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बाल कहानी- माफ करना जैसमिन

बीती शाम से ही बारिश हो रही थी। बच्चे किसी तरह स्कूल पहुंचे। काश, आज पढ़ाई न होती।
Author September 10, 2017 02:27 am
अब हरजीत की बारी थी। वह अपनी पगड़ी ठीक करते हुए उठा- ‘मैम। मुझे तो मेरी नानी सबसे अच्छी लगती है।

मनोहर चमोली ‘मनु’

बीती शाम से ही बारिश हो रही थी। बच्चे किसी तरह स्कूल पहुंचे। काश, आज पढ़ाई न होती। अधिकतर बच्चे यही सोच रहे थे। तभी कक्षा में नमिता मैम आ गर्इं। वह बोलीं- ‘चलो आज पढ़ाई की जगह बातें करेंगे। बातें यानी गपशप।’ बच्चे खुशी से झूम उठे। ‘यस मैम, प्लीज! आज ठंड भी बहुत है।’ कई बच्चे एक साथ बोल पड़े। नमिता ने मुस्कराते हुए कहा- ‘तो आज सब अपने घर के बारे में बताएंगे। उदाहरण मैं देती हूं। मुझे मेरी दादी सबसे प्यारी लगती हैं। वे मुझे सुबह जगा देती हैं। अगर मैं कहीं कुछ रख कर भूल जाती हूं तो वे बता देती हैं कि वह चीज कहां रखी होगी। अब एक-एक कर के सब बताएंगे।’
सबसे पहले टीना खड़ी हो गई- ‘मैम, मुझे मेरा भैया सबसे अच्छा लगता है। वह मेरा कहना मानता है। मैं उसके हिस्से की चीज खा लेती हूं, तो वह रोता भी नहीं।’ सब हंस पड़े। कुछ ने तालियां भी बजार्इं। अनवर ने बताया- ‘मेरी अम्मी बहुत प्यारी हैं। पता नहीं, उन्हें कैसे पता चल जाता है कि मेरा मूड खराब है। मेरी हर इच्छा के बारे में अम्मी को पता होता है।’

अब हरजीत की बारी थी। वह अपनी पगड़ी ठीक करते हुए उठा- ‘मैम। मुझे तो मेरी नानी सबसे अच्छी लगती है। वह हमारे साथ ही रहती है। रोज नई-नई कहानियां सुनाती हैं।’ शीराजा बोली- ‘मेरी दीदी बहुत अच्छी है। वह तो कभी-कभी मेरा होमवर्क भी कर देती है।’ सब खिलखिलाकर हंसने लगे। बातचीत आगे बढ़ती चली गई। एक-एक कर सब अपने घर के सदस्यों के बारे में बता रहे थे। जैसमिन खड़ी हुई ओर धीरे से बोली- ‘मेरे अब्बू सबसे प्यारे हैं। वह अक्सर अपने चमचमाते ट्रक को लेकर दूर-दूर तक जाते हैं। मेरे लिए नई-नई कहानियों की किताबें लाते हैं।’ तभी नवराज बोल पड़ा- ‘मैम, ये झूठ बोल रही है। इसके अब्बू रद्दी से किताबें लाते हैं। वह नई कैसे हो गई?’ अपने होंठों पर उंगली रखते हुए जैसमिन ने पलट कर जवाब दिया- ‘तू चुप कर। मेरे लिए वे किताबें नई होती हैं। तू भी तो किताबें मांगने के लिए मेरे घर आ जाता है। बड़ा आया।’ जैसमिन ने पलट कर जवाब दिया। नवराज भी खड़ा हो गया- ‘ऐ। तुम्हारा घर कहां से आया? तुम तो किराए के मकान में रहते हो।’ जैसमिन चुप नहीं हुई। वह हाथ नचाते हुए बोली- ‘तो? घर घर होता है। मैं उस घर में रहती हूं। उसमें वह सब कुछ है, जो एक घर में होता है। समझे।’ नवराज सकपका गया। फिर सोचते हुए बोला- ‘तेरे अब्बू का कोई ट्रक नहीं है। वे तो केवल ड्राइवर हैं। पहले वे खान अंकल का ट्रक चलाते थे। फिर मलहोत्रा सर का। अब अग्रवाल सर का ट्रक चलाते हैं। मुझे सब पता है।’ जैसमिन बोली- ‘तो क्या हुआ? ट्रक तो मेरे अब्बू ही चलाते हैं न। इस स्कूल में हम पढ़ते हैं तो यह स्कूल हमारा हुआ। हुआ कि नहीं? बोल?’

नवराज इधर-उधर देखने लगा। कोई भी उसकी ओर से नहीं बोल रहा था- ‘चल-चल रहने दे। वैसे भी वो ट्रक खटारा है।’जैसमिन ने पलट कर पूछा- ‘खटारा कैसे हुआ? नया ट्रक जो काम करता है, वह हमारा ट्रक भी करता है। सामान ढोता है। समझे।’ नवराज ने कहा-‘समझा। लेकिन तू यह भी तो बता न कि उस ट्रक को रोजाना पानी से साफ करना पड़ता है। धूल-धक्कड़ से भरे उस ट्रक को साफ करने की ड्यूटी तेरी है। तेरे अब्बू तो अनपढ़ हैं। तू ही हर रोज शीशे पर सात सौ छियासी लिखती है, तब जाकर तेरे अब्बू ट्रक स्टार्ट करते हैं।’ जैसमिन का गला भर आया। बोली- ‘तो? मैं तेरी तरह सात बजे नहीं उठती। समझे।’ क्लास में सन्नाटा छा गया। जैसमिन और नवराज की नोक-झोंक अचानक गंभीर हो गई। नमिता जैसमिन के पास जा पहुंची। उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोली- ‘चुप हो जाओ। रोते नहीं। नवराज तुम्हारा सहपाठी है। पड़ोसी भी है। तुम दोनों अच्छे दोस्त भी तो हो। हो न?’  जैसमिन सिसकते हुए बोली- ‘मैम। हर किसी के पास अपना मकान होता है क्या? हर ड्राइवर के पास अपना ट्रक कहां होता है?’ नमिता बोली-‘नहीं जैसमिन। मैं भी किराए के मकान में रहती हूं। सैकड़ों हैं, जो गाड़ियां चलाते हैं, लेकिन वे उनकी नहीं होतीं। हजारों हैं, जिनके पास गाड़ियां तो हैं, लेकिन वे गाड़ी चलाना नहीं जानते। अब देखो न। इस स्कूल में आप सब पढ़ने आते हो। एक दिन इस स्कूल से चले भी जाओगे। मैं इस स्कूल में पढ़ाती हूं। हो सकता है कि कल किसी दूसरे स्कूल में जाकर पढ़ाऊंगी। लेकिन जब तक यहां हैं तो यह स्कूल मेरा भी है।’

कुलबिंदर खड़ा हो गया। वह जैसमिन की ओर देखते हुए बोला- ‘लेकिन मैम। नवराज को ऐसा नहीं कहना चाहिए था।’ नयना भी खड़ी हो गई- ‘बातें करने का मतलब यह तो नहीं कि कोई कुछ भी कहता रहे। नवराज को सॉरी बोलना चाहिए।’ सब नवराज को देख रहे थे। नमिता ने कहा- ‘हंसी-ठिठोली किसे अच्छी नहीं लगती। लेकिन हमें ऐसी कोई बात दूसरे के लिए नहीं कहनी चाहिए, जो कोई हमें कहे तो हमें बुरी लगे। नवराज को अपनी गलती का अहसास हो गया है। वैसे भी आप सभी स्कूल आकर अपनी चेयर और बैंच साफ करते हो न? मैं भी करती हूं। इसी तरह हम अपनी चीजों की साफ-सफाई करते हैं। साफ-सफाई करना नेक काम है। रही बात जैसमिन के पापा की, तो वे मेहनत करते हैं। मैं उनके लिए तालियां बजाना चाहूंगी।’ नमिता को तालियां बजाते देख कक्षा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। जैसमिन ने नवराज की ओर देखा। नवराज भी तालियां बजा रहा था। नमिता की बातें औरों की तरह शायद जैसमिन भी नहीं समझ पाई। लेकिन वह जान चुकी थी कि नवराज ने जो कुछ कहा, उसे उसका पछतावा है।
नमिता ने जैसमिन को इशारे से बुलाया। अपने पर्स से दो चॉकलेट निकाले और जैसमिन की हथेली पर रख दिए। जैसमिन ने एक चाकलेट नवराज को दे दिया। नवराज जैसमिन से बोला- ‘सॉरी जैसमिन। मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था।’

 

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