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असमंजस में युवा

हर्बर्ट हूबर ने कहा था: ‘युद्ध करने का निर्णय बड़े करते हैं, मगर उसे लड़ते और मरते हैं युवा ही’। इस समय दुनिया भर में जो हिंसा, युद्ध और मारकाट हो रही है उसकी विभीषिका में युवा ही मर रहे हैं।
क्रिएटीविटी-(जगमोहन सिंह राजपूत)

हर्बर्ट हूबर ने कहा था: ‘युद्ध करने का निर्णय बड़े करते हैं, मगर उसे लड़ते और मरते हैं युवा ही’। इस समय दुनिया भर में जो हिंसा, युद्ध और मारकाट हो रही है उसकी विभीषिका में युवा ही मर रहे हैं। वे संवेदनशीलता और दुनियावी अनुभवहीनता की ऐसी स्थिति में होते हैं कि उन्हें थोड़े से प्रयास से मनचाहे ढंग से ‘रास्ता’ दिखाया जा सकता है। यह परंपरा भी लगभग हर सभ्यता में रही है कि पुरानी पीढ़ी युवाओं के संबंध में चिंतित रहती है, उनकी क्षमताओं को कमतर करके ही आंकती है। वह सदा विचलित रहती है कि ये युवा आगे चल कर अपनी जिम्मेवारी कैसे निभाएंगे? इक्कीसवीं सदी में संचार तकनीकी के प्रसार से इस सोच में अंतर आया है। आज से बीस वर्ष पहले तक हर माता-पिता अपने पढ़े-लिखे बच्चे को सरकारी नौकरी ही कराना चाहता था। आज इसमें से एक ऐसा वर्ग निकला है, जो केवल पैकेज की चाहत रखता है और अगर वह बहुराष्ट्रीय कंपनी में मिल जाए तो कहने ही क्या? और अमेरिका में ग्रीन कार्ड के साथ मिल जाए तो सोने में सुहागा! भारत से गए युवाओं ने अमेरिका में नासा और सिलिकॉन वैली में नाम कमाया, भारत का सिर ऊंचा किया और दुनिया का ध्यान भारत के युवाओं की ओर खींचा। यह उनकी बड़ी उपलब्धि है।
आज भारत का युवा वर्ग दो भागों में बंट गया है। पहला वर्ग वैश्वीकरण से संतुष्ट और प्रसन्न है। वह युवा जनसंख्या के स्वर्णिम काल में प्रवेश कर चुका है और जानता है कि उसे इसका लाभ अवश्य उठाना चाहिए। दूसरा वर्ग, जो संख्या में इससे बहुत बड़ा है, ग्रामीण अंचल, छोटे कस्बों और पिछड़े वर्ग से आता है। किसी प्रकार शिक्षा ग्रहण करता है और बाद में पाता है कि वह कहीं का नहीं रहा, न शहर का, न गांव का! इस वर्ग को चुनावों के समय याद किया जाता है, फिर पूरी तरह ‘स्वायत्त’ जीवन बिताने को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। यों सरकारें इस वर्ग के लिए निरंतर योजनाएं घोषित करती रहती हैं: मुफ्त में लैपटॉप, वजीफे, कम ब्याज पर ऋण, नौकरियों में आरक्षण, मुफ्त प्रशिक्षण की सुविधाएं आदि।
इस समय भी यह वर्ग भविष्य की ओर आशा भरी नजरों से देख रहा है: कौशलों का प्रशिक्षण मिल जाए, कहीं ‘जॉब’ लग जाए, जीवन में कुछ आत्मसम्मान मिल सके, स्थिरता मिल सके, वह भी कुछ करके दिखा सके, अपना व्यक्तित्व निखार सके! यह तो हर युवा का मौलिक अधिकार है, नैसर्गिक अधिकार है, और जो समाज इसके लिए अपने उत्तरदायित्व को विस्मृत कर देता है, वह अपना ही भविष्य बिगाड़ता है। युवा शक्ति ही राष्ट्र को नैतिक संबल देती है, उसकी बौद्धिक क्षमता बढ़ाती है, नवाचार और ज्ञान भंडार का विस्तार करती है। भारत का साठ-पैंसठ प्रतिशत युवा इसी अनिश्चय की स्थिति का सामना कर रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि देश अपने ही बड़े भाग के साथ अन्याय कर रहा है और उसके परिणामों से जानबूझ कर अनजान बना हुआ है।
इस समय भारत में कौशलयुक्त मानवशक्ति की अनुमानत: पूर्ति चौंतीस लाख है। 2022 तक इस वर्ग की आवश्यकता बढ़ कर पचास करोड़ हो जाएगी। यानी आठ सालों में 49.66 करोड़ युवाओं को आवश्यक प्रशिक्षण मिलना चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में यह देखना होगा कि क्या विदेशों में जो अवसर उपलब्ध होने वाले हैं, जिसके लिए बूढ़े हो रहे देश और समाज भारत के युवाओं की ओर देख रहे हैं, उन्हें प्राप्त करने की क्षमता हमारी शिक्षा व्यवस्था में है? संभावनाएं सामने दिखाई देती हैं: 2022 तक जब पश्चिम यूरोप में औसत आयु पैंतालीस होगी तब भारत में यह केवल उनतीस होगी। चीन तब सैंतीस पर होगा। हमने सबसे बड़ी कमी जो अनेक नीतिगत परिवर्तनों के बाद भी सुधारी नहीं वह है भारत की शिक्षा व्यवस्था में हाथ से काम करने को महत्त्व न देना, कार्य-अनुभव को नकारना, प्रायोगिक अनुभवों से बच्चों को अलग रखना या उन्हें नाममात्र की खानापूरी में परिवर्तित कर देना।
चीन और कोरिया जैसे देशों ने प्रारंभ में स्थानीय कौशलों को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि उन्हें स्कूलों में लाकर ऊंचा स्थान दिया, स्थानीय कारीगरों को स्कूलों में बुलाया और उचित सम्मान दिया। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कौशल विकास की विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई थी, केंद्र और राज्यों के स्तर पर कौशल विकास मिशन स्थापित किए गए और पंद्रह सौ नए आइटीआइ और पांच हजार कौशल विकास केंद्र स्थापित करने का निर्णय किया गया था। नीतिगत निर्णय तो आशाजनक है, मगर व्यवहार में यह आशंका बनी ही रहेगी कि जब तक वर्तमान कार्यसंस्कृति में आमूल परिवर्तन नहीं होगा, क्या यह सब सफलतापूर्वक संभव हो पाएगा?
इस समय युवाओं के सामने एक अन्य पक्ष भी चिंताजनक स्थिति उत्पन्न करता है। वह किसका अनुसरण करे, किसे आदर्श माने? जब वह आदर्शों को ढूंढ़ने के लिए निगाह दौड़ाता है तो उसके सामने वह सब कुछ उभरता है, जो मूल्यों के ह्रास की भयावह प्रस्तुति करता है। 1950 में युवाओं के सामने यह स्थिति नहीं थी। वे लोग जिन्होंने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया था, उसके आदर्श बनते थे। राजेंद्र प्रसाद जब राष्ट्रपति पद से निवृत्त होकर पटना पहुंचे तो उनके रहने के लिए सदाकत आश्रम में एक कमरे का प्रबंध किया गया। और कुछ था ही नहीं। लालबहादुर शास्त्री के देहावसान के बाद पाया गया कि
परिवार को तो कर्ज का भुगतान करना था। ऐसे अनगिनत आदर्श थे युवाओं के सामने।
आज हम तैंतीस कोटि से एक सौ तैंतीस कोटि पर पहुंच रहे हैं, पर आज का अधिकतर युवा जानता ही नहीं कि उसे समाज और शिक्षा ने जो तैयारी दी है, वह उसे किधर ले जाएगी। वह जानता है कि जो उसने सीखा है वह जीवनयापन के लिए उसे ‘नौकरी’ नहीं दिला सकता। खुद कुछ कर सकने के लिए तो उसे तैयार ही नहीं किया गया है। वह जानता है कि प्रक्रिया कुछ भी हो, सामान्यत: नौकरियां बिकती हैं। यही नहीं, अब तो अच्छे संस्थानों में प्रवेश के लिए भी कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, जो वही कर सकते हैं, जिनके पास संसाधन और सिफारिशें हों।
युवाओं का मनोबल तोड़ने में शिक्षा व्यवस्था और हर तरफ पसरा हुआ भ्रष्टाचार सबसे बड़े गुनहगार हैं ही, समाज के वे बड़े लोग, नेता, नौकरशाह और उनके इर्द-गिर्द मंडराने वाले लोग भी पीछे नहीं हैं। आज का युवा जब अपने आसपास के वातावरण को देखता है तो उसका विश्वास व्यवस्था से उठ जाता है। उसका अध्यापक शिक्षा तो बड़े-बड़े आदर्शों की देता है, मगर खुद ट्यूशन और कोचिंग संस्थानों में अधिक समय देता है। रास्ता एक ही है: व्यक्तित्व विकास का मूल अधिकार यानी ज्ञान, कौशल और अनुकरणीय आदर्श हर युवा को ईमानदारी से समान स्तर पर उपलब्ध कराया जाए। ऐसा न होने पर भारत सत्तर-अस्सी के दशक की भांति फिर उसी अवस्था में देखा जाने लगेगा, जब देश की बढ़ती जनसंख्या का हर तरफ मजाक उड़ाया जाता था। शिक्षा का वैचारिक आधार समग्रता पर आधारित हो, न कि पश्चिम की चमक-दमक को ही लक्ष्य मान कर केवल कुछ को आगे ले जाए और अधिकतर को उनके भाग्य पर छोड़ दे!

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