December 06, 2016

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नावाचार और नृत्य

नृत्य की खूबी है कि वह हर बार दर्शक की जिज्ञासा को नया और गहरा करती जाती है।

Author November 27, 2016 04:04 am
नृत्य की खूबी है कि वह हर बार दर्शक की जिज्ञासा को नया और गहरा करती जाती है।

सुनील मिश्र

भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा में, विशेषकर दक्षिण भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों में साधना और संस्कारों के साथ-साथ अभिव्यक्तिपरक संयोजन और चटख रंगों के परिधानों के साथ अनूठे शृंगार और कला बोध के साथ मंच पर दिखाई देनी वाली प्रस्तुति अलग से आकृष्ट करती है। नृत्य की खूबी है कि वह हर बार दर्शक की जिज्ञासा को नया और गहरा करती जाती है। गुरु-शिष्य परंपरा की थाती दक्षिण भारतीय शास्त्रीय कलाओं के परिवेश और परिप्रेक्ष्य में जिस तरह से विद्यमान है। उस पर समय-समय पर विद्वानों और विश्लेषकों ने बहुत कुछ लिखा है। इधर जब हम बात भरतनाट्यम नृत्य की करते हैं तो साधकों से लेकर परंपरा के संवाहकों तक पद्मा सुब्रमण्यम से बाला देवी चंद्रशेखर का नाम अपने आप सामने आ जाता है। यह परंपरा गुरु से चलकर शिष्य तक आई है। पद्मा सुब्रमण्यम की प्रतिष्ठा एक मूर्धन्य कलाकार के रूप में है जिन्हें कला के क्षेत्र में हर प्रतिष्ठित सम्मान मिले हैं और उन्होंने न केवल नृत्यांगना के रूप में बल्कि एक अध्येता, विद्वान विश्लेषक के रूप में बड़ी ख्याति और सम्मान अर्जित किया है। उन्होंने अपनी प्रतिभा से गहन नृत्य शोध किया और नृत्य क्षेत्र में भी नई दिशाएं भी तलाशीं। वे श्रेष्ठ नृत्यांगना, शोधक, संगीत रचनाकार और शिक्षक की सम्मिलित प्रतिभाओं का दुर्लभ संयोग हैं। उनका नृत्य व्यवहार अनुपम है। भरतनाट्यम की आंगिक गतियों, मुद्राओं और तालवाही समायोजन की बारीक लय उनमें दिखती है। पद्माजी ने अपनी नृत्य शैली को रूढ़ि से निकालकर प्रयोगधार्मिता को बढ़ावा दिया है। बानिक शैली के पुनराविष्कार का श्रेय उन्हें है, जो एकल अभिनय के काफी करीब है।

वे कल्पनाशीलता और आशुरचना, संगीत पक्ष पर असाधारण अधिकार, आंगिक शैली, लयकारी और प्रदर्शन पद्धति की अनेक विशेषज्ञताओं के साथ अपनी अभिव्यक्ति में विस्मयकारी सौंदर्य की सृष्टि करती हैं, जिसमें हमारी उच्चतम कला विरासत के भव्य उदात्त और गरिमासंपन्न रूप की भरपूर झलक मिलती है। वीराली मलाई कुरावंजी, पारिजात अपहरणम, अर्धनारीश्वर कुरावंजी, अन्नाई अझाईक्किरल, नाग रूक्कुअप्पाल, वल्ली कल्याणम, सिलप्पादिकारम आदि उनकी विशिष्ट रचनाएं हैं। ऐसे ही गुरु-शिष्य परंपरा, सान्निध्य और अनुशासन में परिष्कृत होकर विश्व के सांस्कृतिक पटल पर अपना प्रतिष्ठापूर्ण स्थान बनाने का काम बाला देवी चंद्रशेखर ने किया है। वे लंबे समय से अमेरिका में रह रही हैं लेकिन भारतीयता की जड़ों में पली-बढ़ी बाला देवी ने पद्मा सुब्रमण्यम का शिष्यत्व हासिल कर अपनी कला को विकसित किया है। अपनी गुरु की ही तरह वे स्वयं भी एक साधिका हैं। वे कला में अभिव्यक्ति के साथ ही अध्यययन और मनन को भी उतना ही महत्त्व देती हैं और उनका यह भी मानना रहा है कि कला के स्थपतियों में परंपरा, अवधारणाओं, सौंदर्यपरकता, अनुशासन, नवाचार का विशेष महत्त्व है।

बाला देवी चंद्रशेखर की भी पहचान कलाकार रूप में स्थापित हो चुकी है। वे भरतनाट्यम के दार्शनिक पक्षों के साथ-साथ उसकी तार्किकता और अभिव्यक्ति के सिद्धांतों पर लगातार लिखती रही हैं। उन्होंने नृत्य कला परंपरा के निर्वहन को अपनी पूंजी-विस्तार माना है। उनके प्रदर्शन, विशेषरूप से विषय केंद्रित रचनाएं काफी सराही जाती हैं। न्यूजर्सी में अपनी एकेडमी के माध्यम से नृत्य कला को विस्तार देने की कोशिश की है। भारतीय नृत्य कला के व्याकरण को समझाने की उनकी शैली का ही असर है, लोग अमेरिका में भी भरत नाट्यम के दीवाने हो रहे हैं। भरतनाट्यम के साथ-साथ नृृत्य, इतिहास, दर्शन, भाषाविज्ञान को भी उन्होने पाठ्यचर्या का हिस्सा बनाया है।

ऐ से समय में जब शास्त्रीय नृत्यों में समूह प्रदर्शन का चलन बढ़ गया है, बाला देवी चंद्र्रशेखर ने एकल नृत्य करके अपनी अलग छाप छोड़ी है। मंच पर नृत्य करते हुए वे शास्त्रीय गरिमा से ओतप्रोत दीखती हैं। उन्होंने अपनी एक अलग ही शैली विकसित की है। नृत्य में उनकी ऊर्जा और क्लैसिकी को साफ देखा जा सकता है। समय-समय पर उन्होंने दूसरी शास्त्रीय नृत्य शैलियों से भी सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की है। ऐसे प्रयत्नों को उन्होंने जिन नृत्य प्रयोगों में ढाला है, उनको कला जगत के जानकारों और जिज्ञासुओं ने काफी सराहा है। वे कला और सांस्कृतिक पक्षों में अध्यात्म, परंपरा, साहित्य आदि को शामिल करने की पक्षधर हैं। बाला देवी अपनी सर्जना और सार्थकता को कला के एक बड़े तबके तक अपनी बात पहुंचाने में सफल कही जा सकती हैं। वे अपनी गुरु की ही भांति व्याख्यान, शोध, चर्चा और प्रदर्शन यानी हर मंच पर मौजूद रहती हैं। उन्हें इस कारण कला जगत में काफी सम्मान मिला हुआ है। एक प्रकार से वे भारत की एक ऐसी सांस्कृतिक साथी हैं, जो विदेशी धरती पर अपनी यशपताका फहरा रहा है। आज जब हम शोरशराबे के ऐसे दौर में हैं, जहां फटाफट सफलता अर्जित करने की होड़ लगी है, तब किसी के लिए चुपचाप, बाजार से दूर एकव्रती बनकर किसी कला के लिए जीना सचमुच चुनौती का काम है। लेकिन, बाला देवी ऐसा कर रही हैं। उन्होंने भरतनाट्यम जैसी कठिन नृत्यशैली को अपने नवाचारों से समृद्ध किया है।

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First Published on November 27, 2016 4:03 am

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