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इकबाल रिजवी का लेख : कठोरता की मिसाल

यों तो ललिता पवार ने अपने अभिनय की शुरुआत बाल कलाकार से की थी। बड़े होकर उन्होंने कई फिल्मों में अभिनेत्री भी रहीं। लेकिन, एक संयोग ने उन्हें परदे का क्रूर सास बना दिया। बाद में तो वे कठोरता की पर्याय ही बन गर्इं।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 07:37 am
ललिता पवार

ललिता पवार यानी फिल्मी परदे पर एक ऐसी औरत, जिससे घर-घर में नफरत की जाती है। एक ऐसी औरत जिसने अत्याचारी सास के ऐसे जीवंत किरदार अदा किए कि भारतीय समाज में मां अपनी बेटियों के लिएं दुआ करती थीं कि भगवान मेरी बेटी को ललिता पवार जैसी सास न दे। अपने अभिनय से पूरे देश के जनमानस पर ऐसी क्रूर छवि प्राण के अलावा और कोई नहीं बना सका। ऐसा सशक्त अभिनय करने वाली ललिता पवार का यह जन्म शताब्दी वर्ष है।

महाराष्ट्र के नासिक में 18 अप्रैल, 1916 को अंबा लक्ष्मण राव शागुन यानी ललिता पवार का जन्म हुआ था। उनके पिता कपड़ों के व्यापारी थे। यह महज इत्तेफाक था कि सात साल की उम्र में वे अपने भाई शांताराम के साथ एक फिल्म की शूटिंग देखने पहुंचीं। वह मूक फिल्मों का दौर था।

फिल्म के निर्देशक नानासाहेब सरपोतदार को फिल्म में एक चुलबुली और बातूनी लड़की की बड़ी शिद्दत से तलाश थी। जब उन्होंने ललिता को अपने भाई से चटर-पटर बातें करते सुना तो वे ठिठक गए। थोड़ी ही देर में उन्हें अहसास हो गया कि जिस बच्ची की उन्हें तलाश है वह यही है। उन्होंने ललिता के पिता से बात की और बतौर बाल कलाकार अठारह रुपए महीने के वेतन पर ललिता पवार और सात रुपए महीने पर उनके भाई शांताराम ने काम करना शुरू कर दिया। जिस पहली फिल्म में ललिता को ब्रेक मिला उसका नाम था आर्य महिला।

इसके बाद अंबू के नाम से ललिता ने ‘पतित उधार’ गामिनी कावा, दशरथी राम और परिजातक में बाल कलाकार के रूप में काम किया। इसके बाद नन्ही अंबू ललिता पवार के नाम से हीरोइन बन गई। बतौर हीरोइन उनकी फिल्म आई ‘हिम्मते मर्दा’ (1935)। इसमें ललिता का ग्लैमरस अवतार देख दर्शक दंग रह गए। अगली फिल्म ‘दैवी खजाना’ (1935) में उन्होंने स्विमिंग सूट पहना। आज यह सोच कर लगता है कि दैवी खजाना की रिलीज के बाद तो हंगामा हो गया होगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ क्योंकि तब तक सिनेमा की समाज पर इतनी गहरी पकड़ नहीं बन पाई थी कि किसी फिल्म के दृश्य से हंगामा खड़ा हो जाए। लेकिन ललिता के पास फिल्मों के धड़ाधड़ प्रस्ताव आने लगे। यह उनके करिअ‍ॅर का पहला बड़ा अवसर था।

फिल्मों ने ललिता की जीवन धारा बदल दी। वह स्टंट फिल्मों का जमाना था। ललिता ने स्टंट सीन में कभी डुप्लीकेट का सहारा नहीं लिया। हालांकि, खुद स्टंट करने के दौरान उन्हें कई बार चोटें भी लगीं। लगातार हिट फिल्में दे रही ललिता ने फिल्म निर्माण में भी हाथ डाला और अंबिका फिल्म्स के नाम से अपना कंपनी बनाई। अपनी फिल्म कंपनी के बैनर से उन्होंने ‘तलाश’ बनाई, जिसमें उन्होंने नायिका, खलनायिका और मां की तिहरी भूमिका निभाई।

तिहरी भूमिकाएं करने की वजह यह थी कि उन दिनों महिला पात्रों के लिए महिलाओं का अभाव था और फिल्म के लिए धन की व्यवस्था भी एक बडी समस्या थी। ललिता ने तिहरी भूमिका करके इस समस्या का हल कर दिया और साथ ही साथ एक प्रतिमान भी स्थापित कर दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। उन्होंने फिल्म ‘चतुर सुंदरी’ में अद्भुत कीर्तिमान बना दिया, जिसकी अब कोई चर्चा तक नहीं करता । इस फिल्म में उन्होंने सत्रह किरदार अदा किए थे। 1938 में आई फिल्म ‘दुनिया क्या है?’ भी उन्होंने ही बनाई थी। और फिर ललिता ने उनकी कई फिल्मों के निर्देशक रहे जीपी पवार से शादी कर ली। लेकिन दोनों का रिश्ता बहुत दिनों तक नहीं चल सका क्योंकि पवार ललिता की बहन में रुचि लेने लगे थे।

इसके बाद ललिता पवार ने अंबिका स्टूडियो के मालिक राज प्रकाश गुप्ता से शादी कर ली। लेकिन ललिता ने पवार सरनेम नहीं छोड़ा क्योंकि फिल्मी दुनिया और दर्शक तब तक उसके इस नाम से अच्छी तरह परिचित हो चुके थे।
ललिता पवार का करिअ‍ॅर काफी अच्छा चल रहा था, तभी अचानक उनके लिए सब कुछ ठहर सा गया। एक फिल्म की शूटिंग में अभिनेता भगवान दादा ने उन्हें ऐसा थप्पड़ मारा कि उनके चेहरे की नस फट गई। यह घटना 1948 में रिलीज हुई फिल्म ‘जंग-ए-आजादी’ के शूटिंग के दौरान हुई। इस घटना ने उनकी जिंदगी ही बदल दी।

तीन साल तक उनका इलाज चला लेकिन चेहरे पर खास तरह का खिंचाव हमेशा बना रहा। इससे उनका करिअ‍ॅर ही बर्बाद हो गया। ललिता पवार को अहसास हो गया कि उनकी हीरोइन की करिअ‍ॅर खत्म हो गया, लेकिन तब तक सिनेमा ललिता की जिंदगी बन चुका था। वे इससे दूर रह कर जीवित रहने की कल्पना भी नहीं कर सकती थीं। उन्होंने तय किया कि उन्हें जो भी भूमिका मिलेगी, उसे करेंगी। उन्हें सहायक अभिनेत्री की भूमिका मिलने लगी, जिन्हें उन्होंने पूरी मेहनत और लगन से निभाया। खास बात यह रही कि थप्पड़ वाले हादसे की वजह से उनकी जो आंख छोटी लगने लगी थी वहीं उनके अभिनय की पहचान बन गई। 1950 में वी शांताराम की फिल्म ‘दहेज’ ने ललिता को ऐसी छवि दे दी जिसकी वजह से वे सिनेमा के इतिहास में अमर हो गर्इं।

इस फिल्म में ललिता पवार ने एक ऐसी क्रूर सास का अभिनय किया जिसकी हरकतें देख दर्शक कांप उठे। इसके बाद तो सास की भूमिका में ललिता पवार का कोई मुकाबला ही करने वाला नहीं रहा। भारतीय समाज में आज भी क्रूर सास का नाम ललिता पवार ही रख दिया जाता है। हालांकि, इससे पहले भी ललिता पवार नकारात्मक भूमिकाएं कर चुकी थीं लेकिन ‘दहेज’ उनके लिए मील का पत्थर बन गई। 1955 में राजकपूर की फिल्म ‘श्री 420’ में उन्हें नरम दिल वाली वाली गंगा बाई की भूमिका मिली और ललिता ने अपने अभिनय से सबको चकित कर दिया। फिर भी कठोर सास, क्रूर ननद और षड़यंत्रकारी जेठानी की भूमिकाओं के लिए ललिता पवार फिल्मकारों की पहली पसंद बनी रहीं।

फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी को उनकी अभिनय प्रतिभा देख यह अहसास था कि ललिता पवार से नर्म दिल महिला की भूमिका भी उसी खूबी से कराई जा सकती है। उन्होंने 1959 में आई फिल्म ‘अनाड़ी’ में ललिता को ऊपर से सख्त, लेकिन अंदर से कोमल ‘मिसेज डिसूजा’ की भूमिका दी। इस किरदार ने न सिर्फ लोगों का दिल जीता, बल्कि उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का ‘फिल्मफेयर अवॉर्ड’ भी दिलवाया। इसी तरह मेम दीदी में वे दो निकम्मों-जयंत और डेविड को अपने यहां शरण देने वाली दीदी बन कर दर्शकों के दिलों की गहराइयों में उतर गर्इं, जबकि शम्मी कपूर की फिल्म ‘प्रोफेसर’ में प्रोफेसर के प्यार में पड़ कर ललिता ने हास्य के कई अवसर पैदा किए।

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  1. प्रकाश डी
    Jun 5, 2016 at 4:35 am
    बेमिसाल अदाकारा की जानकारी देने के लिये धन्यवाद
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    Reply
    सबरंग