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अजित राय का लेख : अब्बास किरोस्तामी का सिनेमा

मशहूर ईरानी फिल्मकार अब्बास किरोस्तामी का पिछली चार जुलाई को निधन हो गया। उन्हें ईरानी सिनेमा का सत्यजीत रे कहा जाता है। उनकी फिल्म-यात्रा को याद कर रहे हैं अजित राय।
Author नई दिल्ली | July 17, 2016 02:25 am
किरोस्तामी का सिनेमा कम से कम चीजों और वृत्तचित्र शैली में जीवन और मृत्यु के दार्शनिक सवालों की पड़ताल करता है। वे कई बार जादुई यथार्थवाद का प्रयोग करते हैं जिसके बारे में गैब्रिएल गार्सिया मारखेज का कहना है कि कला में इसकी उत्पत्ति इतालवी फिल्मकार वित्तोरियो दे सिका की फिल्म, ‘मिराकल इन मिलान’ (1950) से मानी जा सकती है।

दुनिया भर के फिल्मप्रेमियों के लिए सुप्रसिद्ध ईरानी फिल्मकार अब्बास किरोस्तामी के निधन की खबर किसी सदमे से कम नहीं है। मशहूर जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसावा का कथन याद आ रहा है, ‘जब सत्यजीत रे का निधन हुआ था तो अपना दुख व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। पर जब मैंने अब्बास किरोस्तानी की फिल्में देखीं तो ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने रे की जगह लेने के लिए किरोस्तामी को भेज दिया।’

विश्व सिनेमा में अब्बास किरोस्तामी के महत्त्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी फिल्मकार क्वेंटिम तारंतीनों, आॅस्ट्रिया के माइकल हेनेके से लेकर फ्रांस के ज्यां लुक गोदार तक उनके प्रबल प्रशंसकों में हैं। दुनिया में सिनेमा का शक्तिपीठ माना जानेवाला न्यूयार्क का म्यूजियम आॅफ माडर्न आर्ट्स (मोमा) 2007 में उनकी फिल्मों पर विशेष आयोजन कर चुका है। वे ईरान के अकेले ऐसे फिल्मकार रहे हैं, जिन्होंने ईरानी सिनेमा को दुनिया भर में प्रतिष्ठा दिलाई और कान फिल्मोत्सव में जिन्हे ‘टेस्ट आॅफ चेरी’ (1997) के लिए बेस्ट फिल्म का ‘पॉम दि ओर’ पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। वे कई बार कॉन की जूरी में रह चुके हैं। उनकी फिल्म, ‘ सर्टीफायड कॉपी’ (2010) के लिए फ्रांसीसी अभिनेत्री जुलिएट बिनोशे को कॉन में सवश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिल चुका है। माजिद मजीदी मोहसिन मखमलबॉफ आदि दूसरे ईरानी फिल्मकारों से अलग किरोस्तामी की फिल्में दुनिया भर के गंभीर सिनेमा केंद्रों और पाठयक्रम का हिस्सा चुकी हैं।

अब्बास किरोस्तामी की पहली फीचर फिल्म ‘रिपोर्ट’ (1977) एक ऐसे सरकारी मुलाजिम का पक्ष रखती है जिस पर रिश्वत लेने का आरोप है। इस प्रक्रिया में धीरे-धीरे कई ऐसी चीजें सामने आती हैं कि दर्शक अपराधी के प्रति सहानुभूति विकसित करने लगता है। उसी तरह ‘क्लोज-अप’ में एक नौजवान पर मुकद्दमा चलता है कि उसने खुद को ईरान का चर्चित फिल्मकार मोहसिन मखमलबॉफ बताकर एक अमीर परिवार के सदस्यों को फिल्म में काम देने का झांसा दिया और ठगने की कोशिश की। सत्य घटना पर आधारित इस फिल्म में किरोस्तामी उस युवक की मानसिकता और परिस्थितियों का सूक्ष्म विलेषण करते हैं और हमें उससे सहानुभूति होने लगती है।

अब्बास किरोस्तामी को जिस फिल्म ने दुनिया भर में प्रतिष्ठित किया वह है,‘व्हेअर इज द फ्रेंड्स होम’ (1987)। एक आठ साल का बच्चा गलती से अपने स्कूल के सहपाठी दोस्त की नोटबुक उठा लाता है जो पड़ोस के गांव में कहीं रहता है। अब वह अपने दोस्त के घर की तलाश में निकल पड़ता है क्योंकि अगर यह नोटबुक उसे नहीं मिली तो वह गृहकार्य नहीं कर पाएगा अगले दिन उसका दोस्त स्कूल से निकाल दिया जाएगा। इस सरल सी लगनेवाली पटकथा में किरोस्तानी ईरान की पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति का सुंदर कोलॉज बनाते हैं। हम आगे की पूरी फिल्म उस बच्चे की निगाह से देखते हैं जिसे अपने सहपाठी दोस्त के घर की तलाश है। इस फिल्म में किरोस्तामी के सिनेमा की सारी विशेषताओं के बीज देखे जा सकते हैं जो आगे चलकर सिनेमा की नई सैद्धांतिकी बने। इसे उनकी कोकोर त्रयी का पहला भाग माना जाता है।

तेहरान में 22 जून 1940 को जन्मे अब्बास किरोस्तामी ने पेरिस के एक अस्पताल में आंतों के कैंसर के कारण चार जुलाई, 2016 को 76 साल की आयु में आखिरी सांस ली। आर्थिक मजबूरी में उन्हे अपना खर्चा चलाने के लिए तरह तरह के काम करने पड़े जिसमें यातायात पुलिस का काम भी शामिल था। तेहरान विश्वविद्यालय से पेंटिंग एवं ग्राफिक डिजाइन में डिग्री लेने के बाद उन्होंने पोस्टर बनाने से लेकर फिल्मों के अंत में परदे पर आनेवाले क्रेडिट लिखने का काम भी किया। बाद में वे टेलीविजन के लिए व्यावसायिक विज्ञापन बनाते रहे। जब ईरान में दारियूस मेहरजुइस की फिल्म ‘गाव (काऊ)’ से ईरानी न्यू वेव की शुरुआत हो रही थी तो किरोस्तामी ने नौजवानों के लिए एक फिल्म निर्माण संस्था बनाई जिसके बैनर तले उनकी पहली शार्ट फिल्म ‘ब्रेड एंड आॅले’ (1970) सामने आई। उसके बाद उन्होने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। यहां तक कि 1979 की इस्लामी क्रांति के समय जब अधिकतर बड़े फिल्मकार ईरान छोड़कर निकल गए तब भी किरोस्तामी ईरान में ही जमे रहे। उनकी छोटी-बड़ी चालीस फिल्में अब विश्व सिनेमा की अनमोल धरोहर हैं जिनमें से कम से कम छह को तो महान फिल्मों की सूची में शामिल किया गया है।

किरोस्तामी का सिनेमा कम से कम चीजों और वृत्तचित्र शैली में जीवन और मृत्यु के दार्शनिक सवालों की पड़ताल करता है। वे कई बार जादुई यथार्थवाद का प्रयोग करते हैं जिसके बारे में गैब्रिएल गार्सिया मारखेज का कहना है कि कला में इसकी उत्पत्ति इतालवी फिल्मकार वित्तोरियो दे सिका की फिल्म, ‘मिराकल इन मिलान’ (1950) से मानी जा सकती है।

‘टेस्ट आॅफ चेरी’ में किरोस्तामी ने अनूठा विषय उठाया है। मिस्टर बादी आत्महत्या करने के लिए अपनी कार से तेहरान के बाहर किसी गांव में जाते हैं। उन्हें कोई ऐसा साथी चाहिए जो मरने के बाद उनकी लाश को धार्मिक तरीके से दफना दे। इसके बदले वे उसे काफी धन भी देने को तैयार हैं। पहले वे एक कुर्दिश सिपाही को नियुक्त करते हैं जो बीच रास्ते में ही कार से कूदकर भाग जाता है। फिर उन्हें एक अफगानी मिलता है पर उसे धार्मिक कारणों से ऐतराज है। तीसरा व्यक्ति इसलिए राजी हो जाता है कि उसे अपने बीमार बेटे के इलाज के लिए पैसों की जरूरत है। मिस्टर बादी खुद ही अपनी कब्र खोदकर लेट जाते हैं। तीसरा व्यक्ति वायदा करता है कि अगली सुबह अगर वे मरे पाए गए तो वह उनको दफना देगा।

रात मे तेज आंधी तूफान और गरज के साथ बारिश होने लगती है। एक लंबे ब्लैक आउट के बाद हम देखते हैं कि दीवार तोड़कर अब्बास किरोस्तामी बाहर आते हैं और उनके सहयोगी ‘टेस्ट आॅफ चेरी’ फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं। आवाजों से दृश्य बनाने में उन्हे बड़ा मजा आता था। ‘दि विंड्स विल कैरी अस’ (1999) में तेरह चौदह चरित्र कभी नहीं दिखते, केवल उनकी आवाजें सुनाई देती हैं। इसी तरह ‘माई स्वीट सीरीन’ (2008) में वे ईरान की सभी प्रमुख अभिनेत्रियों को एक सिनेमा हॉल में बिठाकर फिल्म दिखाते हैं। वह फिल्म खुशरो और सीरीन की पुरानी प्रेमकथा पर है। हमें फिल्म की केवल आवाजें और संवाद सुनाई देते हैं। परदे पर दर्शक दीर्घा में बैठी अभिनेत्रियों के क्लोज-अप शाट्स बारी बारी से उभरते हैं। ऐसा प्रयोग विश्व सिनेमा में पहली बार देखा गया।

अपनी अंतिम दो फिल्में उन्होने ईरान से बाहर जाकर बनार्इं। ‘सर्टीफायड कॉपी’ में वे इटली के सुदूर गांव में जाते हैं जहां एक फ्रांसीसी महिला (जुलिएट बिनोशे) आर्ट गैलरी चलाती हैं। उसके आमंत्रण पर एक ब्रिटिश कला समीक्षक (विलियम शीमेल) कला में नकल पर भाषण देने आता है। दोनो लगभग पति-पत्नी की तरह चौबीस घंटे साथ बिताते हैं और एक पूरा जीवन जीते हैं। किरोस्तामी का दर्शन है कि हमारी दुनिया में मौलिक या असली कुछ नहीं होता। जो भी है वह किसी न किसी की फोटोकॉपी है जिसे अपने अनुभव से हम सर्टीफाई करते है। उनकी अंतिम फिल्म ‘लाइक समवन इन लव’ (2012) जापान में एक प्रेमकथा के जरिए हमारी आधुनिक सभ्यता पर कुछ तीखे सवाल खड़े करती है।

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