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कुचक्र में

हमारे देश में खाने योग्य कचरे में फिंका हुआ खाना और कचरे में खाना ढूंढ़ते बच्चे एक साथ दिख जाते हैं!
Author November 27, 2015 23:08 pm

हमारे देश में खाने योग्य कचरे में फिंका हुआ खाना और कचरे में खाना ढूंढ़ते बच्चे एक साथ दिख जाते हैं! शादी-ब्याह, होटलों और घरों में बर्बाद होने वाले हजारों किलो खाने को देखकर कल्पना करना मुश्किल है कि ठीक इसी समय, इसी देश में, करोड़ों बच्चे ऐसे भी हैं जिन्हें एक समय का भी खाना नसीब नहीं। भूख से मरते बच्चे और कुपोषित मांएं किसी भी देश की सबसे दारुण तस्वीर हैं। जो देश अपने नवजात बच्चों तक की भूख तक से लड़ने में अक्षम है, वह किसी भी बड़ी चुनौती के लिए तैयार कैसे हो सकता है?

कुपोषण की वैश्विक परिभाषा के हिसाब से कुपोषण का मतलब ऐसी स्थिति से है जहां शारीरिक-मानसिक विकास के लिए जरूरी पोषक तत्त्व खाने में न मिल रहे हों। पोषक तत्वों से तात्पर्य है शरीर के विकास के लिए जरूरी प्रोटीन, कैलोरी, कार्बोहाइड्रेट्स, विटामिन और मिनरल। मोटे तौर पर कुपोषण पौष्टिक खाने की अनुपलब्धता है। यों तो हमारे देश में पौष्टिक खाना उन लोगों को भी ढंग से नहीं मिल रहा जिनके पास खाने की भरमार है। उसके कई कारण हैं। अन्न, फल, सब्जियों में भयंकर मिलावट, कीटनाश का प्रयोग, जहरीले पानी में फलों और सब्जियों का उगाया जाना आदि। यहां समस्या सिर्फ पौष्टिक खाने की नहीं है, बल्कि उससे भी ज्यादा भरपेट खाने की है। हमारे देश के जो 2.1 मिलियन बच्चे जो अपना पांचवां जन्मदिन देखने से पहले मर जाते हैं, उन्हें दो वक्त का भरपेट खाना भी नसीब नहीं होता!

भूख सूचकांक 2015 के अनुसार भारत में भूख का स्तर भयानक है। अस्सी देशों में भारत सड़सठवें नंबर पर है। दक्षिण एशिया में भारत भूख के मामले में सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पीछे छोड़ते हुए तीसरे स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पूरी दुनिया के तीस प्रतिशत कुपोषित बच्चे सिर्फ भारत में हैं। ‘भारत में बच्चे 2012’ नाम की एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत देश में हर रोज लगभग पंद्रह सौ बच्चे मर जाते हैं।

कुपोषण का मूल कारण गरीबी और बेराजगारी है, जिसके कारण कारण परिवारों के पास इतनी आमदनी ही नहीं है कि वे भरपेट खा सकें और शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्त्व ले सकें। हमारे देश में लड़कों की अपेक्षा लड़कियां कुपोषण की चपेट में अधिक हैं। भारत में कुल बच्चों में 48.9 प्रतिशत लड़कियां और 45.5 प्रतिशत लड़के कुपोषित हैं।
बच्चों में भी कुपोषित लड़कियों की संख्या ज्यादा होना महज इत्तेफाक नहीं है। हमारे यहां कुपोषण की शिकार बच्चियों, किशोरियों और स्त्रियों की संख्या ज्यादा होने की एक बड़ी वजह सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। लड़कियों के कम सामाजिक महत्त्व की सोच के कारण अक्सर ही उनके विकास की जरूरत के हिसाब से उन्हें खाने के लिए नहीं दिया जाता। गांवों में और छोटे कस्बों शहरों में आज भी लड़कियों को न सिर्फ खाने की मात्रा कम दी जाती है, बल्कि फल-सब्जी, घी-दूध जैसी ज्यादा पौषिक चीजों पर पहला हक घर के लड़कों-पुरुषों का माना जाता है।
अक्सर बड़े फख्रसे कहते हुए सुना जाता है कि हमारी मां सबको खिलाने के बाद बचा-कुचा खाती है। यह मांओं के कुपोषित जीवन की सामाजिक मान्यता है। इसी तरह से अगर खाने की कोई चीज कम मात्रा में है, तो उसे खाने का पहला स्वाभाविक हक घर के लड़कों या मर्दों का होता है। कम खाने और जल्दी खाने को लड़कियों की खासियत के तौर पर प्रचारित किया गया है।
इस तरह से एक बच्ची, बचपन से ही कम पोषक तत्त्वों वाला खाना जिसके हिस्से में आया है, बड़े होकर कुपोषित किशोरी, युवा और फिर एक कुपोषित मां बनती है। लड़कियों के शरीर में बचपन में खाने के भेदभाव से पैदा हुई जरूरी पोषक तत्त्वों की कमी आजीवन पूरी नहीं होती। हर महीने होने वाली माहवारी के कारण लड़कियों को और भी ज्यादा आयरन की जरूरत होती है। लेकिन आयरन की अतिरिक्त पूर्ति न होने के कारण आयरन की स्थायी कमी लड़कियों और मांओं की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है। भारत में सत्तावन प्रतिशत मांएं और पांच साल तक के पचहत्तर प्रतिशत बच्चे खून की कमी के शिकार हैं।

जो बच्ची आजीवन जरूरी पोषक तत्त्वों की कमी के साथ मां बनती है, वह फिर एक कुपोषित बच्चे को जन्म देती है। इस तरह से लड़कियों का कुपोषण ‘कुपोषण के कुचक्र’ को जन्म देता है। कुपोषित मांओं के बच्चे बीमारी की ज्यादा संभावना से भरे होते हैं। उनमें संक्रमण की संभावना स्वस्थ बच्चों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती है, इसी कारण मृत्यु दर भी सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चा में ही होती है। भारत में 57 प्रतिशत बच्चे सामान्य से कम वजन के पैदा होते हैं।

विकासशील देशों में सबसे ज्यादा कुपोषित मांएं भारत में हैं। भारत में मांओं का कुपोषित होना मातृत्व के महिमामंडन की पोल खोलता है! बातों में मांओं की पूजा होती है लेकिन व्यवहार में उनके लिए भरपेट खाना भी नहीं है। मांओं में कुपोषण का परिणाम सिर्फ मांओं की मृत्युदर के बढ़ने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह बच्चों के कुपोषण तक असर दिखाता है। मांओं को डेढ-दो साल तक बच्चों को अपना दूध पिलाने की सलाह दी जाती है। गांवों में मांएं शहरी मांओं की तुलना में बच्चों को ज्यादा दिनों तक दूध पिलाती भी हैं, लेकिन स्वयं मांएं इतनी ज्यादा कुपोषण की शिकार होती हैं कि उनके दूध की गुणवत्ता ही उतनी पोषक नहीं होती।

कुपोषण के नतीजों की भयानकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह लाखों बच्चों और स्त्रियों की मौत का कारण बनता है! जो बच्चे कुपोषण के बावजूद जिंदा तो हैं, लेकिन उनकी शारीरिक-मानसिक दशा इतनी बुरी होती है कि न खुद का व्यक्तिगत विकास करने की स्थिति में होते हैं, न ही समाज की तरक्की का हिस्सा बन सकते हैं। खून की कमी के कारण शरीर में जो लौहतत्त्व की कमी होती है वह अक्सर ही सुस्ती, थकान और अवसाद का कारण बनती है। लेकिन इस सबको छोटी या सामान्य की बात समझकर अक्सर ही उस पर ध्यान नहीं दिया जाता।

प्रोटीन की कम अक्सर ही शरीरिक विकास में बाधा बनती है। कैल्शियम की कम मात्रा कमजोर हड्डियों का कारण बनती है, जिससे अक्सर हड्डियों के टूटने की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है। विटामिन की कमी आंख की रोशनी को प्रभावित करती है। जरूरी पोषक तत्त्व की कमी के कारण अक्सर कम वजन के बच्चे पैदा होते हैं, जिनका न तो शारीरिक विकास सही से होता है न ही मानसिक। युवावस्था में उनकी काम करने की क्षमता भी बेहद कम होती है। किसी भी बीमारी से लड़ने की कम क्षमता और असमय मौत कुपोषित बच्चों और मांओं का जीवन भर अभिशाप है।

कुपोषण से लड़ने के लिए सरकारी स्तर पर कई प्रयास किये जा रहे हैं। बच्चों और मांओं के लिए आंगनबाड़ी, स्कूल में मिल डे मील की योजना और व्यापक टीकाकरण आदि कार्यक्रम बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य को लेकर ही चलाए जा रहे हैं। आज भारत में 133 मिलियन आंगनबाड़ी हैं। आंगनबाड़ी के द्वारा भारत पूरी दुनिया में बच्चों को जरूरी पोषक तत्त्व देने वाला सबसे बड़ा कार्यक्रम चला रहा है। लेकिन अलग-अलग स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार के कारण दुनिया का सबसे बड़ा पोषण देने वाला कार्यक्रम भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पा रहा है।

महाराष्ट्र भारत का पहला राज्य है जिसने सबसे पहले कुपोषण खत्म करने को एक मिशन के तौर पर लिया है। 2005 में यूनिसेफ की मदद से महाराष्ट्र ने प्रथम 1000 दिन की एक योजना शुरू की, जिसके तहत नवजात बच्चे से लेकर शुरू के लगभग तीन साल तक बच्चों के जरूरी पोषण पर सीधी नजर रखी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान मुंबई द्वारा 2012 में कराए गए एक सर्वे में सामने आया है कि पिछले छह-सात सालों में दो साल तक के बच्चों के कुपोषण के स्तर में बहुत गिरावट आई है। लड़कियों को बचपन से ही पोषणयुक्त खाना देकर कुपोषण के कुचक्र को तोड़ा जा सकता है। भावी मांओं को कुपोषण से बचाकर कुपोषित बच्चों की संभावना को खत्म नहीं, तो कम तो जरूर किया ही जा सकता है। 1990 के बाद से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में हुई पचास प्रतिश्त की वृद्धि के बावजूद अगर दुनिया के एक तिहाई कुपोषित बच्चे भारत में ही हैं। ऐसे में अगर विकास दर में सौ प्रतिशत भी वृद्धि हो जाती है तो उसका क्या मतलब है?

आने वाले कुछ दशकों में भारत दुनिया के उन कुछेक देशों में से होगा जहां कि सेवानिवृत्त लोगों से ज्यादा आबादी काम करने वाले युवाओं की होगी। यूनिसेफ के मुताबिक अगर भारत अपनी कुपोषण की समस्या को खत्म कर पाता है, तो उसके जीडीपी में तीन प्रतिशत की बढोतरी की संभावना है। नवजात बच्चों की भूख जिस देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर पर भारी हो, वह देश कैसे विकसित अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख सकता है? जो देश अपनी मांओं और बच्चों को दो वक्तभरपेट खिला तक नहीं सकता, उसका पहला लक्ष्य खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता होना चाहिए न कि विकसित राष्ट्र बनना। मजबूत नींव के साथ ही कोई भी चीज ज्यादा ऊंचाई तक पहुंच सकती है, फिर चाहे है वह पेड़ हो, व्यक्तित हो, या कोई देश! ०

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