December 08, 2016

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शिक्षा: संविधान और शिक्षा

शिक्षा से तात्पर्य विद्यालय के अंदर या बाहर मिलने वाले वे सारे अनुभव हैं जो कि व्यक्तिको किसी भी प्रकार से उसके पूरे जीवन-काल में उसे प्रभावित करते हैं।

Author November 20, 2016 01:47 am
प्रतीकात्मक तस्वीर ।

किरन मिश्र

शिक्षा से तात्पर्य विद्यालय के अंदर या बाहर मिलने वाले वे सारे अनुभव हैं जो कि व्यक्तिको किसी भी प्रकार से उसके पूरे जीवन-काल में उसे प्रभावित करते हैं। यह व्यक्तित्व के विकास की एक प्रक्रिया है जिससे चरित्र का निर्माण होता है। इस प्रकार शिक्षा समूचे जीवन चलने वाली चेतन और अचेतन दोनों प्रक्रिया है जिसे समय, स्थान या व्यक्ति की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। महात्मा गांधी के अनुसार शिक्षा से तात्पर्य बालक-बालिका के अंदर से क्षमताओं को बाहर निकाल कर उसके शरीर, आत्मा एवं मस्तिष्क का विकास करना है। आमतौर पर हम विद्यालय में बच्चों को दिए जाने वाले अनुदेशन या किसी भी तरह के ज्ञान को शिक्षा समझते हैं, लेकिन वास्तव में शिक्षा वही है, जो व्यक्तित्व का विकास करे और व्यक्ति को इस योग्य बनाए कि वह अपने चरित्र का निर्माण कुशल ढंग से कर सके और विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं को विचलित न होने दे।

शिक्षा से ही व्यक्ति न केवल अपनी आदतों और व्यवहार में परिवर्तन लाकर स्वयं को समाज में अनुकूलित करने का प्रयास करता है बल्कि विपरीत स्थितियों में भी धैर्य बनाए रख सकता है ताकि उसकी क्षमता जीवन की समस्याओं से लड़ पाने में उसकी सहायता कर सके। शिक्षा समाज में व्याप्त आधारहीन आस्थाओं, अर्थहीन परंपराओं और सैकड़ों सामाजिक कुरीतियों को दूर करती है और एक नई सोच का विकास करती है। इससे व्यावसायिक अनुभव भी व्यक्तियों को प्राप्त होते हैं, जिसका जीवन में उपयोग कर व्यक्ति अपनी आजीविका के अनेक साधन जुटाता है। शिक्षा ही व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास करती है, इसलिए हमारे संविधान में कई ऐसे प्रावधान हैं जो सभी जाति और धर्म के व्यक्तियों को समानता का अधिकार देते हैं जिससे उसका विकास उचित दिशा में हो सके। संविधान के अनुच्छेद 28 में तीन प्रकार की शिक्षण संस्थाओं का उल्लेख किया गया है-एक-वे शिक्षण संस्थाएं, जिनकी देख-रेख पूर्णतया सरकार द्वारा होती है। इन संस्थाओं में किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। हां, नैतिक शिक्षा, जिसका किसी धर्म विशेष से संबंध न हो, दी जा सकती है।

इस अनुच्छेद के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपने तौर पर किसी धार्मिक पूजा पाठ में भाग ले सकता है, लेकिन उसके लिए इसे बाध्य नहीं किया जा सकता। दो-ट्रस्ट द्वारा स्थापित क्षिक्षण संस्थाएं, जिनका प्रशासन सरकार के हाथ में होता है, इन संस्थाओं में अगर प्रबंध समिति चाहे तो धार्मिक शिक्षा प्रदान कर सकती है, लेकिन उसे हर संप्रदाय के लिए अलग धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ेगी। हिंदू बच्चों को कुरान पढ़ने के लिए या मुसलिम बच्चों को गीता पढ़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।  तीन-वे संस्थाएं, जो सरकार से केवल आर्थिक सहायता लेती हैं, लेकिन प्रशासन सरकार के हाथ में नहीं होता। इन संस्थाओं में भी बिना किसी की इच्छा के किसी भी व्यक्ति को किसी भी धार्मिक सभा में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 29 में भी कुछ इस तरह के प्रावधान हैं, जिनसे समानता और स्वतंत्रता को बल मिलता है, जैसे यह अनुच्छेद अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि एवं संस्कृति की रक्षा करने का पूरा अधिकार देता है।

इसलिए वह अपने अलग संगठन बना सकते हैं और अपनी स्वयं की धार्मिक शिक्षण संस्थाएं स्थापित कर सकते हैं। साथ ही धार्मिक और भाषायी आधार पर कार्यक्रमों का आयोजन भी कर सकते हैं। उच्चत्तम न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी है कि अल्पसंख्यक अपनी भाषा या लिपि की रक्षा के लिए आंदोलन भी चला सकते हैं। अगर उनकी भाषा या संस्कृति को किसी प्रकार का खतरा हो। संविधान के अनुच्छेद 30 (1) के तहत भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यकों को यह अधिकार दिया गया है कि वे अपनी संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए अपनी स्वयं की शिक्षा संस्था स्थापित करके उसे चला सकते हैं। संविधान का अनुच्छेद 41 कहता है कि राज्य अपनी आर्थिक क्षमता की सीमा में रहते हुए अपने नागरिकों के लिए कार्यात्मक शिक्षा और सरकारी सहायता पाने के अधिकार को सुनिश्चित करेगा। विशेष रूप से बेरोजगारी, बुढ़ापा, बीमारी या अपंगता की स्थिति में।

शिक्षा के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21, 41 और 45 को संशोधित करके अब मौलिक अधिकारों में शामिल कर दिया गया है। नए कानूनों के मुताबिक आरक्षण की सुविधाओं के अलावा भारत के कई राज्यों में निशुल्क पुस्तकें, कापियां, बैग, यूनिफार्म आदि प्रदान किए जा रहे हैं। स्नातक तक अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों को शिक्षा के लिए कोई फीस नहीं देनी होती है और व्यावसायिक शिक्षा के लिए अगर वे कुछ शुल्क फीस के रूप में चुकाते भी हैं तो उन्हें बाद में छात्रवृत्ति के रूप में वापस कर दी जाती है। यह सुविधा निजी कॉलेजों में भी प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध है। अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों के लिए 2002-2003 में डॉ आंबेडकर राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना प्रारम्भ की गई थी।

इसका मकसद राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित करके इस वर्ग से प्रतिभाशाली बच्चों का पता लगाना और उन्हें उच्च शिक्षा और अनुसंधान के लिए आर्थिक सहायता देना था। सर्वशिक्षा अभियान भारत सरकार ने 2000-2001 में आरंभ की थी, जिसका मकसद था कि चौदह साल तक के सभी बच्चों को निशुल्क और मुफ्त शिक्षा देना, ताकि देश का कोई भी बच्चा अशिक्षित न रहे। इसका मकसद 2010 तक सबको शिक्षित करना था, पर अभी तक इसे पूरा नहीं किया जा सका है।1986 में शिक्षा नीति के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति के बालकों की शिक्षा के लिए सतत सूक्ष्म नियोजन, पर्यवेक्षण, प्रशिक्षित अध्यापक आदि पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई थी।

इसमें विकलांग बच्चों की शिक्षा के लिए भी कई तरह के कदम उठाए जाने थे। लेकिन, हम देख सकते हैं कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के कारण शिक्षा के उस स्तर पर नहीं पहुंच पाए हैं, जिस पर आज भारत को होना चाहिए। हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अंधेरे और अशिक्षा में जी रहा है, जो पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। इस दिशा में परिवर्तन की संभावना तभी बनेगी जब शिक्षा के प्रसार के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलेगा और प्रत्येक नागरिक इसे अपना राष्ट्रीय दायित्व मानेगा; फिलहाल तो यह एक सुंदर सपना ही है।

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First Published on November 20, 2016 1:46 am

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