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जन्मशतीः जनपद का कवि

त्रिलोचन की कविता साधारण से दिखने वाले जीवन से सीधे संवाद करती है और तब जीवन मानो खुद को उनकी कविता में एकदम खुल जाने देता है। हिंदी के भक्त कवियों ने संसार को सागर (भवसागर) के रूप में देखा था। त्रिलोचन जीवन को सागर के रूप में देखते हैं। जिन ‘तुलसी बाबा’ से त्रिलोचन कहते हैं ‘भाषा मैंने तुमसे सीखी’ उनसे क्या नहीं सीखना है, यह भी त्रिलोचन की चेतना में रहता है।
Author December 4, 2016 01:02 am
त्रिलोचन शास्त्री

राजेंद्र सागर

भूमंडलीकरण के इस दौर में गर्वीले ‘ग्लोबल’ के सामने बिना लजाए ‘लोकल’ किस तरह अपने पूरे तेज और अपनी पूरी तरलता के साथ उपस्थित हो सकता है, यह जानने की उत्कंठा जागेगी तो त्रिलोचन बराबर याद आएंगे। त्रिलोचन ‘उस जनपद के कवि’ हैं, जहां ‘ताप के ताए हुए दिन’ में ‘दिगंत’ व्यापता है। एक ओर वे हिंदी में विदेशी छंद सानेट की पटरी पर सरपट दौड़ने का उत्साह रखते हैं तो दूसरी ओर बरवै जैसे अपने लोक-छंद पर अपना प्यार बरसाते हैं और उसे अपनी कविता के रंग में रंग लेते हैं।
त्रिलोचन उस पीढ़ी के कवि हैं, जिसने लिखना आजादी से पहले ही शुरू कर दिया था। लेकिन हिंदी कविता में उनको अपनी पहचान मिली आजादी के बहुत बाद। उनका कविता-संग्रह ‘धरती’ 1946 से पहले आ चुका था। वह दौर हिंदी में आधुनिकतावादी प्रवृत्तियों के शोर का दौर था। इसलिए त्रिलोचन का ज्यादा नोटिस लेने की जरूरत आमतौर पर नहीं समझी गई। ‘हंस’ के जुलाई 1946 के अंक में मुक्तिबोध ने ‘धरती’ की एक लंबी समीक्षा लिखकर त्रिलोचन के कवि-रूप के प्रति आकर्षण जगाने की ऐतिहासिक महत्त्व की कोशिश की थी। मुक्तिबोध ने लिखा था-‘मुझे कहने दीजिए ‘धरती’ के गीतों का क्षेत्र बहुत व्यापक है, जिनसे मात्र काव्य-सामर्थ्य ही नहीं प्रकट होता, वरन जीवन के विस्तृत दायरे के विभिन्न भागों का काव्यात्मक आकलन करने की क्षमता भी प्रकट होती है।…सारी कविताओं में कवि का गहरा आत्मविश्वास और सामाजिक लक्ष्य के प्रति ईमानदारी प्रकट होती है।’
त्रिलोचनजी के साथ-संग का थोड़ा भी मौका जिन्हें मिला, उन सबका सामान्य अनुभव यही रहा कि उनसे किसी भी विषय पर बात करिए वे विषय से हमेशा बहुत दूर चले जाते थे। उन्हें किसी भी विषय में घेरना मुश्किल था। पर उनकी कविता की ताकत थी कि वह उन्हें घेर सकती थी। भाषा की जड़ें खोजना और शब्दों की व्युत्पत्ति में उलझना उनका प्रिय व्यसन था। अरबी, फारसी, उर्दू और संस्कृत आदि भाषाओं में उनकी समान गति थी। लेकिन उनकी कविता उनके लिए ऐसी जगह होती थी, जहां जीवन की जड़ें खोजने और जीवन की जड़ें रोपने में वे इतनी तल्लीनता से प्रवृत्त होते थे कि भाषा वाला अपना प्रिय खेल खेलना उन्हें बिसर जाता था। बल्कि तब किसी शब्द का निरा शब्द बने रहना भी उन्हें अखरने लगता था। खुद को कितना बोलने देना है, इस मामले में असंयम बरतने वाले त्रिलोचन, कविता को कितना बोलने देना है, इस मामले में सदैव संयमी रहे। ‘सॉनेट’ विधा भी कविता में संयम का विवेक पैदा करने में उनके बहुत काम आई। त्रिलोचन की सबसे अच्छी और सबसे अपनी कही जा सकने योग्य कविताए वे हैं जो त्रिलोचन के यहां प्रेम की तरह आती हैं।
त्रिलोचन की कविता साधारण से दिखने वाले जीवन से सीधे संवाद करती है और तब जीवन मानो खुद को उनकी कविता में एकदम खुल जाने देता है। हिंदी के भक्त कवियों ने संसार को सागर (भवसागर) के रूप में देखा था। त्रिलोचन जीवन को सागर के रूप में देखते हैं। जिन ‘तुलसी बाबा’ से त्रिलोचन कहते हैं ‘भाषा मैंने तुमसे सीखी’ उनसे क्या नहीं सीखना है, यह भी त्रिलोचन की चेतना में रहता है। इसीलिए जीवन में ‘समतलता’ के न होने की वे सकारात्मक पहचान कर पाते हैं और जीवन में मिले ‘दर्द’ को भी अपनी ‘सांसों की गली’ में एक सजग और निरंतर गतिशील रहने वाले ‘पहरुए’ के रूप में देखकर आश्वस्त हुए हैं-
दर्द कहां ठहरा
सांसों की गली में
देता रहा पहरा

जीवन के सागर का
तल सम नहीं है
कहीं-कहीं छिछला है
कहीं-कहीं गहरा
त्रिलोचन की संवेदना का अंग बनते ही प्रेम और पीड़ा, दोनों का अनुभव मनुष्य के रूप में व्यक्ति के आत्मविस्तार का अनुभव बन जाता है। या यों कहें कि व्यक्ति अपने आत्म की एकांतिकता का विसर्जन करके सर्वात्मता की अनुभूति करने लगता है। त्रिलोचन की संवेदना के इस रूप को उनकी एक कविता ‘उनका हो जाता हूं’ में पहचाना जा सकता है-
जब पीड़ा बढ़ जाती है
बेहिसाब
तब जाने-अनजाने लोगों में
जाता हूं
उनका हो जाता हूं
हंसता-हंसाता हूं
अपनी पीड़ा के साथ इस तरह अपने से बाहर आना और जाने-अनजानों के बीच जाकर ‘उनका हो जाना’ ही वह मार्ग है, जहां पीड़ा आत्मरोदन से उल्लास की ओर खुलने वाला द्वार बन जाती है। इसी तरह प्रेम व्यक्ति को आश्वस्ति से भर देता है। प्रेम त्रिलोचन के लिए उस आकर्षण का नाम है, जो स्थावर-जंगम, जड़-चेतन सभी को एक सूत्र में बांधता है। एक सूत्र में यों बंधना ऐसा बंधना है जो ‘अकेले होते जाने’ के विरुद्ध कवि को एक भरी पूरी दुनिया में होने का अहसास कराता है। इसी अहसास के नाते वह सेमल का पेड़, जिसके फूलों में भले ही गंध न हो, त्रिलोचन को अपना पुराना साथी मालूम पड़ने लगता है-
मुझको शिकायत नहीं कभी
क्यों नहीं सुगंध कभी देता यह
फूलों को,
जो कुछ भी देता है
वही कौन कम है
हिंदी कवियों में नरेश मेहता अपनी वानस्पतिक चेतना की अनेक कविताओं के लिए खासे ख्यात रहे। उनके एक संग्रह का नाम ही है-‘अरण्या।’ लेकिन नरेशजी अपनी उन कविताओं में अक्सर वेद के ऋषियों की तरह हो उठते हैं। त्रिलोचन वैसी आर्ष मुद्रा से अलग, अपनी धरती पर जो कुछ भी देखते हैं-वृक्ष, पशु-पक्षी, उन सबसे अपनी ठेठ किसानी संवेदना का अपनापा कायम कर लेते हैं। यह किसानी आत्मबोध है, जिसके जागते ‘करौंदी की अरण्यानी’ आकाश से बतियाती है-
आकाश से बोली अरण्यानी
देखो, जितने तुम्हारे पास तारे हैं
मेरे पास फूल हैं
और ‘घमौनी करती गाय’ कवि के मन में अपने पूरे परिदृश्य के साथ यों अंकित हो जाती है-
आख मूंदे, पेट पर सिर टेक
गाय करती है घमौनी बंधी जड़ से
पेड़ की छाया खड़ी दीवार पर है
त्रिलोचन जीवन का गौरव ‘बहुरूपों में खिलने वाले संबंधभाव’ का आदर करने में मानते हैं। उनकी कामना है-
सबके अलग रंग का
आदर सभी करें सच्चा सहयोग-भाव हो।
भिन्न भिन्न रुचि हो तो भी निबाह होता है
यह सब में हो तो जीवन अथाह होता है।
कवि का लोक-लगाव इतना गहरा है कि कुंभ-क्षेत्र में उमड़ी जनता से अपना तादात्म्य होते देखकर वह विभोर हो उठता है-जनता का समुद्र देखा वह, शीश झुकाया…मुझे भा गया वह विराट् दर्शन…जहां-जहां जीवन को देखा वहां जा लिया…
जनता को कवि ‘पर्वत की दुहिता’ कहता है-आने दो आने दो, जनता को मत रोको,पर्वत की दुहिता है, कब रुकने वाली है।’ गंगा-जमुना की धारा के साथ यह जनता का संगम है जिसे कवि यों चित्रित करता है-
देखा कोटि संख्य जनता सामने पड़ी है
गंगा-जमुना की धारा के साथ अड़ी है
‘कुंभनगर’ शीर्षक सॉनेट में ‘विविधता में एकता’ का पाठ रचनेवाली संस्कृति के साथ ‘एकता में विषमता’ के यथार्थ के पाठ का जो मुठभेड़ चित्रित है, उससे आस्था और व्यवस्था की विसंगतियों या विडंबनाओं को अपना मुंह छिपाने का जरा भी मौका नहीं मिलने पाता है-
कहीं इष्ट की पूजा यथा तथा होती थी
कहीं लाभ के लिए लूट-सी मची हुई थी
कहीं किसी की कोठी धन से हची हुई थी
कहीं अभागा करम कटा झख मार रहा था।
त्रिलोचन का शुमार संस्कारत: भले ही उन क्रांतिचेताओं में न किया जा सके जो धार्मिक आस्था को प्रतिगामिता का लक्षण मानते हों, लेकिन फिर भी त्रिलोचन धार्मिक आस्था की उन फलश्रुतियों से आंख नहीं मूदते, जो विडंबनापूर्ण हैं।
1953 का महाकुंभ इलाहाबाद के इतिहास में उस त्रासदी के रूप में भी दर्ज है, जिसमें पता नहीं कितने तीर्थयात्रियों की जानें चली गई थीं। अपनी कविता में त्रिलोचन ने उस त्रासदी को यों रेखांकित किया-लाशों की प्रदर्शनी देखी कुंभनगर में…करुणा का सागर था वही कुतूहल भी था-किरणों का उत्ताप जहां था, मृगजल भी था।’ त्रिलोचन अपने कई सॉनेटों में उस विभीषिका को हमारी स्मृति में लाकर एक उद्वेलनकारी संवेदना में परिणत कर देते हैं-
कीचड़ से लथपथ आता है, चिल्लाता है
लाशों पर चढ़कर मानव आता-जाता है।
पत्नी कहीं रो रही थी पति कहीं विकल था
पुत्र कहीं पछाड़ खाते थे नाश अचल था।
दब पिच कर कितने ही जन दम तोड़ रहे थे
माया, ममता, मालमता सब छोड़ रहे थे।
‘वे साहित्यकार हैं’ शीर्षक सॉनेट में त्रिलोचन उन साहित्यकारों को भी नहीं बख्शते जो राजनेताओं की दावत पाकर धन्य होते रहते हैं और जिनके लिए ‘महाकुंभ’ जैसे हादसे सिर्फ चर्चा और शाब्दिक सहानुभूति का विषय बनकर रह जाते हैं।
त्रिलोचन की अनेक काव्य-पंक्तियां हैं, जो हिंदी कविता के निजी चरित्र को परिभाषित करती हैं। मसलन, एक बहु-उद्धृत पंक्ति है-हिंदी कविता उन सबकी कविता है जिनकी सांसों को आराम नहीं है। ‘अरघान’ संग्रह के एक सॉनेट में त्रिलोचन ने कविता और जीवन, दोनों की सार्थकता इसमें मानी है कि दोनों अपनी धरती से अपने रिश्ते को प्रमाणित करने में चूक न होने दें-
जीवन जिस धरती का है कविता भी उसकी
सूक्ष्म सत्य है तप है नहीं चाय की चुस्की
कविता को इसी परिभाषा में त्रिलोचन अपने यहां साधते हैं और कविता भी त्रिलोचन को उनके कठिन जीवन में साधने का पूरा संबल बनती है। ०

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