May 24, 2017

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लिपियों का रहस्यमय संसार

हमारे यहां कहावत भी है-कोस कोस पर पानी, बदले चार कोस पर बानी। खास बात यह है कि हमारे देश की कई लिपियां अब भी रहस्य और कौतूहल का विषय बनी हुई हैं। इन लिपियों से जुड़ी कुछ जानकारियों तो बहुत ही रोचक हैं।

Author May 20, 2017 23:14 pm
भाषा-जगत जितना अनूठा और विस्तृत है, लिपियों का संसार भी उससे कुछ कम नहीं है।

भाषा-जगत जितना अनूठा और विस्तृत है, लिपियों का संसार भी उससे कुछ कम नहीं है। किसी भी भाषा के लिखने के ढंग को ही लिपि कहा जाता है। लिपियों का इतिहास भी मानव-सभ्यता जितना ही पुराना है। आज भी कई लिपियां हैं जो अबूझ हैं, जिन्हें पढ़ा जाना शेष है। लिपियों की इस जादुई दुनिया के बारे में बता रही हैं पूनम नेगी।

भारत अपनी बहुरंगी संस्कृति के लिए दुनिया भर में विख्यात है। भाषा, बोली, खानपान, वेशभूषा, परंपराएं, पर्व-त्योहार, मौसम जीवन से जुड़ा कोई भी पक्ष हो, विविधताएं ही हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत और आकर्षक बनाती हैं। इसी क्रम में विविधताओं और रहस्यों से भरा एक दिलचस्प क्षेत्र है लिपियों का। मानव सभ्यता के विकास के साथ भाषा विज्ञान में भी उत्तरोत्तर विकास हुआ है। आदिम युग से लेकर वर्तमान समय तक यों तो समूचे विश्व में विभिन्न भाषाएं, बोलियां और लिपियां विकसित हुर्इं। सांस्कृतिक संघर्ष के कारण कुछ प्राचीन भाषाएं, बोलियां और लिपियां आज विलुप्त भी हो चुकी हैं और कई कुछ बदले रूप-स्वरूप के साथ विस्तार भी पा रही हैं। हम सौभाग्यशाली हैं कि इस क्षेत्र में भारत देश सर्वाधिक समृद्ध है। इसीलिए हमारे यहां कहावत भी है-कोस कोस पर पानी, बदले चार कोस पर बानी। खास बात यह है कि हमारे देश की कई लिपियां अब भी रहस्य और कौतूहल का विषय बनी हुई हैं। इन लिपियों से जुड़ी कुछ जानकारियों तो बहुत ही रोचक हैं।

उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि भाषा को लिपिबद्ध करने का प्रचलन सर्वप्रथम भारत में ही शुरू हुआ। बाद में भारत से इसे सुमेरियन, बेबीलोनियन और यूनानी सभ्यता के लोगों ने सीखा। विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि चीनी लिपि पांच हजार वर्षों से ज्यादा प्राचीन है, जबकि कुछ का कहना है कि मेसोपोटामिया में चार हजार वर्ष पूर्व क्यूनीफॉर्म लिपि प्रचलित थी। भले ही अस्तित्व की दौड़ में कई लिपियां आज लुप्त हो गई हों मगर शोध के दौरान भाषा विज्ञानियों को लिपियों से जुड़ीं कुछ ऐसी पांडुलिपियां हासिल हुई हैं जो तमाम रहस्यों से भरी हुई हैं। कई अभिलेख तो पूरी तौर पर आज तक नहीं पढ़े जा सके हैं। कई वर्षों के शोध के बाद भी अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि इन लिपियों, मुद्राओं या शिलालेखों में स्पष्ट रूप से क्या लिखा है? जिस दिन इसका पता चलेगा, भाषा विज्ञान के इतिहास का एक नया अध्याय खुल जाएगा।

सिंधु घाटी की लिपि

कुछ समय पहले तक सिंधु घाटी के निवासी द्रविड़ संस्कृति के माने जाते थे, मगर नए शोधों के अनुसार कहा जा रहा है कि ये लोग आर्य थे और वैदिक धर्म का पालन करते थे। हालांकि इन लोगों की भाषा कौन-सी थी, यह आज भी रहस्य का विषय है। भले ही सिंधु घाटी की लिपि आज तक स्पष्ट रूप से पढ़ी नहीं जा सकी है मगर इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि इतनी विकसित संस्कृति की भाषा भी निश्चय ही जीवंत भाषा रही होगी। नए शोध बताते हैं कि हड़प्पा और मुअनजोदड़ो की खुदाई में मिले बर्तन समेत अन्य वस्तुओं पर सिंधु घाटी सभ्यता की अंकित चित्रलिपियों को पढ़ने की कोशिशें लगातार जारी हैं। गोंडी भाषा के विशेषज्ञ तिरु मोतीरावण का दावा है कि हड़प्पा और मुअनजोदड़ो की लिपियां गोंडी में ज्यादा सुगमता से पढ़ी जा सकती हैं। इस लिपि को पढ़ने की कोशिश करने वाले डॉक्टर जॉन मार्शल सहित आधे दर्जन से अधिक भाषाविज्ञानी और पुरातत्त्व विदों के हवाले से मोतीरावण कहते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता की भाषा द्रविड़ पूर्व भाषा थी। ऋग्वेद के अनुसार दुर्योण ‘कुयव असुरों’ की राजधानी थी, जिसे जला दिया गया था। गौरतलब हो कि गोंड समुदाय के लोग आज भी धरती माता की पूजा पर ‘कुयव’ से संबंधित मंत्र का जाप करते हैं। यह जानना दिलचस्प होगा कि इन परंपराओं से लिपि के सूत्र ढूंढ़ने के प्रयास जारी हैं।

कुछ अन्य शोधकों ने सिंधु घाटी की लिपि को लिपि के स्थान पर ‘भाषा’ बताया है। इसके विपरीत इतिहासकार बीवी सुब्बारायप्पा का कहना है कि यह भाषा नहीं वरन एक प्रकार की संख्यात्मक लिपि है, जैसा कि सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों और कलाकृतियों पर अंकित संख्याओं और प्रतीकों से स्पष्ट होता है। संख्यात्मक सिंधु लिपि की विशिष्टताओं को बताते हुए वे कहते हैं कि सिंधु घाटी के लोग व्यापक रूप से अपने दैनिक व्यवसायों के लिए दशमलव, जमा और गुणात्मक संख्यात्मक प्रणाली का इस्तेमाल करते थे।

देवनागरी का आदिस्रोत

हमारी ‘देवनागरी’ का आदिस्रोत ब्राह्मी लिपि मानी जाती है। ब्राह्मी लिपि भारत की अति प्राचीन लिपि है। भाषा विज्ञानियों का मानना है कि मध्ययुग में यह लिपि भारत के बड़े भूभाग में प्रचलित थी। ब्राह्मी लिपि से ही अनेक एशियाई लिपियों का विकास हुआ। यह लिपि लगभग दस हजार साल पुरानी है। भारत के चक्रवर्ती सम्राट अशोक के अनेक शिलालेख इसी लिपि में अंकित हैं। अशोक महान ने ब्राह्मी लिपि को धम्म लिपि नाम दिया था तथा महात्मा बुद्ध से जुड़े उपदेश इसी लिपि में अंकित कराए थे। कहा जाता है कि यह लिपि प्राचीन सिंधु-सरस्वती लिपि से निकली और हड़प्पा संस्कृति के लोग इस लिपि का भी इस्तेमाल करते थे। माना जाता है कि वैदिक युग में संस्कृत भाषा को भी इसी लिपि में लिखा जाता था। कई भारतीय पुराविद्वान ब्राह्मी लिपि का जन्म ज्ञान की देवी सरस्वती यानी शारदा की लेखनी से भी मानते हैं। इस लिपि के उद्भव से जुड़ा एक रोचक कथानक पुरासाहित्य में मिलता है। कथा के अनुसार जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की दो पुत्रियां थीं-ब्राह्मी और सुंदरी। बाल्यावस्था में एक बार वे पिता ऋषभदेव की गोद में जाकर बैठ गर्इं तो सहज ही उनके मन में पुत्रियों को अक्षर ज्ञान देने का विचार आ गया। बच्चियों को विद्या देने का उपयुक्त समय देख कर उन्होंने उन बच्चियों को लिपि और अंकों का ज्ञान कराया। ऋषभदेव ने दार्इं ओर बैठी ब्राह्मी को वर्णमाला का बोध कराया और बार्इं ओर बैठी दूसरी पुत्री सुंदरी को अंकगणित की जानकारी दी।

साक्ष्य बताते हैं कि ब्राह्मी लिपि से भारत की अधिकांश अन्य लिपियों के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। विद्वानों के अनुसार ब्राह्मी लिपि का प्रयोग वर्ण ध्वन्यात्मक है और इसको लिखने और बोलने में एकरूपता भी है। विशेषज्ञों की मानें तो वर्तमान समय में अंग्रेजी और उर्दू भाषाओं की लिपियों को छोड़कर समस्त लिपियां ब्राह्मी से विकसित मानी जाती हैं।केरल के एर्नाकुलम जिले में कलादी के समीप कोट्टानम थोडू के आसपास के इलाकों के पुरातात्त्विक उत्खनन में मिली कुछ कलात्मक वस्तुओं पर ब्राह्मी लिपि खोदी पाई गई। यह खोज पुरापाषाण और नवपाषाण काल की संस्कृति के अस्तित्व पर प्रकाश डालती है। पत्थरों से निर्मित इन वस्तुओं का अध्ययन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के वैज्ञानिक और केरल विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पुरातत्त्वविद पी. राजेंद्रन ने किया है। वर्तमान समय में ये वस्तुएं एर्नाकुलम जिले में मेक्कालादी के अंदेथ अली के संग्रहालय का हिस्सा हैं। कलादी में कोट्टायन के आसपास से अली द्वारा संग्रहीत इन कलात्मक वस्तुओं के विशाल भंडार का अध्ययन करने वाले राजेंद्रन के अनुसार इन वस्तुओं में नवपाषणकालीन और महापाषाणकालीन से संबंधित अनेक वस्तुएं मौजूद हैं। इनमें नवपाषाणकलीन कुछ कुल्हाड़ियों का अध्ययन करने पर पाया गया कि इनमें अठारह कुल्हाड़ियों में से तीन पर ब्राह्मी लिपि गोदी हुई थी।

लिपियों की जननी

भाषा विज्ञान के शोधकर्ताओं के अनुसार देवनागरी, बांग्ला, ओड़िया, गुजराती गुरुमुखी, तमिल, मलयालम, सिंहली, कन्नड़, तेलुगू, तिब्बती आदि अनेक भारतीय लिपियों की जननी ब्राह्मी लिपि ही है। यही नहीं, ब्राह्मी लिपि से ही कई एशियाई लिपियों का भी विकास हुआ माना जाता है। विद्वानों का एक वर्ग नेपाली, भुंजिमोल, कोरियाई, थाई, बमेर्ली, लाओ, खमेर, जावानीज व यूनानी लिपि के विकास में भी ब्राह्मी लिपि का महत्त्वपूर्ण योगदान मानता है। कहते हैं कि प्राकृत और पाली भाषा भी ब्राह्मी और देवनागरी लिपि में लिखी जाती थी।

चित्र लिपि

प्राचीन भारत में कुछ शिलालेखों, मुद्राओं और स्तंभों पर खोदी भाषा की गुत्थी भाषाविद् आज भी पूरी तरह सुलझा नहीं पाए हैं। अजंता-एलोरा, कान्हेरी, ऐलीफैंटा जैसी विभिन्न गुफाओं में अंकित चित्रलिपि के बारे में मध्य काल के विद्वानों द्वारा जो जानकारियां दी गई हैं, उनकी भाषा वर्तमान में प्रचलित भाषा से भिन्न है। अनेक गुहा- चित्रों, भग्नावशेषों, समाधियों, मंदिरों, मृद्भांडों, मुद्राओं के साथ शिलालेखों, चट्टान लेखों, ताम्रपत्रों, भित्तिचित्रों, ताड़पत्रों, भोजपत्रों, कागजों और कपड़ों पर अंकित ये चित्रलिपि अनेक रहस्यों से भरी हंै। बालूमाथ चंदवा के बीच रांची मार्ग पर नगर नामक स्थान में एक अति प्राचीन मंदिर है जो भगवती उग्रतारा को समर्पित है। शक्तिपीठ बालूमाथ से पच्चीस किलोमीटर दूर प्रखंड के श्रीसमाद गांव के पास तितिया या तिसिया पहाड़ के पास चतुभुर्जी देवी की एक मूर्ति मिली है, जिसके पीछे अंकित लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। कुछ प्राचीन लिपियां आज भी एक अनसुलझी पहेली बनी हुई हैं। उनमें लिखित अभिलेख आज तक नहीं पढ़े जा सके हैं। भारत तथा जावा और सुमात्रा में मिले बहुत से शिलालेख शंखलिपि में हैं। इस लिपि के वर्ण ‘शंख’ से मिलते-जुलते और बेहद कलात्मक हैं। इसीलिए इसे शंख लिपि कहते हैं। कई विद्वानों ने शंख लिपि को महाभारतकालीन सभ्यता से जोड़ा है। उदयगिरि की गुफाओं की शिलालेखों और स्तंभों पर भी यह शंख लिपि खोदी हुई मिली है। इस लिपि का प्रत्येक अक्षर इस प्रकार लिखा गया है कि उससे शंखाकृति उभरकर सामने दिखाई पड़ती है। पी. राजेंद्रन का अनुमान है कि द्रविण लिपि ब्राह्मी लिपि का ही एक रूप है। इसे तमिल लिपि भी कह सकते हैं। ऐतिहासिक रूप से तमिल लेखन प्रणाली का विकास ब्राह्मी लिपि के मुड़े हुए और लंबाकार अक्षरों के स्थानीय रूपांतरणों के साथ हुआ माना जाता है।

सौराष्ट्र, बडगा, इरुला और पनिया आदि अल्पख्यात भाषाएं भी तमिल में लिखी जाती हैं। द्रविण लिपि वास्तव में तेलुगू भाषा लिखने के लिए प्रयुक्त होती है। अक्षरों के रूप और संयुक्ताक्षर में यह अपने पश्चिमी पड़ोसी राज्य कन्नड़ की स्थानीय लिपि से बहुत मेल खाती है। मलयालम लिपि भी इससे काफी मिलती झुलती है। बांग्ला लिपि पूर्वी नागरी लिपि का एक परिमार्जित रूप मानी जाती है जिसका इस्तेमाल बांग्ला भाषा, असमिया या विष्णुप्रिया मणिपुरी भाषा लिखने के लिए प्रयोग किया जाता है। पूर्वी नागरी लिपि का संबंध भी ब्राम्ही लिपि के साथ है। बांग्ला और असमिया लिपियों में बहुत समानता है और इन दोनों का विकास एक साथ ही हुआ माना जाता है। कहा जाता है कि गुरुनानक देवजी के उत्तराधिकारी गुरु अंगद देव ने नानकजी के पदों को संग्रहीत करने के लिए लिए गुरुमुखी लिपि को स्वीकार किया, जो ब्राह्मी से ही निकली थी। गुरु ग्रंथ साहब इसी लिपि में लिखा गया है। वास्तव में ‘गुरुमुखी’ लिपि ही है, परंतु भूल से कई लोग इसे भाषा भी समझ लेते हैं। ०

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First Published on May 20, 2017 11:14 pm

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