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मठ में बारिश का संगीत

जिंकवांसा बौद्ध मठ दक्षिण कोरिया का पहला ऐतिहासिक मठ है, जहां सिर्फ बौद्ध भिक्षुणियां रहती हैं।
Author नई दिल्ली | April 3, 2016 00:25 am
दक्षिण कोरिया का जिंकवांसा बौद्ध मठ

जिंकवांसा बौद्ध मठ दक्षिण कोरिया का पहला ऐतिहासिक मठ है, जहां सिर्फ बौद्ध भिक्षुणियां रहती हैं। अब तक पुरुष लामाओं को बहुत बार देखा था, लेकिन भिक्षुणियों को देखने का अवसर पहला था। संगाकासन पहाड़ियों और घने जंगल से घिरे मठ में जब हम पहुंचे तो अचानक बारिश शुरू हो चुकी थी। छप-छप करते तेज हवा के झोंकों से जूझते हुए शरारती बूंदों से बचते हुए हम ध्यान-कक्ष के अंदर घुसे ही थे कि अंदर मौजूद अति सुंदर युवा बौद्ध भिक्षुणी ने हमें शांत रहने का संकेत किया। बारिश में ही बाहर हमें कुछ दिखाना और सुनवाना चाहती थीं वह। बौद्ध मठ का परिसर भी और शायद कुछ और भी। बाहर से आती हुई कुछ तेज आवाजें। ‘दिन की बारिश कितनी उजली होती है।’ बौद्ध भिक्षुणी ने कहा।

‘शांत रहिए…आपको कुछ आवाजें सुनाई दे रही हैं। कोई आहट…कोई संगीत…आप इन आवाजों को सुनने की कोशिश कीजिए।’ वह हमें लेकर बाहर आ गई। झमाझम बारिश, तेज पहाड़ी हवाएं और बेकाबू काली छतरियां। वे टीले के पास रुकीं। ‘ये देखिए…’ हमने खाई में झांका। ज्यादा गहरी नहीं थी। खाई से निगाह फिर पहाड़ की तरह उठी। झरना गिर रहा था खाई में। जैसे कहीं बांध टूटा हो। बेचैन पानी का प्रवाह चट्टानों से उलझता, घुमड़ता हुआ बहे जा रहा था। टटके झरने की तरह वहां का दृश्य था। हर झरने का अपना संगीत होता है। अगर सुनने वाला कोई मुरीद हो। वह हमें झरने की तरफ उंगली करके बता रही थीं..

‘यह बसंत की आहट है। चारो तरफ हमें यह आहट सुनाई दे रही है। ‘साउंड ऑफ स्प्रिंग’ आपको सुनाई दे रहा है। सुनने की कोशिश कीजिए। वसंत आ गया हमारे देश में। इस मौसम में कई सालों से बारिश नहीं हुई। आज बारिश हो रही है और हम सब चकित हैं। जानते हैं क्यों, क्योंकि आप लोग आए हैं। पवित्र आत्माएं हमारे मठ में आई हैं, आपके आने का करिश्मा है कि दो साल से सूखा झरना अचानक फूट पड़ा। चमत्कार है, आप लोग बारिश लेकर आए। किसी के आने पर बारिश का होना शुभ लक्षण माना जाता है। इससे शुभ क्या होगा कि बसंत की आहट हम सुन रहे हैं। झरने फूट पड़े। बारिश देख कर मेंढक भी उचक-उचक कर देखने लगे हैं कि यह अचानक क्या हुआ है। पहाड़ों पर जमी हुई बर्फ पिघल गई है, उसका पानी हमारे लिए आया है। आइए, आपका इस मठ में स्वागत है।’

वह काली छतरी लिए अपनी बांहे फैला-फैला कर बसंत का स्वागत कर रही थी। चेहरे पर वैसी आभा जैसे खुशबुओं के जंगल में आ पहुंचे हों। जोर से लंबी सांसें लेकर वे अपनी संयमित खुशी जाहिर कर रही थीं। झरने के ठीक ऊपर एक पहाड़ी का शिखर दिख रहा था। उन्होंने हम सबको इशारे से बुलाया।
‘आप उस शिखर को देखो, जिसने भी इस शिखर को देखा वह जीवन में कभी विफल नहीं हुआ। गौर से देखिए…धुंध भी साफ है। कई बार दिखाई नहीं देता। आज दिख रहा है।’
हम सब जहां तहां बिखरे थे, पर शिखर को देखने के लिए सब उस बिंदु पर पहुंच गए थे। शिखर चमक रहा था। किसी तपस्वी-सा समाधिस्थ शिखर हमें भीतर सफलता का स्थायी भरोसा रोप रहा था। बारिश कई बार बहुत धुली हुई होती है, उजाले से भरी हुई। वह बारिश भी कुछ ऐसी ही थी।

वह बौद्ध भिक्षुणी हमें बारिश में ही पूरा परिसर दिखाना चाहती थी। कितने-कितने रोमांच एक साथ हो सकते हैं, अकल्पनीय सोच हो सकती है। बारिश, बौद्ध भिक्षुणी और सैकड़ों साल पुराना बौद्ध मठ जो बाहर से लगता है कहीं पहाड़ों पर जंगलों के बीच गुमशुदा हो, और बारिश से धुले किसी चमकदार दिन में चलते चलते अचानक मिल गया हो। घने अंधियारे जंगल में पर्वतों के भीतर से उजाला फैल रहा हो। ऊंची पहाड़ियों और दूधिया झरनों के बीच छिपे हुए छोटे छोटे पगोडे सहज औत्सुक्य पैदा करते हैं पर्यटकों में। बरसते पानी के बीच परिसर में घूमते हुए बौद्ध भिक्षुणी इतिहास के सुरंग में धीरे धीरे पैठ रही थी-‘1011 में जिंकवांसा बौद्ध मठ की स्थापना हुई। बौद्ध भिक्षु जिंकवांसा ने गोरयो राजवंश (918-1392) के उत्तराधिकारी की रक्षा की थी। राजघराने में सत्ता संघर्ष के दौरान दुश्मनों ने बारह वर्षीय राजकुमार को महल से बाहर अधमरा करके फेंक दिया था। बौद्ध भिक्षु जिंकवांसा ने उन्हें इस हालत में देखा और उन्हें अपने संरक्षण में ले लिया। न सिर्फ उनकी जान बचाई बल्कि सत्ता वापस मिलने तक उनके साथ खड़े रहे। सत्ता वापस मिलते ही उस वंश के 8वें राजा हायेन जोंग ने बौद्ध भिक्षु के नाम पर इस मठ की स्थापना की। जापान का उपनिवेश कोरिया जब स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था तब इस मठ ने भी बहुत सकारात्मक भूमिकाएं निभार्इं। जापानियों ने मठ के कुछ हिस्से जला दिए जिनका बाद में पुनर्निमाण हुआ। धरोहर सहेज कर रखी गई। लड़ाई के वक्त मठ में पुरुष भिक्षुक भी रहते थे। बाद में यह मठ महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया गया। महिलाएं हैं तो संस्कृति को बचाना आसान। तब से आज तक यह मठ धार्मिक से ज्यादा कोरिया की प्राचीन संस्कृति का वाहक बना हुआ है। प्राचीन मठ को कोरिया के पर्यटन से जोड़ दिया गया है ताकि धर्म के जो सांस्कृतिक पक्ष हैं उनके बारे में दुनियाभर से आए पर्यटकों के साथ-साथ अपने देश की धर्मविमुख नई पीढ़ी को बताया जा सके। एक बड़ी आबादी के जड़ों से कट जाने का भय कोरिया के मानस में होगा कहीं न कहीं। अक्सर सभ्यता के आतंक को संस्कृतियां ही खोलती हैं।’

बता दें कि दक्षिण कोरिया की 40 प्रतिशत आबादी धर्मविहीन है। वे किसी धर्म से जुड़े उत्सवों में शामिल नहीं होते। वहां मिले संकेतों के अनुसार यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह संख्या बौद्धों से लगभग दोगुनी है। 2005 की गणना के अनुसार दक्षिण कोरिया में बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्या मात्र 22.8 प्रतिशत है। इसमें ज्यादातर युवा हैं जो खुद को ‘कन्फ्यूजनिस्ट’ मानते हैं। हाल के वर्षों में कोरिया में जहां आर्थिक विकास की गति बढ़ी है वहीं एक बड़ा वर्ग धर्मविमुख हुआ है। उनका एक ही नारा है- नो रिलीजन। लाइफ विदाउट रिलीजन। वे कोई पर्व त्योहार नहीं मनाते। परंपरा या इतिहास का बोझ नहीं उनके ऊपर। अन्य पूंजीवादी देशों की युवा पीढ़ी की तरह अपने गंगनम डांस पर थिरकना और मौज में रहना चाहती है।

बौद्ध मठ में सबके लिए कौतूहल की चीजें थीं। एक ही परिवार में कई धर्मों के लोग रह सकते हैं। वह स्पष्ट कहती हैं-‘यहां धर्म बदलने की कोई अवधारणा नहीं है। एक बार आपने धर्म बदल लिया, रजिस्टर हो गए तो फिर वापसी संभव नहीं। धर्म नहीं बदलेगा। शादी के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं। शादी चाहे आप किसी धर्म में करें।

वैसे कोरिया में अन्य बौद्ध मठों को भी पर्यटन से जोड़ दिया गया है, जिनकी आय का माध्यम वही है। यह नई बात है जो विदेशी पर्यटको को बहुत लुभाता है। इसी पैसे से मठ का खर्च चलता है। कोई भी पर्यटक यहां दो दिन से ज्यादा नहीं रुक सकता। कम समय में ही उन्हें विलक्षण अनूभूति करा दी जाती है। हमें मठ के कपड़े पहना दिए गए और सबको ध्यान-कक्ष में फर्श पर बिठा दिया गया। बहुत ठंड़ी पहाड़ी पर बने इस हॉल का फर्श हल्का गर्म था। सामने भिक्षुणी सन्यू बैठीं। सन्यू सबको ध्यान में ले जाने से पहले अपनी करुण कहानी सुनाई और इस कहानी के जरिए उनका संदेश आसानी से लोगों तक पहुंच गया। ध्यान कक्ष में बुद्ध की पीली बड़ी-सी मूर्ति दीवार में जड़ी है जहां मोमबत्ती जल रही है। दोपहर का समय है। दोपहर के भोजन से ठीक पहले। पहले ध्यान सत्र फिर भोजन सत्र और शाम को चाय-उत्सव।

सन्यू उस शांत कक्ष में अपना जीवन खोल रही हैं, जैसे करुणा की कोई धारा सबको छूती हुई जा रही हो-सन्यू दो बहने थीं। खूब पढ़ी लिखी, अच्छी नौकरी कर रही थीं। माता-पिता के साथ जिदगी बहुत खुशहाल थी। अचानक जिंदगी में भूचाल आ गया। दोनों बहने भयानक रूप से बीमार पड़ीं। सन्यू तो बच गर्इं लेकिन उनकी बहन नहीं बच पाई। उनके माता-पिता के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था। सन्यू भी बीमारी के बाद खुद को बहुत कमजोर महसूस कर रही थीं। वह देख रही थीं कि उनके माता-पिता रात-दिन इसी भय में बिता रहे हैं कि कहीं दूसरी बेटी को कुछ न हो जाए। वे रात-दिन इन्हें देख कर रोते। उन्हें रोता देख कर सन्यू को डर लगने लगा अपनी जिंदगी से। वह भी हर दिन इसी डर में जीतीं कि शायद आने वाला कल वे न देख पाएं। उनके मन में खयाल आया कि कब तक वे भय के साए में जीती रहेंगी। वह ऐसी जिंदगी की चाहत रखने लगीं जो डराए नहीं। ऐसी चीज की तलाश थी जो उन्हें इस डर से मुक्ति दिला सके। उन्होंने अपने माता-पिता से स्पष्ट कह दिया कि वह इस तरह उन्हें और खुद को डर-डर कर जीते नहीं देख सकतीं। आप मुझे खुद से अलग मान लें। मैं इस तरह नहीं जीना चाहती। और सन्यू ने घर छोड़ दिया।

वह म्यांमा चली गर्इं। वहां वे बौद्ध धर्म के संपर्क में आर्इं जिसने उन्हें जीना सिखाया। उनके भीतर का भय निकाल फेंका। सारे माया-मोह से वे मुक्त हो गर्इं। अब वह बाहरी दुनिया से नाता नहीं रखतीं। बाहर के नाम पर सिर्फ शोध करने विश्वविद्यालय जाती हैं, दाएं-बाएं कहीं नहीं देखती। कभी-कभार माता-पितां उनसे मिलने मठ ही आ जाते हैं। सन्यू भिक्षुणियों की पोशाक पहनती हैं। सिर मुंडाए हुए। कोई साज-सज्जा नहीं। उसे कभी अपने लंबे, काले घने बालों से बहुत प्यार था। बौद्ध मठ में दीक्षा लेते समय जब उनके बाल काटे जा रहे थे तब उनकी मनोदशा अनिर्वचनीय थी। सिर मुंडवाना किसी भी स्त्री के लिए दुस्वप्न की तरह होता है।
सन्यू ने ठहरी हुई आवाज में बताया, ‘बौद्ध भिक्षुओं को सबसे पहले उस चीज से दूर होना चाहिए जिससे वे बहुत आसक्त हों, हम लड़कियां अपनी सुंदरता से बहुत आक्रांत होती हैं। सबसे पहली दूरी मैंने उसी से बनाई, बाल कटा के। जैसे-जैसे मेरे बाल कट रहे थे, एक-एक बाल पर मैं रोती रही…जब सारे बाल कट गए तो मैंने आईना देखा और तब से आज तक मैंने आईना नहीं देखा।’

दक्षिण कोरिया सौंदर्य सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, वहां खपत भी सबसे ज्यादा है, हर कदम पर ब्यूटी-शॉप हैं, जहां लड़कियों पर सुंदर बने रहने दिखने का घोर दबाव है। वहां प्लास्टिक सर्जरी सबसे ज्यादा होती है। उस देश में सुंदरता से पीछा छुड़ा कर बौद्ध भिक्षुणी बन जाना घोर आश्चर्य से कम नहीं।

सन्यू की करुणा, तकलीफ उस गर्म फर्श वाले हॉल में पिघल कर बह रही थी। सन्यू शांतचित्त सब कुछ सुना रही थीं। स्थितप्रज्ञ की अवस्था यकीनन ऐसी ही होती है जब आप अपने सुख-दुख से परे उठ जाते हैं।
उन्होंने अपनी कथा का सार बताया, ‘वैभव हमें खींचता है, पर हम उससे खुद को दूर रखते हैं। पिज्जा और चिकन बहुत स्वादिष्ट होता है पर हम उसे नहीं खा सकते।’

ऐसा लगा इनके मन में कहीं कोई दुविधा तो नहीं। सांसारिक चीजों से नाता तोड़ लेना इतना आसान भी कहां। सन्यू को जब हमारे समूह की नेता ने नांरगी रंग का स्टॉल गिफ्ट किया तो वह आह्लॉद से भर उठीं। ‘ये रंग मुझे बहुत पसंद हैं, पर मैं यह रंग नहीं पहन सकती। हमें साल में दो कपड़े मिलते हैं, फीके रंग के, हम उन्हें ही धारण कर सकते हैं…’
बौद्ध भिक्षुणियों का वेश दक्षिण कोरिया की राजसी पोशाक जैसी होती है। इतिहास के अनुसार राजा ने ही बौद्ध भिक्षुओं को सम्मान स्वरुप वह पोशाक दी और पहनने की गुजारिश की। भिक्षुणी बनने के बाद इसी पोशाक में रहना है उन्हें। रंग जीवन से कब के चले गए। सन्यू उपहार वापस नहीं करतीं। हमारा मान रखते हुए रख लेती हैं। पर उनकी कशमकश की झलक तो दिखती ही है। सांसारिक चीजों से भागना है पर सांसारिक चीजें तो पयर्टक के रूप में चल-चल कर वहां पहुंच रही है रोज-रोज। सन्यू ही सबसे ज्यादा पर्यटको के संपर्क में हंै। इस मठ की प्रधान भिक्षणी ‘काई हो’ कभी कभार पयर्टको को शुभकामनाएं देने आ जाती हैं। वे हमारे समूह से मिलीं और जी खोल कर भारत के बारे में बातें की। भारत को लेकर बौद्ध भिक्षुणियों के मन में सहज आकर्षण है। भारत का बौद्ध तीर्थ गया और वैशाली यात्रा उनके सपनो में शुमार है।

इस मठ में लगभग डेढ़ सौ भिक्षुणियां हैं। आधी रात को जब पूरी दुनिया मीठे सपनों में डूबी होती है, बौद्ध भिक्षुणियां जाग जाती हैं। तीसरे पहर 3.30 बजे उनकी आराधना का समय शुरू हो जाता है। छोटी उम्र की भिक्षुणियां कई बार नहीं जगतीं या ध्यान के समय ही सो जाती हैं, नींद से झूमते-ऊंघते तो हम भी थे, उन्हें हल्के फट्टे से मार कर जगाया जाता है। सन्यू ने उस फट्टे से मार कर दिखाया। हल्की चोट और फटाक की आवाज से बौद्ध भिक्षुणियों की नींद भक्क से खुल जाती है। इतनी कड़ी साधना वहां रात गुजारने वाले पर्यटकों को भी करनी पड़ती है। सैन्यू ने 3.30 पर हमें जगने को कहा तो हमारे होश उड़ा गए। उतना अचंभा नहीं हुआ जब हमें कहा गया कि खाने की प्लेट में चावल का एक दाना भी छूटना नहीं चाहिए और बर्तन खुद धोने हैं। जोर से बोलना मना है या फर्श पर सोना है। हर सितम गवारा था पर ये 3.30 बजे जगने का मसला असहनीय था। उन्हें थोड़ी दया आई और 4.30 का समय जगने का दिया। सन्यू चाहती थीं कि हम भोर के अंधेरे में झरने का संगीत सुनें, हवाएं भरें अपने फेफड़े में और दोनों बांहें फैला कर सारे विषाद वहीं छोड़ आएं।
सन्यू ने सिखाया कि दोनों बांहों से अपनी देह को भरो और बोलो-दिस इज माई बाडी, दिस इज माई सोल, आई लव माई सोल, आई लव माई बाडी…
जीवन में कुछ भी अपना नहीं, स्थायी नहीं।
बच्चों की तरह ताली बजा कर अपनी सारी मासूमियत बाहर निकालें।
यही तो सच है कि अपनी देह और अपनी आत्मा के सिवा कुछ भी अपना नहीं होता। क्या हम मोहजाल से आसानी से छूट पाते हैं।

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