December 10, 2016

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मुद्दा: बाल दिवस की जरूरत

माता-पिता को अपने बच्चों को वे सब चीजें भी सिखानी चाहिए जो भविष्य में उनके जीवन के लिए उपयोगी हो।

प्रतीकात्मक तस्वीर ।

चौदह नवंबर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मोत्सव के लिए खास माना जाता है। नेहरू को बच्चों से खूब प्यार था और बदले में बच्चे भी उन्हें प्यार से चाचा नेहरू कहकर संबोधित करते थे। बच्चों से उनके इस विशेष लगाव के परिणामस्वरूप ही उनका जन्म दिन ‘बाल दिवस’ के रूप में लोकप्रिय है। जैसा कि नाम से ज्ञात है-बाल दिवस मतलब बच्चों का दिवस। इस दिवस पर बच्चों के विकास, प्रगति और बेहतरी की बातें भी खूब होती हैं। इस दिन स्कूलों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रयास किए जाते हैं। स्कूलों में मनाए जाने वाले ये उत्सव ज्ञानपरक के साथ-साथ विशेष दर्शनीय भी होते हैं, जिसे देखकर और इसमें भाग लेकर बच्चे खुश हो जाते हैं। सरकार भी बच्चों की बेहतरी के लिए कई योजनाएं घोषित करती है और अपने बयानों से जताती है कि बच्चे देश के भविष्य हैं। मगर बात इससे खत्म नहीं होती। किसी भी बच्चे का सबसे अधिक अधिकार अपने मां-बाप और अभिभावकों पर होता है। बच्चे सबसे ज्यादा मां-बाप से जुड़े होते हैं तो उनसे प्रभावित भी ज्यादा होते हैं। इसलिए मां-बाप और बच्चों के रिश्ते पर ‘बाल दिवस’ पर खूब चर्चा होती है।

वैसे तो मां-बाप और बच्चे आजीवन एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। मगर बचपन का समय खास होता है। यह अच्छा भी है क्योंकि बचपन जीवन का प्रथम काल होता है। जिसका बचपन सुंदर बीते…उसके भविष्य की अच्छी कामना और उम्मीदें की जाती हैं। इसकी वजह यह भी है कि संस्कार से लेकर शिक्षार्जन और मजबूती की बुनियाद इसी काल में पड़ती है। तभी बचपन को स्वर्णिम काल भी कहा जाता है और विद्यार्थी के रूप में इसका सदुपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। माना यह भी जाता है कि इस काल में जैसी परवरिश, शिक्षा और संस्कार मिलता है, उसका असर व्यक्ति पर आजीवन रहता है। वैसे तो हर मां-बाप के लिए उसका बच्चा सबसे महत्त्वपूर्ण होता है वे उसके लिए हर तरह का सुख-दुख झेलने को तैयार रहते हैं। मगर बाल दिवस अगर फिर से अभिभावकों का ध्यान अपनी ओर खींचता है इसे ठीक ही कहा जाना चाहिए।

दुनिया बदलाव की ओर है। जैसे-जैसे तकनीकी का विस्तार हो रहा है वैसे-वैसे बच्चे भी उसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। जन्म से ही बच्चे टेलीविजन, कंप्यूटर और मोबाइल के बीच पलने लगे हैं, उनकी समझ में भी वृद्धि हो रही है। लेकिन, ध्यान देने की जरूरत यह भी है कि तकनीकी का ज्यादा उपयोग नुकसानदेह हो सकता है। वक्त से पहले ही बच्चे परिपक्व हो रहे हैं। बदलते समय के साथ मां-बाप और अभिभावक को भी अपडेट रहने की जरूरत है कि अपने बच्चों के विकास, प्रगति के साथ-साथ उनकी इच्छा-अनिच्छा का भी ध्यान रखें। संतान चाहे बेटा हो या बेटी, किसी को भी कम नहीं समझना चाहिए और दोनों को बराबर महत्त्व देना चाहिए। शिक्षा से लेकर रियो ओलंपिक जैसे खेल तक, बेटियों ने साबित कर दिया है कि उन्हें अवसर मिले तो कुछ भी कर सकती हैं। इसलिए, हर बच्चे को मां-बाप पूरा प्यार, अवसर और सम्मान मिलना चाहिए। आज के दौर की जरूरत यह है कि मां-बाप अपने बच्चों पर अपनी इच्छाएं न थोपें, बल्कि बच्चे के अपनी रुचि को पनपने का मौका दें।

अक्सर यह देखा गया है कि जब भी बच्चे के ऊपर अभिभावकों ने अपनी इच्छा थोपी तो उसका नतीजा गलत रहा, जबकि जब बच्चे को अपने हिसाब से चलने का मौका मिला, उसने अपने क्षेत्र में बेहतर काम किया। मां-बाप को समझना चाहिए कि बच्चा अपनी रुचि के विषय में ही बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। अधिकतर लोगों की सफलताएं इसी कहानी को दर्शाती है। चाहे बात साक्षी मलिक की हो, पीवी सिंधु की या किसी अन्य सफल व्यक्ति की…सभी व्यक्तियों में विशेष गुण होते हैं और जब वे अपने पसंद के क्षेत्र के साथ उस दिशा में सफलता के लिए जी-जान से प्रयास करते हैं तो ही सफलता कदम चूमती है। अभिभावकों को अपने बच्चों पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए और वे जो करना चाहे, उसमें उनका भरपूर साथ देना चाहिए। हां, मां-बाप बच्चे के आदर्श होते हैं तो बच्चों को बिना मतलब की नसीहत देने से उन पर बुरा असर पड़ सकता है। इसके लिए शिक्षक सहित मां-बाप को खुद का आचरण भी अनुकरणीय बनाना चाहिए ताकि बच्चा उनसे अच्छे गुण ग्रहण कर पाए। समानतापूर्ण और न्यायपूर्ण वातावरण में उसकी परवरिश करें ताकि सच बोलना और नैतिकता के साथ जीना भी उसके आचरण का हिस्सा बने।

माता-पिता को अपने बच्चों को वे सब चीजें भी सिखानी चाहिए जो भविष्य में उनके जीवन के लिए उपयोगी हो। अपना ध्यान रखने से लेकर जीवकोपार्जन, जीवनरक्षा के उपाय और किताबी ज्ञान के अलावा सामाजिक और व्यावहारिक ज्ञान तक। हां, यह भी सच है कि बचपन में बच्चे का मन खेल में अधिक लगता है और कच्ची उम्र के चलते किसी से भी वह दोस्ती कर बैठता है। उसे सही-गलत का फर्क नहीं पड़ता। तो माता-पिता को उन पर नजर भी रखनी चाहिए और अपने साथ-साथ बच्चे के व्यवहार का भी अवलोकन करते रहना चाहिए। अच्छा-बुरा क्या है, बताना चाहिए और बच्चों को उसके लक्ष्य तक पहुंचने में हर संभव मदद करनी चाहिए। इस सबके अतिरिक्त यह जरूरी है कि मां-बाप और बच्चों के रिश्ते अच्छे हों। आवश्यकता से अधिक दवाब किसी भी बच्चे के लिए नुकसानदेह और तनाव किसी के भी प्रतिभा को मार देता है। बच्चे पर विश्वास रखें और उसे उसकी क्षमताओं के हिसाब से निखरने दें। बच्चों के हित में ये तमाम बातें जैसे बाल दिवस के आते ही हम बड़ों को विचार करने के लिए प्रोत्साहित करता है। हमें उस पर ध्यान देना चाहिए। जिससे हमारे बच्चे सुखी, स्वस्थ और सुंदर बचपन जी सकें। इस लिहाज से बाल दिवस बहुत खास है।

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First Published on November 20, 2016 2:12 am

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