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चिंता कॉलम में अभिषेक कुमार का लेख : कितने फायदेमंद हैं कीटनाशक

दुनिया भर में घरेलू और खेती में प्रयुक्त होने वाले कीटनाशकों का जानवरों पर प्रयोग करके पाया गया है कि इनसे मस्तिष्क का विकास प्रभावित होता है और दिमागी संरचना में विकार आ सकता है।
Author नई दिल्ली | July 17, 2016 01:21 am
कैंसर जैसे रोग उत्पन्न करने, मस्तिष्क कोशिकाओं की संख्या में गिरावट, डीएनए की सिंथेसिस प्रक्रिया की रफ्तार रोकने और बच्चों की सीखने, ध्यान की प्रक्रिया और व्यवहार पर ये रसायन सीधा असर डालते हैं।

हम इंसानों के लिए बाह्य संक्रमणों और कीटों से निपटना सदियों पहले भी समस्या थी, आज भी है। निसंदेह इंसान को जीवित रहने के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष बाहरी और भीतरी संक्रमणों और कीटों से निपटने के लिए करना पड़ता है। आज हमारे कई तरह के कीटनाशक और रसायन हैं जो इन कीटों और संक्रमणों से काफी हद तक हमें निजात दिलाने का दावा करते हैं। इन्हीं कीटनाशकों की बदौलत फसलें कीटों से सुरक्षित रहती हैं और घरों में ये दीमक, तिलचट्टों, मक्खी-मच्छरों से हमें सुरक्षा प्रदान करते हैं। घरेलू कीटनाशकों का तो यह कहकर जोरशोर से प्रचार किया जाता है कि कम या ज्यादा मच्छर होने पर इनका असर भी मनचाहे ढंग से घटाया या बढ़ाया जा सकता है। कीटनाशकों सालाना बाजार चार हजार करोड़ रुपए पार कर गया है।

साफ है कि घरेलू कीटनाशक घर के हर कोने में पहुंच रहे हैं क्योंकि लोगों को मच्छर-मक्खी ही नहीं, कॉक्रोच, छिपकली, दीमक आदि सभी कीड़ों-मकोड़ों से मुक्ति चाहिए। हाथ-पांव धोने से लेकर नहाने के साबुन में भी कीटाणुओं को मारने की ताकत होनी चाहिए और कपड़ों और बर्तनों को साफ करने वाले पाउडर और डिशवॉशर आदि में सिर्फ बर्तन चमकाने की खूबी न हो, बल्कि वे कीटाणुओं की धुलाई भी करते हों। यह अपेक्षा भी अब की जाती है।

घरेलू कीटनाशकों, मसलन बर्तन चमकाने वाले साबुनों, बाथरूम को चमकाने और कीटाणुमुक्त रखने वाले द्रव्यों, फर्श को चमकाने और कीटों से निजात दिलाने के लिए खुशबूदार केमिकल धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं। इधर मच्छरों का घर में प्रवेश रोकने और उन्हें एक मिनट के भीतर सफाचट करने वाले शक्तिशाली मच्छर-प्रतिरोधी मॉस्किटो रिप्लेंट्स का जोरशोर से प्रचार और इस्तेमाल भी काफी बढ़ा है। शहरों के अलावा गांवों-कस्बों में भी अब मच्छरदानियों का इस्तेमाल खत्म हो गया है, इसकी जगह मच्छर भगाने वाली बत्ती या बिजली की मशीन से चलने वाले मॉस्किटो रिप्लेंट ने ले ली है। देश में गर्मी और मॉनसूनी बरसात के दौर में तो मच्छर मार दवाओं की बिक्री और इस्तेमाल कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। बीमारियों के वाहक इन कीट-पतंगों को खत्म करने के जो तौर-तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं, वे इंसानों के लिए कितने सुरक्षित हैं? असल में कोई यह देखने की जहमत नहीं उठा रहा कि कहीं इनका इस्तेमाल स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव तो नहीं छोड़ रहा है। लोगबाग बंद कमरों में मॉस्किटो रिप्लेंट या मच्छर अगरबत्ती जलाकर मच्छरों के प्रकोप से बचते हुए आराम से सोने का सुख तो उठा लेते हैं, लेकिन सुबह उठने पर खुद को तरोताजा महसूस नहीं करते। भरपूर नींद लेने के बावजूद आंखों में जलन, सुस्ती, चक्कर आदि की शिकायत करते हैं। कोई यह बात समझने को तैयार नहीं है कि उनकी सुस्ती के पीछे पीछे ज्यादा असर वाला मॉस्किटो रिप्लेंट होता है।

मक्खी-मच्छर भगाने वाले कीटनाशकों के ऐसे इस्तेमाल के कुछ दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। इसे लेकर चेतना का अभाव है। सरकारी या गैरसरकारी संगठन भी इस बारे में न तो सतर्क हैं और न ही ऐसी कोई जागरूकता मुहिम चला रहे हैं जिससे पता चल सके कि किस किस्म के घरेलू कीटनाशकों में कितनी तरह के जहरीले रसायन हैं और उनका ज्यादा देर तक इस्तेमाल घातक हो सकता है। हालांकि, विदेशों में इसे लेकर जागरूकता आई है। मॉस्किटो रिप्लेंट के बारे में ऐसा ही एक अध्ययन अमेरिका में कुछ समय पहले किया गया था। उसमें पाया गया था कि मच्छर भगाने वाले केमिकल को बिजली की मशीनों से सुलगाने वाले घरों के निवासियों ने त्वचा में खुजली, आंखों में जलन, सुस्ती, होंठों पर खुश्की और सिरदर्द जैसी स्वास्थ्य समस्याओं की ढेरों शिकायतें कीं। इन अध्ययनों का ही असर है कि अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय संघ के देशों में मॉस्किटो रिप्लेंट से लेकर अन्य घरेलू कीटनाशकों में डाले जाने वाले रसायनों की मात्रा सख्ती से नियंत्रित की जाने लगी। वहां ऐसे रिप्लेंट और अन्य कीटनाशकों पर साफ लिखा जाता है कि नवजात शिशुओं और गर्भवती स्त्रियों के रहने वाली जगहों का उनका इस्तेमाल नहीं किया जाए क्योंकि ऐसा करने पर बच्चों में आनुवांशिक परिवर्तन होने का खतरा रहता है। दक्षिण कोरिया में तो कीटाणुनाशकों के प्रचलन को बाकायदा एक स्कैंडल करार दिया गया है और ऐसे केमिकल बेचने वाली कंपनियों पर बंदिशें लगाई गई हैं।

सवाल यह है कि आखिर लोगबाग ऐसे खतरनाक रसायनों की चपेट में आने का जतन खुद ही क्यों करने लगे हैं? सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में ऐसे कीटाणुनाशकों के प्रयोग का चलन बढ़ा है। इसके पीछे की वजहों को तलाशने की एक कोशिश दक्षिण कोरिया में हुई है। सिओल स्थित सोगांग यूनिवर्सिटी के रसायन विभाग के प्रोफेसर ली के मुताबिक अस्सी के दशक में उनके देश में लोगों की चर्चा का सबसे अहम मुद्दा यह था कि सेहत पर कोई आंच न आए, इसके लिए कैसे बेबी सोप, एअर फ्रेशनर, डियोड्रेंट से लेकर वॉशिंग मशीन तक में कीटाणुनाशकों का इस्तेमाल होना चाहिए। ली के अनुसार यह एक बाजार का उन्माद था, जिसे कीटाणुनाशक बनाने वाली कंपनियों ने विज्ञापन तंत्र की बदौलत देश में खड़ा किया था। ये कंपनियां अपने विज्ञापनों में बताती थीं कि आंखों से नहीं दिखने वाले कीटाणु किस तरह बदलते मौसम के साथ सक्रिय हो जाते हैं और हमें जुकाम, खांसी, बुखार आदि रोगों की चपेट में ले आते हैं। इस समस्या के समाधान के तौर पर उन कंपनियों ने साबुन, स्प्रे आदि के रूप में वे कीटाणुनाशक पेश किए जिनके बारे में उनका दावा है कि वे इंसानों के लिए सुरक्षित होते हैं। लोगों ने इन्हें हाथोंहाथ लिया, बिना यह जाने कि जो केमिकल अदृश्य कीटाणुओं, मक्खी, मच्छर, काक्रोच और दीमक-छिपकली से छुटकारा दिलाते हैं, उनका जहर हम इंसानों के लिए भी तो खतरनाक हो सकता है।

दुनिया भर में घरेलू और खेती में प्रयुक्त होने वाले कीटनाशकों का जानवरों पर प्रयोग करके पाया गया है कि इनसे मस्तिष्क का विकास प्रभावित होता है और दिमागी संरचना में विकार आ सकता है। इसके अलावा कैंसर जैसे रोग उत्पन्न करने, मस्तिष्क कोशिकाओं की संख्या में गिरावट, डीएनए की सिंथेसिस प्रक्रिया की रफ्तार रोकने और बच्चों की सीखने, ध्यान की प्रक्रिया और व्यवहार पर ये रसायन सीधा असर डालते हैं। अगर गर्भवती महिलाओं पर इन कीटनाशकों का हल्का सा भी असर हो जाए तो इससे गर्भस्थ शिशु भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। यानी मामला सिर्फ एक पीढ़ी तक नहीं रुकता, बल्कि भावी पीढ़ियों में भी विकृतियां पैदा करता है। पर अफसोस कि हमारे देश में फिलहाल ऐसा कोई मापदंड या कायदा-कानून नहीं है जो ऐसे खतरनाक रसायनों का तय मात्रा से ज्यादा इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को दंडित करे या लोगों को इनके इस्तेमाल के प्रति सचेत करने वाली हिदायतों का भी उतने ही जोरशोर से प्रचार करने को बाध्यकारी बनाए जितने बड़े दावे ऐसे उत्पाद बनाने वाली कंपनियां मक्खी-मच्छरों के खिलाफ उनके असर के बारे में करती हैं।

कीट-पतंगों से निपटने के सुरक्षित प्राकृतिक तरीके भी हो सकते हैं और आधुनिक विज्ञान भी कुछ ऐसे उपाय कर सकता है। पर उनके बारे में देश में फिलहाल कोई सजगता नहीं है। जैसे, मच्छरादानियों का मच्छरों के प्रकोप से निजात दिलाने के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य के लिए सौ फीसद सुरक्षित होती हैं, पर अब इनका प्रचलन शहरों में तो खत्म ही हो गया है। गांवों-कस्बों में पक्के फर्शों की वजह से उन्हें गोबर से लीपने की गुंजाइशें नहीं बची हैं, लिहाजा वहां भी फिनायल और दूसरे तेजाबी असर वाले केमिकल इस्तेमाल में आने लगे हैं। आधुनिक विज्ञान में कीट-पतंगों से निपटने के दूसरे उपाय भी हो सकते हैं। इसका एक उदाहरण चीन में पेश किया गया है। चीन के पश्चिमोत्तर प्रांत ग्वांगझाउ में दुनिया की सबसा बड़ा मच्छर-कारखाना लगाया है।

इस जगह से हर सप्ताह दस लाख स्टरलाइज्ड यानी बधिया मच्छर छोड़े जाते हैं, जो डेंगू फैलाने वाले मच्छरों को खत्म कर देते हैं। कारखाने में उत्पादित मच्छरों को हर हफ्ते शाझी द्वीप में छोड़ा जाता है। परीक्षण के दौरान पाया गया कि यह तरीका घातक मच्छरों की आबादी नब्बे प्रतिशत कम करने में सक्षम साबित हुआ। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन बधिया मच्छरों के कारण संक्रमित अंडे विकसित नहीं हो सकेंगे, जिससे सामान्य मच्छरों की आबादी में कमी आएगी। ऐसे प्रयोग अगर हमारे देश में भी किए जाएं तो रिप्लेंट और केमिकल के बेतहाशा इस्तेमाल की नीति पर कुछ अंकुश लग सकता है। पर सवाल है कि क्या बाजार की शक्तियों के दबाव में कोई सरकार आम जनता के हितों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुकाबले ज्यादा तरजीह देगी?

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