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मुद्दा : भ्रष्टाचार का घुन

भारत के ‘करप्शन परसेप्शन इंडेक्स’ यानी सीपीआई स्कोर में 2014 के मुकाबले सुधार नहीं आया है। तब भी भारत की सीपीआई 38 थी और नई सरकार के आने के बाद भी 38 ही है।
Author नई दिल्ली | February 13, 2016 20:16 pm
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक पिछले साल भारत में काम कराने के लिए 54 फीसद लोगों को रिश्वत देनी पड़ी।

विजन कुमार पांडेय

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने भ्रष्टाचार के मामलों में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि अगर सरकार भ्रष्टाचार को रोकने में नाकाम रहती है तो नागरिकों को कर का भुगतान नहीं करना चाहिए। इसके पहले 1920 में महात्मा गांधी ने तत्कालीन औपनिवेशिक शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाया था, तब इसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई जागृति प्रदान की थी। आज 96 साल बाद भ्रष्टाचार से व्यथित अदालत ने एक बार फिर असहयोग आंदोलन करने की वकालत की है। अदालत ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लोगों से एकजुट होकर इसके विरुद्ध अपनी आवाज उठाने को कहा है। भ्रष्टाचार को रोकने में सरकारें नाकाम साबित हो रही हैं। इसको लेकर एक सर्वमान्य सोच यही है कि नगर निगम में रिश्वत दिए बगैर कोई मकान बनाने की अनुमति नहीं मिलती तो जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भी प्रभाव या पैसे का सहारा लेना पड़ता है। पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए भी आम लोगों को अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। अस्पताल, शिक्षण संस्थाएं, न्यायपालिका और अब तो सेना भी भ्रष्टाचार की जद में है। ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ के मुताबिक भारत में भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आई है। भारत के ‘करप्शन परसेप्शन इंडेक्स’ यानी सीपीआई स्कोर में 2014 के मुकाबले सुधार नहीं आया है। तब भी भारत की सीपीआई 38 थी और नई सरकार के आने के बाद भी 38 ही है।

भारत का एक बड़ा वर्ग चाहे वह राजनीति से जुड़ा हो या न्यायपालिका, चिकित्सा या समाजसेवा, पुलिस या पत्रकारिता से या फिर आम जनता ही क्यों न हो, सभी भ्रष्टाचार से परेशान हैं। जनता की इस परेशानी के बावजूद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सरकारें बहुमत को नजरअंदाज कर रही हैं। ऐसे में सवाल यही उठता है, सरकार के खिलाफ असहयोग आन्दोलन क्यों न चलाया जाए? वैसे तो भ्रष्टाचार ने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। भारत में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार ऊपर के स्तर पर दीखता है। जनता भ्रष्टाचार से जूझ रही है और भ्रष्टाचारी मजे कर रहे हैं। पंचायतों से लेकर संसद तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सरकारी दफ्तरों के चपरासी से लेकर आला अधिकारी तक बिना रिश्वत के सीधे मुंह बात तक नहीं करते। संसद के अंदर भ्रष्टाचार को लेकर हो-हल्ला खूब मचता है। जनता भी धरने-प्रदर्शन कर अपने गुस्से का इजहार करती है। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर भी तमाम दावे किए जाते हैं। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ही रहता है।

हमारा देश भ्रष्टाचार के मामले में भी लगातर ‘विकास’ कर रहा है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक पिछले साल भारत में काम कराने के लिए 54 फीसद लोगों को रिश्वत देनी पड़ी। देश में पिछले सालों में आदर्श हाउसिंग घोटाला, राष्ट्रमंडल खेलों में धांधली, 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले ने भ्रष्टाचार की पोल खोल कर रख दी। जब ऊपरी स्तर पर यह हाल है तो जमीनी स्तर पर क्या होता होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। विभिन्न संगठनों के संघर्ष के बाद भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए 12 अक्तूबर 2005 को देश भर में सूचना का अधिकार कानून भी लागू किया गया था। इसके बावजूद रिश्वतखोरी कम नहीं हुई।

भ्रष्टाचारी गरीबों, बुजुर्गों और विकलांगों तक से रिश्वत मांगने से बाज नहीं आते। वृद्धावस्था पेंशन के मामले में भी भ्रष्ट अधिकारी रिश्वत लेते हैं। सत्ता में आने से पहले से ही काले धन को जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा मुद्दा बनाया उससे जरूर इस धारणा को बल मिला कि नई सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी। लेकिन डेढ़ साल के बाद भी हालत क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। सरकार बनते ही उन्होंने न्यायालयों से भ्रष्ट नेताओं पर चल रहे मामलों की फास्ट ट्रैक सुनवाई करने की अपील भी की थी। लेकिन दूसरी ओर उन्हें इस पर भी गौर करना चाहिए कि वर्तमान मंत्रिमंडल में तमाम आपराधिक मामलों में आरोपित लोगों की तादाद पुरानी कांग्रेस सरकार के दागी मंत्रियों से करीब दोगुनी है। सर्वविदित है कि भारत में नौकरशाही का मौजूदा स्वरूप ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की देन है। इसके कारण यह वर्ग आज भी अपने को आम भारतीयों से ऊपर, उनका शासक और स्वामी समझता है। अपने अधिकारों और सुविधाओं के लिए यह वर्ग जितना सचेष्ट है, उतना ही आम जनता के हितों, जरूरतों और अपेक्षाओं के प्रति उदासीन है। भारत जब गुलाम था, तब महात्मा गांधी ने विश्वास जताया था कि आजादी के बाद अपना राज यानी स्वराज्य होगा, लेकिन आज जो हालत है, उसे देख कर तो यही लगता कि अपना राज है कहां? हमारे चारों तरफ अफसरशाही का राज है। लोकतंत्र की छाती पर सवार यह अफसरशाही हमारे सपनों को चूर-चूर कर रही है। आम जनता लाचार सब देख रही है।

जब देश आजाद नहीं था तो उस दौरान नौकरशाही का मुख्य मकसद भारत में ब्रिटिश हुकूमत को अक्षुण्ण रखना और उसे मजबूत करना था। जनता के हित, उसकी जरूरतें और उसकी अपेक्षाएं दूर-दूर तक उनके दिमाग में नहीं थीं। नौकरशाही के शीर्ष स्तर पर इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी थे, जो अंग्रेज अफसर होते थे। भारतीय उनके मातहत सरकारी सेवा में भर्ती किए जाते थे, जिन्हें हर हाल में अपने वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारियों के आदेशों का पालन करना होता था। लॉर्ड मैकाले द्वारा तैयार किए गए शिक्षा के मॉडल का उद्देश्य ही अंग्रेजों की हुकूमत को भारत में मजबूत करने और उसे चलाने के लिए ऐसे भारतीय बाबू तैयार करना था, जो खुद अपने देशवासियों का ही शोषण करके ब्रिटेन के हितों का पोषण कर सकें। आजादी के बाद भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण बदलाव हुए। लेकिन एक बात जो नहीं बदली, वह थी नौकरशाही की विरासत और उसका चरित्र। कड़े आंतरिक अनुशासन और असंदिग्ध स्वामीभक्ति से युक्त सर्वाधिक प्रतिभाशाली व्यक्तियों का संगठित तंत्र होने के कारण राजनेताओं ने औपनिवेशिक प्रशासनिक मॉडल को आजादी के बाद भी जारी रखने का निर्णय लिया।

इस बार अनुशासन के मानदंड को नौकरशाही का मूल आधार बनाया गया। यही वजह रही कि स्वतंत्र भारत में भले ही भारतीय सिविल सर्विस का नाम बदलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा कर दिया गया और प्रशासनिक अधिकारियों को लोक सेवक कहा जाने लगा, लेकिन अपने चाल, चरित्र और स्वभाव में यह सेवा पहले की भांति ही बनी रही। इन्हें आज भी स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया कहा जाता है। नौकरशाह का मतलब अब एक तना हुआ मनुष्य हो गया है। जिसको अनेक अधिकारप्राप्त हैं। हमारे ही लोगों ने इन्हें ताकतवर बना दिया है। जिसके कारण वे गुरूर में रहते हैं। वे ऐसा करने का साहस इसलिए करते हैं कि उनके पास अधिकार हैं। इन्होंने ही देश में भ्रष्टाचार का घुन लगा दिया। अगर हम अभी भी न चेते तो यह देश को पूरी तरह खोखला कर देगें।

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