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भाषा-भेदी- हिंदी की बिंदी और गणमान्य भाइयों

हिंदी में बिंदी और चांदबिंदी की महिमा न्यारी रही है! दोनों ही किसी अक्षर के माथे पर बिराज कर उसकी शोभा बढ़ाती हैं, लेकिन एक-दूसरे के क्षेत्र में घुसपैठ भी बहुत करती हैं।
Author August 6, 2017 04:50 am
हिंदी वर्णमाला।

हिंदी में बिंदी और चांदबिंदी की महिमा न्यारी रही है! दोनों ही किसी अक्षर के माथे पर बिराज कर उसकी शोभा बढ़ाती हैं, लेकिन एक-दूसरे के क्षेत्र में घुसपैठ भी बहुत करती हैं। व्याकरण वाले आदर्शवादी यह घालमेल सहन नहीं कर पाते। कहते हैं इन दोनों का कुल, गोत्र, रिश्तेदारियां अलग-अलग हैं, तो इन्हें एक ही सूत्र में कैसे बांधा जा सकता है। एक ओर यह चांदबिंदी अनुनासिक है, स्वरों की विशेषता है, तो दूसरा है अनुस्वार यानी खानदानी व्यंजन। अब तो मानक हिंदी वर्तनी ने इसके सरकारी अधिकार बढ़ा दिए हैं। पूरे पांच व्यंजनों के लिए इसी रूप को मान लिया गया है! इनका एक तर्क यह भी है कि हिंदी सीखने वाले को भी असुविधा होगी। लिपि चिह्न एक हो गया, तो दोनों का अंतर वह सीखेगा समझेगा कैसे! यहां यह याद रखना होगा कि हिंदी हम हिंदी भाषियों के लिए कठिन न सही, पर जो अन्य भाषाभाषी देश-विदेश में हिंदी सीख रहे हैं, उनके लिए पांच ध्वनियों का एक संकेत समझना आसान है। हिंदी में मानक वर्तनी के समर्थक भी बवाल मचा देते हैं। मानक नियमानुसार पांचों पंचम वर्णों को अनुस्वार की बिंदी से लिखना सुझाया गया है। उच्चारण अलग वर्तनी नियम एक। संस्कृत में यह नियम नहीं चल सकता, तो उसे छूट दे दी। संस्कृत की सूक्ति हिंदी में आए तो भी छूट। परिणाम यह कि छूटों वाले बंधन से ही लोग छुट्टी कर रहे हैं! लेखक, पत्रकार, प्रकाशक सब। एक ही उदाहरण लें। मानक वर्तनी के अनुसार हिंदी मानक है, हिन्दी नहीं! हिंदी के माथे पर बिंदी! हिन्दी लिखें तो बिंदी गायब! सीधा सवाल उपजता है कि हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान की बात आधे ‘न’ से हो या शोभा बढ़ाने वाली बिंदी से? कुछ लोग तो ऐसी हिंदी को पहचानने से ही इनकार कर देते हैं। बिंदी नहीं, तो हिंदी नही!
दूसरी ओर व्यवहारवादी एक सीधी-सी दो टूक बात भी करते हैं- ‘भाई, भाषा एक आदत भी तो होती है। आखिर अंग्रेजी पढ़ते हुए कभी ‘कट’ को ‘कुट’ या ‘पुट’ को ‘पट’ कहा जाता है? आदत हो जाएगी तो उच्चारण अशुद्ध होगा ही नहीं।’ ये लोग हमें भी प्रैक्टिकल आइडियोलॉजिस्ट लगते हैं।

हमारे देश में एक परंपरा-सी है। कोई विवाद हो और उसमें गांधी जी को न घसीटा जाए, ऐसा कम ही देखा जाता है। तो बिंदी, चांदबिंदी के झगड़े में बापू को बिना उनकी मर्जी के शामिल कर लिया जाता है और सीधे सवाल किया जाता है कि गाँधी लिखना ठीक है या गांधी? देखते ही देखते एक धड़ा गांधीवादी बन जाता है और दूसरा गाँधीवादी।
गाँधीवादी दावा करते हैं कि हिंदी तो जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है। इसलिए अनुनासिक से लिखेंगे ‘गाँधी’। गांधी लिखने पर तो उसे गान्धी पढ़ा-बोला जाएगा, जबकि वे हैं गाँधी! गाँधीजी को गान्धी कैसे बनाया जा सकता है!प्रतिपक्ष यानी गांधीवादी कानूनी परामर्श लेकर आए हैं। उनका तर्क है कि गांधी आपके ही नहीं, सबके हैं। दरअसल, गांधी तो किसी व्यक्ति विशेष का नाम है और वह विशेष व्यक्ति अपना नाम सदा अनुस्वार की बिंदी से ‘मो. क. गांधी’ ही लिखा करते थे। तो जब बापू स्वयं ‘गांधी’ लिखते रहे, तो हम ‘गाँधी’ क्यों लिखें! किसी का नाम बिगाड़ने या बदलने का अधिकार हमें मिला कैसे? कानून के जानकार बताते हैं कि किसी का नाम उसकी व्यक्तिगत संपत्ति होता है, वह जैसे चाहे उसे बरते। कानूनी नुक्ता आ जाने से गाँधीवादी चुप लगा जाते हैं और फैसला गांधी के पक्ष में। सो, लिखिए गांधी और पढ़िए गाँधी! यह स्थिति लिखे मूसा पढ़े खुदा से तो अच्छी ही है!
भाइयोंबिंदी से एक मसला और जुड़ा है और मसला गंभीर है। यों भाषा से जुड़े मसले गंभीर होते नहीं, बना दिए जाते हैं। मेरी भाषा तेरी भाषा के चक्कर में यहां क्या-क्या नहीं होता रहा! राज्यों के बंटवारे हुए, आंदोलन हुए, आत्मदाह हुए। केवल पंद्रह साल टिकने की मोहलत अपने संविधान से पाई हुई भाषा तो अमरता का वरदान पा गई और जिसे सिंहासन पर बैठना था, वह चंवर डुलाती रह गई। हमारी राष्ट्रभाषा तो कोई बनी नहीं औ? हां, राजभाषा के बारे में नहीं ही पूछें तो अच्छा।
तो आज मसला है… ‘भाइयों! बहनों!!’ यह संबोधन सही है या ‘भाइयो! बहनो!!’

प्रचलन के हिसाब से देखें तो संख्याबल की दृष्टि से और संभ्रांत, पढ़े-लिखे, गणमान्य वर्ग द्वारा प्रयोग की दृष्टि से भी ‘भाइयों, बहनों’ ही कहा जा रहा है। गीता का परामर्श है कि श्रेष्ठ जन जो करें वही हमें भी करना चाहिए। इसलिए भाइयों!, बहनों!, बच्चों!, साथियों! जैसे प्रयोग धड़ाधड़ हो रहे हैं, मीडिया में भी और आम जन में भी। लेकिन ये प्रयोग अशुद्ध हैं। हिंदी का कोई व्याकरण इन्हें सही नहीं मान सकता। मूल एकवचन शब्द के साथ ‘ओं’ जोड़ कर बहुवचन बनता तो है, पर संबोधन में नहीं बनता। यों समझ लें कि ‘ओं’ को जब पद बनाने के लिए मूल शब्द से जोड़ते हैं तो उसे तुरंत एक साथी की भी आवश्यकता होती है, जैसे: बहनों ने, भाइयों को, बहुओं के लिए, देवताओं से…। संबोधन में यह साथ देने वाला नहीं होता। हो ही नहीं सकता। इसलिए संबोधन में सीधा बहुवचन रूप है भाइयो, बहनो, गुरुजनो, सभासदो आदि!
अब कोई सज्जन अगर ‘मेरे प्यारे देशवासियों!’ कहते हैं तो देशवासियों के प्रति उनके प्यार को देखिए और उस प्यार का अनुकरण कीजिए, अशुद्ध हिंदी का नहीं। हिंदी जिनकी मातृभाषा नहीं है वे एकाध भूल कर भी दें तो क्या बुरा मानना! हिंदी वाले तो उदार बताए जाते हैं।
भाग्यशाली हैं मेरे वे मित्र, जो अनुनासिक अनुस्वार के पचड़े से दूर हैं। उन्हें बोलने में जहां चाहें वहां नाक का सहारा लेने की आदत है। उनके लिए डाकू डांकू हो जाता है और चाकू चांकू। वे जब मेरे पांस आते हैं तो आंगरा का पेठां ले आते हैं, खांट पर बैंठ कर रूंमाल से चेंहरा पोंछ कर सवांल पंूछते हैं!
गणमान्य या गण्य-मान्य

अब चंूकि ऊपर ‘गणमान्य’ शब्द का प्रयोग किया गया है, इसलिए इस पर अशुद्ध होने का आरोप लगने से पहले ही इसकी चर्चा करना जरूरी लगता है। शुद्धिवादी गण्यमान्य को शुद्ध मानते हैं, क्योंकि संस्कृत में यही प्रचलित है। हिंदी स्वतंत्र भाषा होते हुए भी आत्मविश्वास के अभाव में संस्कृत का मुंह जोहती रहती है। सो, गणमान्य शब्द जनसामान्य को चाहे मान्य हो, शुद्धिवादियों को मान्य नहीं। फिर भी सच यह है कि गणमान्य अशुद्ध नहीं है। हिंदी में गण्यमान्य की अपेक्षा अधिक प्रचलित है और भाषा में अपना स्थान बना चुका है।
इसकी व्युत्पत्ति भी सरल है। गण यानी लोक, जो गण में मान्य हो, लोकमान्य हो वह गणमान्य। दूसरी ओर जो बड़े लोगों, विद्वानों में गणना के योग्य हो वह गण्य और जो माना जाने, मान्यता पाने योग्य हो वह मान्य। दोनों विशेषणों से मिल कर एक शब्द युग्म बनता है ‘गण्यमान्य’।
अब अगर दुहरे विशेषणों के भार से किसी को लादना हो तो गण्यमान्य कहें और एक सरल-सहज विशेषण पर्याप्त लगे तो गणमान्य! इच्छा आपकी। हां, इतना निवेदन अवश्य है कि यह ‘गण्यमान्य’ हिंदी के स्वभाव के अनुसार अशुद्ध न सही, अशुद्ध-सा लगता है, क्योंकि हिंदी में शब्द युग्मों के बीच योजक (हाइफन) लगाने की रीति है। सो, गण-मान्य संगत है, गण्यमान्य असंगत! जैसे रात-दिन, खेत-खलिहान। ०

 

सुरेश पंत

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  1. नवीन जोशी
    Aug 10, 2017 at 12:14 am
    बहुत खूब, मजा आ गया पन्त नहीं पंत जी।
    Reply
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