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रविवारी

कविता- मिस्टर बड़बड़

फहीम अहमद की कविता।

बाल कहानी- झबरू की दिवाली

उसके बाद हर तरफ कचरा ही कचरा, धुआं ही धुआं। पूरा शहर जिसे दिवाली से पहले लोगों से साफ करके चमका दिया था, अब...

नए अंदाज में सजाएं घर

दिवाली में सजावट को सौभाग्य और खुशहाली से भी जोड़ कर देखा जाता है, इसलिए बाजारों में इस मौके पर सजावट के तरह-तरह के...

सेहत- सर्दी में त्वचा की देखभाल

सर्दी का मौसम शुरू हो रहा है। यह बदलता मौसम शरीर को जितना अच्छा लगता है उतना ही इसमें स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना...

दाना-पानी- कुछ नमकीन हो जाए

इस दिवाली कुछ अलग और सेहतमंद नमकीन बनाएं और मेहमानों को खिलाएं और खुद खाएं, फिर देखें त्योहार का मजा दोगुना हो जाएगा।

दिवाली पर दिवारी

दिवाली पर बुंदेलखंड का प्रमुख लोकनृत्य है-‘दिवारी’। यह पुरुषों का समूह लोकनृत्य है और नाचने वाले ‘दिवरिया’ या ‘मौनिया’ कहलाते हैं।

विमर्श- आत्मसंघर्ष और निराशाबोध

कवि इस दुनिया को अपनी साधना का फूल-फल देकर, अपनी प्रभा से चकित-चल करके इस समाज को कुछ और बेहतर, कुछ और सुंदर बनाने...

कहानी- घर-द्वार

यह मैं बचपन से नित्य करता आ रहा हूं। किसी भी स्थिति में, कहीं भी मुझे पाठ करने में परेशानी नहीं हुई। चालीसा और...

सम्मान- नोबेल और काजुओ इशिगुरो

काजुओ ने केंट विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में स्नातक और ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय से रचनात्मक लेखन में परास्नातक किया। परास्नातक के दौरान प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक...

लक्ष्मी की खोज में दिवाली

ऐसे में दिवाली की रौनक कुछ फीकी-फीकी रहने के आसार हैं। ऊपर से पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध! इन परिस्थितियों में दिवाली की खुशियां...

बाल कहानी- बड़ी सोच

शाम को घना अंधेरा हो चुका था। जय और उसके पापा-मम्मी शानदार-सा गिफ्ट लेकर अपनी कार में जा रहे थे। कार सड़क पर दौड़...

लौटा जमाना लंबे परिधान का

ये देखने में भी बहुत आकर्षक लगते हैं। फिल्मी हस्तियां तो अक्सर खास अवसरों पर गाउन पहनना पसंद करती हैं, क्योंकि उनके लिए यह...

सेहत- बचें प्रदूषण के प्रकोप से

वायु प्रदूषण आज एक बड़ी समस्या बन चुका है। खासकर दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों का हाल इतना बुरा है कि यह एक...

दाना-पानी- नारियल के लड्डू, मालपुआ

नारियल के लड्डू बनाना सबसे आसान है। इसके लिए ढाई सौ ग्राम नारियल का चूरा लें। यह बाजार में आसानी से मिल जाता है।...

आधी दुनिया- उद्यमशीलता से कामयाबी

हमारे एक मित्र राजेश कालिया कोट्टयम (केरल) में रहते हैं। कुछ साल पहले जब वे दिल्ली आए तो उनसे मिलने गई थी। पत्रकार मित्र...

विमर्श- आलोचना के द्वार पर…

आज तो लगने यह भी लगा है कि आलोचना की कोई केंद्रीय अवधारणा मानो बची ही नहीं है। बहुत-सी अवधारणाएं एक दूसरे से गुत्थम...

कविताएं- हंसता हुआ बाजार, बाजार में उत्सव

रामप्रकाश कुशवाह की कविताएं।

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