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विमर्श- लोकमानस का पुनर्गठन

आदिवासी समाजों को अपनी धार्मिक सांस्थानिकता के अधीन प्रस्थित करना मात्र एक धार्मिक उपक्रम नहीं है; पूरा व्यावसायिक कुचक्र उसके साथ नत्थी है।
Author November 12, 2017 04:24 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

शंभु गुप्त 

विवेकपूर्ण और तर्कसंगत समाजीकरण और संस्कृतिकरण की प्रक्रिया और प्रविधि को अमल में लाना सबसे पहले स्वयं के इस प्रक्रिया और प्रविधि में दक्ष होने की मांग करता है। अब समस्या यह है कि हम इसमें दक्ष कैसे हों? क्योंकि हम भी तो दरअसल समाजीकरण और संस्कृतिकरण की उसी प्रक्रिया और प्रविधि के अंतर्गत पले-बढ़े हैं, जो इस समय चालू है और जिसने हमारे मन-मस्तिष्क को बनाया है और जिसके ‘संस्कार’ हमारे अंदर भी गहरे जड़ें जमाए हैं। मसलन, अगर हम सवर्ण हैं और पुरुष हैं और ठीक-ठाक वित्तीय स्थिति में हैं, तो चीजों को देखने का हमारा नजरिया किसी असवर्ण या दलित-समुदाय से जुड़े व्यक्ति से, किसी स्त्री, आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति से पर्याप्त ही नहीं, नितांत भिन्न होगा और ऐसा इसलिए होगा कि हमें घुट्टी में वह सब बाकायदा पिलाया गया है। इस घुट्टी से निजात कैसे पाई जाए? खूब पढ़-लिख लेने, सिद्धांतों, अवधारणाओं, विचार-परंपराओं आदि को घोंट लेने, तेज-तर्रार तर्क-वितर्क में माहिर होने के बावजूद न जाने क्या कसर रह जाती है कि घर पर आते या व्यक्तिगत होते ही संस्कारों का शंखनाद स्वत: फूट पड़ता है। इसका अर्थ हुआ कि केवल ज्ञानार्जन या पढ़-लिख लेने का भी कोई असर नहीं होता। हमारे अंदर के संस्कार, प्रवृत्तियां, आदतें आदि ज्यों की त्यों बनी रहती हैं।

बहुत-सारे सुशिक्षित औरतर्कवादी लोग भी इस मामले में गच्चा खा जाते हैं। वे बाकी सब जगह बहुत वैज्ञानिक, तर्कसंगत, अवधारणापरक, अपरंपरावादी आदि रहेंगे, लेकिन जैसे ही अपने घर का और खासकर स्त्री संबंधी कोई मुद्दा आएगा, वे ‘परवश’ हो जाएंगे! जैसे कि हिंदू समाज में एक और स्त्री-विरोधी परंपरा न जाने कब से चली आती है, ‘कन्यादान’ की रस्म। हम आज तक इसका कोई वैकल्पिक तोड़ नहीं निकाल पाए हैं। कन्यादान एक ऐसी रस्म है, जो स्त्री का वस्तुकरण करती है। ‘दान’ किसी वस्तु का होता है, व्यक्ति का नहीं। दान की हुई वस्तु दान किए जाने से पहले दान करने वाले के स्वामित्व में होती है। दान कर दी जाने के बाद उसका स्वामित्व जिसे उसे दान किया गया है, उसके पास हस्तांतरित हो जाता है। यानी कि पहले भी वस्तु, बाद में भी वस्तु! इधर भी वस्तु और उधर भी वस्तु! लोगों ने पूंजीवाद को, नवपूंजीवाद को, खुले बाजार को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि यह स्त्री को एक वस्तु में तब्दील कर देता है। लेकिन स्त्री के स्वतंत्र, समानतामूलक और स्वत्वपूर्ण व्यक्तित्व की जड़ों में मट्ठा डालने का काम हमारे जिन कथित धर्मग्रंथों ने किया है, उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। जाता भी है तो केवल अकादमिक बहसों और शोध के लिए, पाठ्यक्रमों के हिस्से के रूप में पढ़ने-पढ़ाने के लिए! मगर इस मुद्दे को कोई गंभीरता से लेने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाता। अधिकतर लोग इसे फौरी तौर पर लेते हैं और चलता कर देते हैं। स्थितियों में बदलाव इसीलिए नहीं होता। कथित धार्मिक प्रावधानों/ व्यवस्थाओं के खिलाफ कोई बोलना नहीं चाहता, बोलने की हिम्मत किसी की नहीं होती, क्योंकि लोगों के मन में यह बैठा हुआ है या कहें कि बैठा दिया गया है कि यही सबसे सहज और स्वाभाविक जीवन-प्रविधि है! जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं।

आदिवासी समाजों को अपनी धार्मिक सांस्थानिकता के अधीन प्रस्थित करना मात्र एक धार्मिक उपक्रम नहीं है; पूरा व्यावसायिक कुचक्र उसके साथ नत्थी है। संस्थान का प्रारूप लेते ही धर्म की तत्त्व-प्रकृति बदल जाती है और वह सत्ताशीलता की ओर उन्मुख होने लगता है। आदिवासियों को अपने सांस्कृतिक झंडे-तले लेने का सबसे बड़ा मकसद जल-जंगल-जमीन से जुड़े वे प्राकृतिक साधन-संसाधन हैं, जिन पर इन आदिवासियों का पुश्त-दर-पुश्त स्वामित्व रहा है। आदिवासी/ मेहनतकश लोग सहज विश्वासी और संवेदनशील होते हैं। इनकी इसी सहजता और संवेदनशीलता का गलत फायदा उठाते हुए धर्म-संस्थाएं ऐसा छद्म और दुरभिसंधि-मूलक दुश्चक्र रचती हैं कि अच्छे से अच्छा समझदार व्यक्ति भी उनके जाल में फंस जाता है। आदिवासियों/ मूलवासियों के ‘संस्कृतिकरण’, उन्हें कथित ‘मुख्यधारा’ में लाने का यह सारा उपक्रम प्रकारांतर से उन्हें उनकी अपनी संस्कृति और परंपरा से समूल विच्छिन्न करके सवर्णवादी/ ब्राह्मणवादी संस्कारों में ढालने का होता है। पूरी तरह ढल जाने के उपरांत इनका काम सिर्फ इनके एजेंट या कार्यकर्ता बने रहने का है। इन्हें गुजारे लायक साधन उपलब्ध कराते हुए बाकी सब पर धीरे-धीरे इनका एकाधिकार होता जाता है। स्पष्ट है कि आदिवासियों आदि को कथित ‘मुख्यधारा’ में लाने की इस कवायद का असल मकसद उन्हें अपने जड़मूल से उखाड़ कर अपनी वर्णाश्रमवादी संस्कृति में पुनररोपित कर देना है। लेकिन हम सब जानते हैं कि किसी भी तरह का सांस्कृतिक पुनररोपण किसी भी व्यक्ति या समूह/ समुदाय को बहुत भारी पड़ता है और वह न इधर का रहता है, न उधर का। वह एक प्रकार से सांस्कृतिक विस्थापन की चपेट में आता चलता है।

एक बार सांस्कृतिक पहचानहीनता में पहुंचा हुआ समाज कालांतर तक इससे उबर नहीं पाता। अस्मितावादी वैचारिकी और तज्जन्य संघर्ष की शुरुआत यहीं से होती है। सबाल्टर्न आंदोलन की देन यही है कि उसने ‘अस्मिता’ को केंद्र में रखते हुए सदियों से वंचित तबकों को असल मुख्यधारा बनाया और एक ठोस प्रतिरोध खड़ा करना सिखाया। प्रतिरोध की स्थितियों में एक प्रकार का नवजागरण अनिवार्यत: परिघटित होता है। यह नवजागरण एक नए किस्म का संस्कृतिकरण ही होता है। लोकमानस की पुनर्स्थापना होती है और शोषण, अन्याय, दमन, अत्याचार, छद्माचरण आदि की स्थितियों पर विराम लगता है। इसलिए लोकमानस की स्थापना का अर्थ है- हर प्रकार की असमानता, अन्याय, शोषण, दमन, छद्माचरण (हिप्पोक्रेसी) आदि पर विराम। लोकमानस केवल आमोद-प्रमोद, आह्लादपरकता आदि का पर्याय नहीं है, जैसा कि हमारे अनेकानेक ‘शिष्ट’ जन पूर्वाग्रह पाले रहते हैं कि ये लोग तो होते ही ऐसे हैं!
लोकमानस की पहचान यह है कि वह मूलभूत रूप से श्रमशील होता है। उसकी सुंदरता उसकी यही श्रमशीलता है। इस श्रमशीलता से अस्मिताबोध की उत्पत्ति होती है। अस्मिताबोध फिर प्रतिरोध को जन्म देता है। लोक अपनी अस्मिता के प्रति लापरवाह हो जाए, उसे व्यर्थ की चीज समझने लगे, उसके प्रति सम्मान और आत्मसम्मान की उसकी भावना नेस्तनाबूद होना शुरू हो जाए, इसके लिए संभ्रांतवादी मानसिकता सबसे पहले उसके श्रम का असंदर्भीकरण/ अलगाव सुनिश्चित करती है। श्रम के साथ अलगाव/ असांदर्भिकता/ अन्यथाकरण की शुरुआत दरअसल लोकमानस के विचलित होने की ही शुरुआत है।
लोक का स्वरूप निर्मित करने वाले, उसका स्वरूप, उसका संघटन तैयार करने वाले प्राय: समस्त घटकों के साथ कथित संभ्रांतताओं ने लगभग दोयम दर्जे का व्यवहार किया है। चाहे वह स्त्री हो, मूलनिवासी/ आदिवासी हों, शिल्पी-कामगार-किसान हों, या इसी तरह के कोई और समूह। लोक-गीतों, लोक-कथाओं, लोक-गाथाओं, लोकोक्तियों, लोक-कलाओं में इन घटकों का स्वत्व, पीड़ा, हर्ष-उल्लास, नैतिकता, जिजीविषा, खिलंदड़ापन, जुझारूपन, अस्मिताबोध, झोली-फटकार वृत्ति आदि सब-कुछ अभिव्यक्त होता दिखाई देता है। इन अभिव्यक्तियों में बहुत-कुछ ऐसा है, जो लोक-वृत्ति के अनुकूल नहीं है। वह इनके दिलोदिमाग में धीरे-धीरे रोपित किया गया है। अन्य शब्दों में जिसे ‘स्ट्रक्चरल ट्रांस्फॉर्मेशन आॅफ पब्लिक स्फियर’ (हैबरमास) कहा जाता है। या जिसकी प्रक्रिया ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’ (चॉम्स्की) द्वारा पूरी होती है। यह अपनी बात, धारणा, मनोवृत्ति, स्वभाव, सोचने का तरीका आदि को दूसरे पर लादने जैसा उपक्रम है। दूसरे के दिमाग को अपने अनुसार ढालना।

भारत में वर्ण-व्यवस्था के जरिए श्रम की जो गर्हणा और अवमानना-अवहेलना की गई है, उसने लोक को लगभग नेस्तनाबूद कर दिया है। लोक के नाम पर हम ब्राह्मणवादी-सवर्णवादी-संभ्रांततावादी जीवन-चर्या का ही पोषण करते जाते हैं। ब्राह्मणवादी-सवर्णवादी-संभ्रांततावादी शक्तियां और उनकी एजंसियां लोक के इस ‘डिरेलमेंट’ में अब भी लगी हुई हैं। दरअसल, लोक को इन्हें न ब्राह्मण बनाना है, न सवर्ण और न ही संभ्रांत। उन्हें केवल इतना करना है कि ये अपना स्वत्व, अस्मिता आदि भूल कर, उसे परे कर इनके अधीन, आश्रित और मुखापेक्षी हो जाएं! इसलिए सोचने की जरूरत है कि लोकमानस का पुनर्गठन कैसे किया जाए? इसके लिए हमें प्राथमिक तौर पर दो काम करने होंगे। पहला तो यह कि हम श्रम की पुनर्प्रतिष्ठा का व्यापक आंदोलन चलाएं। और दूसरा यह कि एक सही और तर्कसंगत इतिहास-दृष्टि का विकास करना शुरू करें। यह इसलिए भी जरूरी है कि जो इतिहास हमने पढ़ा है, या हम पढ़ते हैं, वह दरअसल विजेताओं का इतिहास है। गौर से देखा जाए तो दरअसल, यह उस मेहनतकश लोक की पराजय का इतिहास है, जिसे पराजित करना विजेताओं का असल उद्देश्य था। पराजितों का इतिहास विजेता का इतिहास नहीं तो, स्वाधीनता का इतिहास तो कम से कम बने; हमारा यह प्रयास होना ही चाहिए! ०

 

 

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  1. R
    RAKESH Kaushik
    Nov 12, 2017 at 9:33 pm
    Asli liberal bno.. Leftism is the worst for the unity of the country... #manuvaad ki kaat ambedakarwaad Kaise Ho skta h.. Balance Kro.. Don't devide Hindus..
    (1)(0)
    Reply