ताज़ा खबर
 

स्त्री विमर्शः पचास हजार औरतों की आवाज

सबसे ज्यादा अफसोस यह देख कर होता है कि इस देश के जनसेवक, जिन्हें राजनेता कहा जाता है, ऐसे मसलों पर अकसर चुप्पी साध जाते हैं।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 04:11 am
representative image

भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन ने तीन बार तलाक कह कर शादी खत्म करने की प्रथा को समाप्त करने का बीड़ा उठाया है। हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है। इस पर पचास हजार से अधिक मुसलमान स्त्री-पुरुषों ने हस्ताक्षर किए हैं। इसे राष्ट्रीय महिला आयोग को सौंपा गया है। बताया जा रहा है कि यह हस्ताक्षर अभियान जारी रहेगा। अभी लाखों लोगों के दस्तखत होंगे। भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन की नेता जकिया सोमन का कहना है कि देश में गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, ओड़ीशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, केरल, उत्तर प्रदेश में यह हस्ताक्षर अभियान जारी है।

भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन ने अभी इस मसले पर एक अध्ययन भी किया था। जिसमें बानबे प्रतिशत औरतों ने कहा था कि वे तीन तलाक का खात्मा हर हालत में चाहती हैं। यही नहीं, उस रस्म का खात्मा भी होना चाहिए, जिसे निकाह हलाला कहते हैं। इसमें अगर औरत अपने पति से दुबारा विवाह करना चाहे तो पहले उसे किसी और से विवाह करना होगा। एक रात उसके साथ बितानी होगी।

भारत में अनेक मोहल्लों, गलियों में ऐसी मुसलमान औरतें बड़ी तादाद में मिल सकती हैं, जिनके पति ने कभी मोबाइल से, कभी चिट्ठी से, कभी मैसेज करके या कभी जबानी तलाक दे दिया और सारी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए। औरतों और उनके बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। अधिकतर औरतों का कहना है कि अक्सर धर्मगुरुओं का समर्थन पुरुषों को मिलता है। धर्म के नाम पर औरतों पर होने वाले इस अत्याचार और अमानवीय व्यवहार पर कोई कुछ नहीं बोलता। औरतें भी उसी धर्म को मानती हैं जिसे पुरुष मानते हैं, तो इन्हें औरतों के अधिकारों की चिंता क्यों नहीं होती। क्या किसी भी धर्म में सिर्फ पुरुष होते हैं, औरतें नही होतीं। और क्या औरतों की जरूरत सिर्फ इतनी है, जो आतंकवादी संगठन आइएसआइएस वालों ने बना रखी है- मात्र आदमियों को शारीरिक रूप से खुश रखने की।

वे उन औरतों की सेल लगाते हैं और उनका इस्तेमाल करने के बाद दूसरे को दे दिया जाता है। इसे जायज भी बताया जाता है। यहां तक कि नेता कमाल फारुकी ने, जो अच्छे पढ़े-लिखे हैं और टीवी की बहसों में छाए रहते हैं, औरतों का साथ न देकर कहा कि एक केस के लिए इस्लाम के कानून को नहीं तोड़ा जा सकता। आज औरतें तीन तलाक के खात्मे की बातें कर रही हैं, कल प्रापर्टी में हिस्सा मांगेंगी। हालांकि कमाल फारुकी इस बात को जरूर जानते होंगे कि बाईस इस्लामिक देशों ने तीन तलाक के मामले पर प्रतिबंध लगा रखा है।

पुरुष वर्चस्व के शिकार मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के कानों में इन दुखियारी औरतों की चीखें क्यों नहीं पहुंचतीं। बल्कि हुआ तो यह कि मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड ने इसलाम के नियम तोड़ने का आरोप लगा कर सायरा के खिलाफ मुकदमा किया है।

एक बार फिर से शाहबानो के मसले की याद आती है, जिसे उच्चतम न्यायालय ने न्याय दिया था। उसके पति को आदेश दिया था कि वह गुजारा भत्ता दे। इस फैसले को एंटी इस्लामिक कहा गया था और अधिकतर मुसलिम धर्माचार्य इसके खिलाफ हो गए थे। डर कर उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस फैसले को बदल दिया था। औरतों के मुकाबले कट्टरपंथियों और धर्म की मनमानी व्याख्या करने वालों को खुश करना उन्हें ज्यादा अच्छा लगा था। यहां तक कि शाहबानो ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उच्चतम न्यायालय ने उसके पक्ष में फैसला देकर गलत किया। जब उससे पूछा गया कि वह ऐसा क्यों कह रही है, तो उसने कहा कि अगर ऐसा नहीं कहेगी तो देश में खून की नदियां बह जाएंगी!
तीन तलाक का मामला उत्तराखंड में रहने वाली सायरा के कारण चर्चा में आया है। सायरा सैंतीस साल की है। शादी को पंद्रह साल हुए। उसका कहना है कि वह परिवार में हर तरह की ज्यादती, मारपीट सहती रही। उसकी बिना इच्छा के पति बार-बार उसका गर्भपात करवाता रहा। दहेज की मांग की जाती थी। जबकि कहा जाता है कि इस्लाम में दहेज मना है।

लेकिन सायरा ने कभी शिकायत नहीं की। वह चाहती थी कि शादी बची रहे। उसका पति उससे अकसर कहता था कि वह उसे तलाक दे देगा। सायरा ने समाजशास्त्र में एमए किया है, मगर कभी नौकरी नहीं की। वह अपने मायके आई हुई थी। उसके पति ने उससे कहा कि वह एक चिट्ठी उसे भेज रहा है, जिसमें प्रापर्टी के कागजात हैं, जिन्हें वह ले ले। जब सायरा ने चिट्ठी ली तो उसमें तलाक के कागजात थे। परेशान होकर उसने अदालत की शरण ली। इस पर कहा जा रहा है कि इन मामलों में अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यह धर्म का मामला है।

वर्षों पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य सईदा हमीद ने मुसलमान औरतों की हालत पर आयोग के लिए ही एक रिपोर्ट तैयार की थी- वायस आॅफ द वायसलैस। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए देश भर की मुसलमान औरतों से बातचीत की गई थी। उसे पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते थे कि ये औरतें कितनी अशिक्षित, कितनी गरीब, कितनी बीमारियों की शिकार और पति के तलाक देने के बाद कितनी अकेली और असहाय हैं। वे हमेशा इस चिंता में घिरी रहती हैं कि न जाने कब किस बात पर नाराज होकर पति उन्हें तलाक दे देगा या दूसरी ले आएगा। लेकिन जैसा कि हर रिपोर्ट के साथ होता है, उस रिपोर्ट को भी ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया। उस समय के नेताओं ने भी यही सोचा होगा कि कौन बर्र के छत्ते में हाथ डाले।

सबसे ज्यादा अफसोस यह देख कर होता है कि इस देश के जनसेवक, जिन्हें राजनेता कहा जाता है, ऐसे मसलों पर अकसर चुप्पी साध जाते हैं। उनकी धीमी आवाजें तक सुनाई नहीं देतीं। वे वोट की चिंता में दुबले हुए जाते हैं जैसे कि अगर उन्होंने औरतों के इस मसले पर कुछ बोला तो अगले चुनाव में उनका राम-नाम सत हो जाएगा। वे भूल जाते हैं कि ये औरतें अगर तय कर लें कि या तो हमारी सुनो, वरना तुम्हें वोट नहीं मिलेगा तो ये नेता कभी चुनाव नहीं जीत सकते।

महिला सश्क्तीकरण क्या इसी तरह हो सकता है कि एक कम्युनिटी की औरतों की मुसीबतों से आंख मूंदकर बैठ लिया जाए। यही नहीं, अकसर सांप्रदायिकता के मसले पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले भी दाएं-बाएं हो लेते हैं। इसीलिए कभी-कभी लोकतात्रिंक मूल्यों पर शक और चिंता होने लगती है। ऐसा क्यों है कि नेताओं का हर बोल समाज सुधार के मसलों के मुकाबले वोट के अंकगणित से तय हो। उस लोकतंत्र का क्या फायदा, जो अपने ही एक बाजू को अशक्त और कमजोर रखना चाहता है। एक हाथ मजबूत हो और दूसरा इतना कमजोर कि मामूली जीवन यापन भी न कर सके तो ऐसे शरीर का विनाश तो निश्चित ही है।

अक्सर कहा जाता रहा है कि जब तक सुधारों की बात उसी कम्युनिटी से नहीं उठती, जहां सुधार चाहिए, तो बाहरी आवाज की कोई कीमत नहीं होती। कह दिया जाता है कि यह हमारा मामला है। हम इसे देखेंगे। आप दूर रहिए। अच्छी बात यही है कि अब मुसलमान औरतें खुद अपने प्रति होने वाले अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध में उठ खड़ी हुई हैं। बाकी सबका समर्थन भी उन्हें जरूर मिलेगा, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। बहुत से महिला संगठन उनका समर्थन कर भी रहे हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.