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खेती-किसानी: जीएम फसलें और भारतीय खेती

भले ही शुरुआती दौर में जीएम फसलों से उत्पादकता बढ़ जाए लेकिन बाद में जीएम फसल जैव विविधता को खासा नुकसान पहुंचाएगा।
प्रतिकात्मक तस्वीर।

जीन संशोधित यानी जीएम ( जेनेटिकली माडिफाइड) फसलों का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। पिछले दिनों जीएम प्रौद्योगिकी के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी प्रभावों पर देश की सात संस्थाओं ने मिल कर व्यापक अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। यह रिपोर्ट सरकारों के लिए जीएम फसलों के सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन के दिशा-निर्देश के दस्तावेज प्रस्तुत करती है। इस रिपोर्ट के आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि केंद्र सरकार जीएम सरसों की व्यवसायिक खेती को मंजूरी दे सकती है। जीएम फसलों के पक्ष और विरोध में लोगों के अपने-अपने तर्क हैं लेकिन यह बात सही है कि दुनिया के अधिकांश देशों में जीएम प्रौद्योगिकी को लेकर संशय है। जीएम यानी कृत्रिम तरीके से बनाया गया फसल बीज। जीएम फसलों के समर्थक मानते हैं कि यह बीज साधारण बीज से कहीं अधिक उत्पादकता देता है। इससे कृषि क्षेत्र की कई समस्याएं दूर हो जाएंगी। और फसल का उत्पादन का स्तर सुधरेगा। जबकि विरोधियों का कहना है कि भले ही शुरुआती दौर में जीएम फसलों से उत्पादकता बढ़ जाए लेकिन बाद में जीएम फसल जैव विविधता को खासा नुकसान पहुंचाएगा।

कृषि में जीएम फसलों की स्वीकृति-अस्वीकृति पर बहस फरवरी 2010 में सामने आई, जब जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीइएसी) की अनुशंसा के बावजूद तत्कालीन पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन की जीएम खेती को मंजूरी देने से मना कर दिया। दरअसल, जीइएसी ने 14 अक्तूबर, 2009 को बीटी बैंगन को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करके इसकी व्यावसायिक खेती को स्वीकृति दे दी थी। लेकिन लोगों और सामाजिक संस्थाओं के भारी विरोध के कारण इसे जयराम रमेश और उनके बाद जयंती नटराजन ने भी स्वीकृति देने से मना कर दिया। विभिन्न राज्यों की सरकारों ने भी अनेक आधारों पर अपने यहां आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों की खेती को मंजूरी देने से मना कर दिया।
भारत की अकेली जीएम फसल बीटी कॉटन की खेती 2002 में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसैंटो और महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कंपनी की साझेदारी से शुरू हुई थी। एक दशक तक तो बीटी कपास की खूब अच्छी पैदावार हुई, क्योंकि जीएम फसलों की खासियत यह होती है कि अधिक उर्वर होने के साथ ही इनमें अधिक कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती और ये सूखा-रोधी और बाढ़-रोधी भी होती हैं। लेकिन कुछ सालों के बाद स्थिति बदल गई और बीटी कपास की फसलों में कीड़े लगने शुरू हो गए। महंगे बीजों, कीटनाशकों और बर्बाद हुई खेती के चलते हजारों बीटी कपास किसानों ने आत्महत्या की। 2014 में जर्मनी की गोटिंजेन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पूरे विश्व में किए गए अपने कृषि सर्वेक्षणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि जीएम प्रौद्योगिकी से फसलों की पैदावार में बाईस फीसद की बढ़त होती है, सैंतीस फीसद कम कीटनाशक डालने पड़ते हैं और किसानों की आय अड़सठ फीसद बढ़ जाती है और यह प्रौद्योगिकी विकसित देशों के मुकाबले विकासशील देशों के लिए अधिक लाभकारी है। दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र के अनुसार साल 2050 तक दुनिया की आबादी का पेट भरने के लिए आज से सत्तर फीसद ज्यादा खाद्य की जरूरत होगी। इसलिए पैदावार बढ़ाने के लिए खेती में नए प्रयोगों को महत्त्व देना होगा।

अधिकांश वैज्ञानिक जीएम खेती की तरफदारी करते हैं। लेकिन कृषि-बायोटेक्नोलॉजी कार्यदल के अध्यक्ष एमएस स्वामीनाथन ने यह भी कहा कि अगर यह प्रौद्योगिकी अपना भी ली जाए तो कृषि में जैव-विविधता बचाए रखने के लिए, इससे जुड़े विशेष क्षेत्रों को इस प्रौद्योगिकी से अलग रखा जा सकता है। हालांकि, विभिन्न राज्यों में जीएम फसलों की खेती पर कई प्रयोग चल रहे हैं, लेकिन अभी तक केवल बीटी कपास पर सरकारी स्वीकृति मिली हुई है। जबकि अमेरिका में मक्का, सोयाबीन, कपास, कनोला, चुकंदर, पपीता, आलू, कनाडा में कनोला, सोयाबीन, चुकंदर, चीन में कपास, पपीता और पॉप्लर, अर्जेटीना में सोयाबीन, मक्का, कपास, ब्राजील में सोयाबीन, मक्का, कपास और बांग्लादेश में बैंगन की जीएम खेती आधिकारिक रूप से होती है। अफ्रीका सहित कुछ दूसरे देश हैं जो केवल मक्का और कपास की जीएम खेती करते हैं। फ्रांस और जर्मनी सहित यूरोपीय संघ के उन्नीस देशों में जीएम खेती पर पूर्ण प्रतिबंध है।  यू रोपीय संघ के देशों में विदेशों से आयातित खाद्य पर भी उल्लेख जरूरी है कि यह जीएम है या गैरजीएम, जबकि अमेरिका में उल्लेख अनिवार्य नहीं है। भारत में इस प्रौद्योगिकी का विरोध करने वालों का कहना है कि हमारे देश में कृषि में इतनी जैव-विविधता है, जो जीएम प्रौद्योगिकी को अपनाने से खत्म हो जाएगी। बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एकाधिकार के कारण किसानों को महंगे बीज और कीटनाशक उनसे खरीदने पड़ते हैं। खेती में काम करने वाले बहुत से हाथ भी इसे अपनाने से बेरोजगार हो जाएंगे। जीएम खाद्य का दो तरह से इंसानों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है। एक तो उसे खाने से, दूसरा उन पशुओं के दूध और मांस के जरिए जो जीएम चारे पर पले हों। पर्यावरण पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

लेकिन अब खाद्य सुरक्षा की नजर से भारत इस पर नरम पड़ता दिख रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रौद्योगिकी को अपनाने से भारत के लगभग चौदह करोड़ किसानों को फायदा हो सकता है। फिलहाल, भारत के आठ राज्यों में चावल, मक्का, सरसों, बैंगन, काबुली चना और कपास की जीएम खेती पर परीक्षण चल रहे हैं। किसी भी प्रकार की जीएम फसलों को मंजूरी देने से पहले इन फसलों के उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षित होने, किसानों के लिए दीर्घकाल तक लाभप्रद होने और पर्यावरण के अनुकूल होने पर, किसी स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्था द्वारा व्यापक शोध और अध्ययन किए जाने की जरूरत है। किसी भी देश में जीएम फसलों की मंजूरी उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव के मूल्यांकन के बाद ही दी जा सकती है। इस लिहाज से यह रिपोर्ट खासी महत्त्वपूर्ण है। यह जहां इन फसलों के सुरक्षा संबंधी पक्ष को सामने रखती है, वहीं इनके लाभकारी पक्ष पर भी प्रकाश डालती है। बहरहाल, जीएम फसलों पर अभी तक संशय बरकरार है। इसके पक्ष और विपक्ष के अपने अपने मान्य तर्क है इसलिए इस मुद्दे पर सरकार को बिना जल्दबाजी किए हुए गंभीरता पूर्वक निर्णय लेना होगा । सरकार को जीएम सरसों की व्यवसायिक खेती की मंजूरी देने से पहले दुनिया भर के देशों में जीएम सरसों की खेती और उसके विभिन्न पक्षों-प्रभावों का भी अध्ययन करना चाहिए। १

 

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