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पत्रकारिता : कृषि पत्रकारिता के अयाम

विभिन्न समाचार पत्रों में भी कृषि के लिए जगह आरक्षित रखनी चाहिए। कृषि पत्रिकारिता में एक समस्या यह आती है कि पत्रकारों को कृषि के बारे में सामान्य जानकारी भी नहीं होती है।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 07:23 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

कृषि विकास में कृषि पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। भारत में हरित क्रांति को सफल बनाने में भी कृषि पत्रकारिता की अहम भूमिका रही थी। कृषि पत्रकारिता के महत्त्व को देखते हुए ही विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों ने विभिन्न पत्रिकाएं प्रकाशित करनी शुरू की थीं। उदाहरण के लिए हिसार कृषि विश्वविद्यालय ने ‘हरियाणा खेती’ 1969 में शुरू की थी। जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर ने ‘किसान भारती’ शुरू की थी। पत्रिकाओं के अलावा विभिन्न सामाचार पत्रों ने भी कृषि को लेकर लेख छापे।

कृषि पत्रकारिता ने कृषि क्षेत्र में ‘खोज एवं खेत’ की दूरी को कम किया था। लेकिन धीरे-धीरे ये पत्रिकाएं लक्ष्य से भटक गर्इं। आम जनता को सही जानकारियां नहीं मिल पा रही हैं। इसका परिणाम हम सभी के सामने है। कृषि की विकासदर बहुत कम है और खाद, कीटनाशक दवाइयों का अधिकाधिक प्रयोग और बाजार की समस्या किसानों के सामने मुंह बाए खड़ी है। समस्या कैसे पैदा हुई? विभिन्न पत्रिकाओं जैसे ‘हरियाणा खेती’ का सरकुलेशन 1988 में दस हजार था।

वह इस समय घटकर 3500 रह गया है। पत्रिका की प्रतियों के प्रकाशन में कमी का कारण जरूरत के अनुसार स्टाफ का न होना भी है। हिसार कृषि विश्वविद्यालय में कुल प्रस्तावित पदों में से 53 प्रतिशत खाली पड़े हैं। इस स्थिति में कैसे संभव हो सकता है कि प्रत्रिका उसी कलेवर से प्रकाशित हो, जैसे की पहले थी। ‘किसान भारती’ की प्रतियां शुरू में दो हजार के आस-पास थीं। बीच में इसका प्रकाशन पांच हजार प्रति पहुंच गया था। अब 2000 प्रति बिक रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का अलग से कृषि ज्ञान प्रबंधन निदेशालय है जिसका कार्य विभिन्न माध्यमों से किसानों को कृषि संबंधी जानकारी पहुंचाना है। यहां से भी ‘खेती’ पत्रिका हिंदी में और ‘फार्मिंग’ अंग्रेजी में प्रकाशित होती है।

यहां पर भी स्थिति अच्छी नहीं है। इस निदेशालय का संवर्ग मृत घोषित हो चुका है यानी जो पद खाली पडे़ है, वे नहीं भरे जाएंगे। आकार घटाने का दौर है। पत्रिकाओं का प्रकाशन कम हो गया है। कोई उम्मीद नजर नहीं आती है कि कृषि पत्रिकाओं को कैसे सुदृढ़ किया जाएगा।

इस संदर्भ में एक रोचक बात यह है कि कृषि मंत्रालय के आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय द्वारा 2009-10 से 2013-14 के बीच में कृषि के विभिन्न पहलुओं से संबंधित 193 अध्ययन कराए गए थे, जिनमें एक भी अध्ययन सूचना एवं प्रसार के बारे में नहीं था। जबकि यह अध्ययन जरूरी था कि विभिन्न तरह के अनुसंधान किस हद तक किसानों के खेतों तक, उनके तलाबों तक, उनके पशुओं तक पहुंचे हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि शिक्षा एवं प्रसार मद पर आबंटित बजट पूर्ण रूप से व्यय नहीं होता है। उदाहरण के लिए 2012-13 में कृषि प्रसार एवं शिक्षा के लिए आबंटित बजट का वास्तविक खर्चा 16 प्रतिशत और 12 प्रतिशत कम हुआ। 2014-15 में प्रसार मद वास्तविक व्यय 11 प्रतिशत कम और शिक्षा मद का 33 प्रतिशत कम रहा है, यह स्थिति 1915-16 में अधिक गंभीर हो गई, क्योंकि इस वर्ष कृषि प्रसार का कुल बजट का वास्तविक व्यय 44 प्रतिशत कम हुआ है और शिक्षा का बजट वास्तविक व्यय 39 प्रतिशत कम हुआ है। इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि बजट के आबंटन में शिक्षा एवं प्रसार पर अधिक ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

एक अन्य समस्या इस क्षेत्र में उचित प्रशिक्षण देने की है। वास्तव में कृषि पत्रकारिता के ऊपर कृषि विश्वविद्यालयों में कोई पाठ्यक्रम भी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का प्रसार घटने की मुख्य वजह है पत्रिकाओं के प्रकाशित करने की तकनीक और कार्यशैली में कमी। अगर कृषि विश्वविद्यालयों में सूचना एवं प्रसार में कृषि पत्रकारिता के ऊपर अध्याय है भी तो उसका फोकस सिद्धांत और इतिहास पर ज्यादा और खेती के व्यावहारिक पहलुओं पर कम है।
अब प्रश्न उठता है कि इस दिशा में क्या कदम उठाए जाएं ताकि कृषि पत्रकारिता अनुसंधान और किसानों के बीच की कड़ी बनकर वर्तमान में कृषि समस्या को सुलझाने में प्रभावी भूमिका निभा सके। कृषि शिक्षा एवं प्रसार के लिए पर्याप्त आबंटन एवं उसके पूर्ण व्यय करने की जरूरत है क्योंकि बिना उचित वित्तीय आबंटन के कैसे पत्रकारिता उड़ान भर सकेगी। देश में 2 लाख 25 हजार ग्राम पंचायते हंै। 6000 से अधिक क्षेत्र पंचायत समितियां हैं और 600 से अधिक जिला पंचायतें है।

इतने व्यापक नेटवर्क से से कृषि पत्रकारिता को जोड़कर रखना जरूरी है। संविधान के अनुसार पंचायतें अपने स्तर पर आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएं बनाएंगी। ऐसा करते समय वे 11 वीं अनुसूची में दर्ज 29 विषयों को भी योजना में समाहित करेंगी। इन 29 विषयों में प्रथम सात विषय कृषि से संबंधित हैं। इनमें एक विषय तो कृषि विस्तार भी है। इसलिए पंचायतों को कृषि पत्रकारिता के केंद्र में रखना जरूरी है। पंचायतें कृषि संबंधी पत्र पत्रिकाओं की सदस्यता लेकर भी उन्हें जीवनदान दे सकेंगीं। क्योंकि पत्रिकाओं को आर्थिक रूप से सबल बनाने के लिए उनके अधिक से अधिक संख्या में ग्राहक होने जरूरी है। गांवों में दीन दयाल राष्ट्रीय ग्रामीण उपजीविका मिशन के तहत लाखों स्वयं सहायता समूह बने हैं, जिनमें अधिकतर की जीविका का साधन कृषि और इससे संबंधित गतिविधियां हैं। इनसे भी इन पत्रिकाओं से संपर्क रखने की जरूरत है।

विभिन्न समाचार पत्रों में भी कृषि के लिए जगह आरक्षित रखनी चाहिए। कृषि पत्रिकारिता में एक समस्या यह आती है कि पत्रकारों को कृषि के बारे में सामान्य जानकारी भी नहीं होती है। इसके लिए पत्रकारों को ग्रामीण परिवेश और कृषि के विभिन्न आयामों की जानकारी होनी भी जरूरी है। इसके लिए चीन के ‘पीजेंट डेली’ समाचार पत्र से सबक लिया जा सकता है। इस समाचार पत्र के नियमों के अनुसार प्रत्येक रिपोर्टर और संपादक को हर साल कम से कम दो महीने गांवों में बिताना जरूरी है ताकि वे किसानों की समस्याओं और उनकी उम्मीदों से रूबरू हो सके। कृषि से संबंधित पत्रिकाओं में कृषि संबंधी साहित्य के अतिरिक्त दूसरी जानकारी भी होनी चाहिए। पत्रिका ग्राम के संबंध में एक संपूर्ण पत्रिका होना चाहिए। सभी कृषि विश्वविद्यालयों में कृषि पत्रकारिता पर पाठ्यक्रम होने चाहिए।

(महीपाल)

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