फुसला कर माओं द्वारा टरका दिए गए होते! सिक्के वाले बच्चों के ऐन पीछे की कतार में खड़े ऐसे बच्चों की मुस्कान लौटा लाने को पाई के पास ‘झुंगा’ यानी खट्टा-मीठा गीला चूरन होता था! वह नन्ही-नन्ही उन हथेलियों पर एक डिब्बे से खींच कर थोड़ा-सा ‘झुंगा’ या कोई अन्य चीज रख देता! मुफ्त में मिला यह तोहफानुमा झुंगा पाई का बच्चों के लिए प्यार होता, जो सिक्के से भरी और खाली हथेलियों को एकाकार कर देता! फिर देर तक हवा में बच्चों और पाई की हंसी और ठहाके गूंजते! उस हंसी के अलावा उसकी आवाज बहुत कम सुनाई पड़ती, हां पाई की आंखों की चमक बच्चों के खिलते चेहरों के साथ गहरी होती जाती!

पाई के इर्द-गिर्द जुटने वाली इस भीड़ में दूसरे राउंड में बड़े भी शामिल होते, पर पाई का सारा ध्यान उन नन्ही मुस्कानों, उनके नखरों और फरमाइशों पर लगा रहता। वर्षों पहले कभी उस भीड़ में हमारे पिता-चाचाओं-बुआओं का चेहरा हुआ करता था, जो धीरे-धीरे समय के साथ हमारे चेहरों में बदल गया था! फिर पाई के चने-मुरमुरे खाते और झुंगा चाटते हमारी पीढ़ी की नन्ही हथेलियां कब चौड़े पंजे में बदलने लगीं और झुंगे के लिए फैलने में शर्माने लगीं, यह न वक्त जान पाया, न खुद हम। नब्बे का दशक शुरू हो गया था। वक्त तेजी से बदल रहा था। हर साल एक कैलेंडर रद्दी हो जाता और नया दीवार पर टंग जाया करता। हमारी पीढ़ी की एक पूरी पंक्ति बदल रही थी। हमारी माएं हम लड़कियों को ताड़-सा बढ़ता देख बड़बड़ाती हुई दहेज जुटाने और पिताओं से तकाजे करने में व्यस्त हो चली थीं और पिता बेपरवाह दिखने का अभिनय करते चिंतातुर हो एकांत में अक्सर अपनी जमा-पूंजी टटोलने लगते थे। पर हमारी पीढ़ी की आंखें भविष्य के सुनहरे सपनों से रोशन थीं। मांएं रसोईघर की ओर इशारा कर हमें अन्नपूर्णा बनाना चाहतीं, लेकिन छज्जों पर किताबें ले खड़ी रहने वाली लड़कियां अब कॉलेज के बाद नए खुले इंस्टीट्यूटों में भविष्य से लड़ने के साधन डिप्लोमाओं की शक्ल में जुटाने लगीं थीं और उन्हें गली में कनखियों से निहारते निकम्मे घूमते लड़के टाई लगा कर किसी फाइल को सीने से लगाए, अक्सर किसी बड़ी कंपनी के किसी कक्ष में चल रहे इंटरव्यू की लाइन में प्रतीक्षा करते पाए जाते।

बचपन हमारे हाथ से रेत की मानिंद फिसल रहा था और इस आपाधापी में हमारी घड़ियां चार बजने का अर्थ बदल चुकी थीं। हम भूलने से लगे थे पाई के लिफाफों में छिपी लज्जत का स्वाद और अंकल चिप्स, क्रैकजैक के बिस्कुट, मैगी ने हमारे जीवन में जब चुपके से घुसपैठ की, तो हम वक्त के साथ अपने जायके के बदलाव को पहचान ही नहीं पाए। पहले से झुकी पाई की कमर अब एक सौ बीस से नब्बे डिग्री की ओर झुकने लगी थी और बीड़ी-तंबाकू के सेवन का असर अक्सर खांसी और उखड़ती सांसों के रूप में सामने आने लगा था! बढ़ती उम्र के आगे विवश पाई की गैरहाजिरी बढ़ती चली गई और धीरे-धीरे गली भी भूलने की आदत डालने लगी कि चार बजने और चाय पीने के समय का पर्याय पाई कब से गली में नहीं आया था! नई नन्ही पीढ़ी ने जब कदम बढ़ाना शुरू किया तो वह टॉफी, चॉकलेट और कुकीज की दीवानी हो चली थी और हमारी पीढ़ी द्वारा यह मान लिया गया कि अब बढ़ती उम्र की ओर अग्रसर सदाबहार पाई उस बूढ़े वृक्ष की तरह हो गया है, जिसके सूख जाने पर लोग भूल जाते हैं कि उसकी छायादार उपस्थिति और फल कभी जीवन का अहम हिस्सा हुआ करते थे।

अलबत्ता सांझ के उसी मुहाने पर खड़ी वे अनुभवी आंखें अब भी कभी-कभी शाम को चौराहे के निकट उस खाली जगह को निहार कर ठंडी सांस ले, धीमी, थकी आवाज में जमाने की रफ्तार की बात कर उदास हो जाया करती, जिन्होंने विभाजन की विभीषिका से गुजर कर इस मोहल्ले को दशकों पहले गुलजार किया था! पाई ने जिनके साथ चने-मुरमुरे ही नहीं, सुख के जश्न और दुख का मातम भी बांटा था। खासकर ईश्वरी देवी और गामे की मां अक्सर उन दिनों की स्मृतियों में डूब जातीं, जब उनका और बगल के गांव से पाई का परिवार उजड़ कर पाकिस्तान से यहां आ बसा था।  बंटवारे के दर्दनाक विस्थापन ने उन लोगों के बीच एक सहज अपनापा-सा कायम कर दिया था, जो तमाम वर्ग-विभेद से परे अपनी जगह ताजिंदगी कायम रहा। वे उजड़ कर यहां बस तो गए थे, पर उनकी जड़ों का एक अदृश्य सिरा आज भी वहीं कहीं अटका था, जहां की मिट्टी में उन्होंने पहली सांस ली थी, जहां पहली बार लड़खड़ाते कदमों को साध चलना सीखा था। उम्र की सांझ में मन रह-रह कर स्मृतियों की ओर लौटता और अब जब सांसों की ये डोर कमजोर और पुरानी हो चली थी, उन्हें लगता था कि वे सब एक डाल पर लगे सूखे, जर्द पत्तों की तरह हैं, जिन्हें काल की आंधी में समय पूरा होने पर, एक-एक कर बेआवाज, टूट कर गिर जाना है। कल उनके बुजुर्ग गए, कुछ के पति-पत्नी बिछड़े, तो कुछ के संगी-साथी-साथिनें छोड़ कर अनंत-यात्रा पर निकल गए, और आज शायद पाई और आने वाले किसी कल को उनकी भी बारी है।

फिर अगले दिन सुबह चाय-नाश्ता कर वे सब पैदल ही निकल पड़ीं, अपने उस बीमार साथी से मिलने, कुछ दूर पर बसी एक स्लम बस्ती की ओर, जहां बीते दिनों की यादों के साए में वह अपनी शाम के डूबने की प्रतीक्षा में दिन काट रहा था। इस अप्रत्याशित मुलाकात में फिर समय के वरक पलटे गए, मन लौट चला स्मृति के गलियारों में, जहां वे साथ दौड़े, भागे, उजड़े, बसे और फिर धीरे-धीरे बदल गए पीले पत्तों में। आभार की मुद्रा में दोनों हाथ जोड़े, पाई की जर्द भीगी आंखों ने अबोले ही विदा के शब्द बुदबुदाए और वे मन-मन वजनी कदमों से खामोश अपने नीड़ की ओर लौट चलीं! इस मुलाकात ने उनके मन को भारी और दुख के रंग को और गहरा दिया था।  ‘सुबह को रोज दोपहर और दोपहर को शाम हो जाना है। यह कुदरत का नियम है गामे की मां। हम सब बखत के चक्के के गुलाम हैं। एक दिन सब पीले पत्तों को गिर जाना है, तभी तो जम्मेंगीं निक्की-नई कोंपले।’ ईश्वरी देवी ने दार्शनिक भाव से कहा तो गामे की मां निर्वात को ताकते हुए सहमति की मुद्रा में सिर हिलाने लगी!

‘पत्ता टूटा डाल से, ले गई पवन उड़ाय, अब के बिछड़े कब मिलेंगे दूर पड़ेंगे जाय…’ पास बैठी सोनबाई माला फेरते हुए गुनगुनाने लगीं! चंद रोज बाद ईश्वरी देवी ने फिर धूप सेंकती वृद्धाओं के समूह को अनमने ढंग से सांझ के उस दीपक के बुझ जाने की खबर दी, जिसने कभी ढेर से नन्हे जुगनुओं को अपनी रोशनी से जगमगाया था। समय अपनी गति से चलता है, दोपहर ने ढलना नहीं छोड़ा, घड़ी ने चार बजाने बंद नहीं किए, पर नन्ही हथेलियां अब कभी झुंगा पाकर नहीं मुस्कुराएंगी। डाल से एक पत्ता फिर टूट कर समय की आंधी में खो गया था, कभी न लौट कर आने के लिए और बाकी बचे पीले पत्ते अब अपनी बारी की प्रतीक्षा में नन्ही कोंपलों को खिलते देख रहे थे। ०

 

 

 

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First Published on November 27, 2016 2:26 am

सबरंग