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स्त्री विमर्श : स्त्री आकांक्षा के स्वर

मध्यकाल में जब मध्य एशियाई आक्रांताओं ने भारत पर आक्रमण किया, पुरुषों ने युद्ध लड़े और स्त्रियों को आत्मरक्षा के लिए जौहर का रास्ता दिखा दिया गया।
Author नई दिल्ली | April 2, 2016 23:45 pm
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

स्त्री के सामाजिक जीवन के संदर्भ में जब भी वैदिक या पौराणिक प्रसंगों की चर्चा होती है, अक्सर मान लिया जाता है कि उनमें स्त्री-अधिकारों की अवहेलना की गई है। जबकि वैदिक ग्रंथों में दोनों प्रकार के उदाहरण मौजूद हैं। समर्थ, विदुषी स्त्री के भी और रूढ़िवादी परंपराओं को ढोने वाली स्त्रियों के भी। इन सबके बीच यह प्रश्न बार-बार उठता है कि आखिर स्त्री खुद क्या चाहती है? उसकी अपनी क्या आकांक्षा है?

ऋग्वेद के दसवें मंडल में एक स्त्री की आकांक्षा को इस तरह व्यक्त किया गया है: ‘सूर्योदय के साथ मेरा सौभाग्य बढ़े। मैं पति को प्राप्त करूं। विरोधियों को पराजित करने वाली और सहनशील बनूं। मेरा पति मेरी इच्छा, ज्ञान और कर्म के अनुकूल कार्य करे। मेरे पुत्र भीतरी और बाहरी शत्रुओं को नष्ट करें और मेरी पुत्री अपने सद्गुणों के कारण प्रकाशवान हो। मैं अपने कार्यों से पति के उज्ज्वल यश को बढ़ाऊं।’

सामान्य तौर पर यह एक गृहस्थ जीवन की कामना करने वाली स्त्री की ऐसी आकांक्षा है, जो अपनी समस्त विशेषताओं को अपने पति और परिवार के लिए समर्पित करने को लालायित है। पर इसी श्लोक को तनिक गहराई से देखें तो इसकी प्रथम पंक्ति का दूसरा भाग सबसे महत्त्वपूर्ण है, जिसमें वह स्त्री चाहती है कि ‘मेरा पति मेरी इच्छा, ज्ञान और कर्म के अनुकूल कार्य करे’। यही तो चाहती है प्रत्येक विवाहित स्त्री। वह अपने परिवार की रक्षा के लिए ढाल बनना चाहती है। अपने पति को अपने अनुकूल सहगामी के रूप में पाना चाहती है। अपनी संतानों को परिवार के हित में कार्य करने वाली और परिवार के यश में वृद्धि करने वाली संतान के रूप में देखना चाहती है। अगर कोई स्त्री अपने पति या परिवार की उन्नति की कामना करती है तो उसमें गलत क्या है? ये सभी आकांक्षाएं वैदिक युग से आज तक स्त्री-हृदय में यथावत जीवित हैं। गलत की सीमा वहां से आरंभ होती है जहां या तो स्त्री खुद तय नहीं कर पाती कि उसे क्या चाहिए या समाज अनदेखा करने लगता है कि स्त्री की आकांक्षा क्या है।

मध्यकाल में जब मध्य एशियाई आक्रांताओं ने भारत पर आक्रमण किया, पुरुषों ने युद्ध लड़े और स्त्रियों को आत्मरक्षा के लिए जौहर का रास्ता दिखा दिया गया। जौहर यानी आग में जीवित जल कर आत्महत्या करने का रास्ता। स्त्री को युद्ध-शिक्षा देकर सक्षम बनाने के बदले जौहर को महिमामंडित किया गया। आक्रांताओं की कुत्सित चेष्टाओं से घबराई हुई असमर्थ स्त्रियों ने इस जौहर महिमा को अपनाने का मूर्खतापूर्ण कदम उठाया। यहां से स्त्री के ‘उपभोग की वस्तु’ बनने की यात्रा का एक और अध्याय आरंभ हुआ। इच्छित पति चुनने के लिए स्वयंवर की स्वतंत्रता के बदले परदा प्रथा की परतंत्रता स्वीकार करके अपनी आकांक्षाओं को कुचलने का एक और कदम उठाया स्त्रियों ने। इन कुप्रथाओं को अपनाने के लिए दोषी खुद स्त्रियां थीं, क्योंकि इन कुप्रथाओं की शुरुआत समाज के उस उच्चवर्ग से हुई, जो राज्यशक्ति से संपन्न था। राजपरिवारों की पढ़ी-लिखी स्त्रियों ने सामाजिक विद्रोह के बजाय दासता की बेड़ियां अपनार्इं। मध्य एशियाई और फिर मुगलों की सत्ता जाने के बाद अंगरेजों ने भारत की राज्यशक्ति अपने हाथ में ली। ब्रिटिश समाज सौ प्रतिशत खुलेपन का पक्षधर नहीं था। वहां भी स्त्री का दर्जा समाज में दूसरे स्तर पर था, लेकिन जब भारतीय स्त्रियों की दशा उन्होंने देखी तो वे भी भौंचक रह गए। आत्मबलिदान और सहनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत करती भारतीय स्त्रियां लगभग अशिक्षित थीं और रूढ़िवादी घातक परंपराओं को निभाए जा रही थीं।

‘अराउंड द वर्ल्ड इन एटी डेज’ के लेखक जूल्स वर्न ने अपने रोमांचक उपन्यास में एक ऐसे अंगरेज फिलीज फॉग की यात्रा का वर्णन किया है, जो अस्सी दिन में दुनिया की सैर करने की शर्त लगा कर लंदन से रवाना होता है और अपनी यात्रा के दौरान भारत पहुंचता है। फिलीज फॉग भारत में एक स्त्री को नशे की दवा देकर जौहर के लिए चिता पर बिठाए जाते देखता है। तब उससे रहा नहीं जाता और वह जान पर खेल कर उस स्त्री की रक्षा करता है। होश आने पर वह स्त्री अपनी समस्या बताती है कि अब उसके लिए उसके मायके या ससुराल में कोई जगह नहीं है, अब वह कहीं आसरा नहीं पा सकती। वह अंगरेज उसे साथ ले जाता है और अपनी यात्रा पूरी होने पर उससे विवाह कर लेता है।

इस प्रसंग का ‘अराउंड द वर्ल्ड इन एटी डेज’ में शामिल किया जाना यह बताता है कि जूल्स वर्न ने इस कुप्रथा को दुनिया के सामने लाना चाहता था। अंगरेजों के शासन काल से ही स्त्रियों से जुड़ी कुप्रथाओं के विरुद्ध आवाजें उठनी शुरू हो गर्इं। एक-एक कर बेड़ियां टूटने लगीं। देश के स्वतंत्र होने के बाद भी स्त्री के पक्ष में स्त्री-पुरुष स्वर बुलंद होते गए। एक लंबी लड़ाई के बाद स्त्रीशिक्षा और स्त्री के आर्थिक अधिकारों को दृढ़ता मिली। यह लड़ाई लंबी इसलिए रही, क्योंकि स्त्रियों के मन-मस्तिष्क में तमाम सामाजिक कुप्रथाएं अच्छी तरह पैठ चुकी थीं। तार्किक ढंग से सोचने-समझने की क्षमता ही वह विशेषता है, जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से बेहतर सिद्ध करती है। पर दुर्भाग्यवश कहीं न कहीं अपनी उस क्षमता की अवहेलना खुद स्त्रियों द्वारा की गई।

विवेकानंद ने कहा कि ‘किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर है, वहां की स्त्रियों की स्थिति। हमें स्त्रियों को ऐसी स्थिति में पहुंचा देना चाहिए, जहां वे अपनी समस्याओं को अपने ढंग से खुद सुलझा सकें। हमें नारीशक्ति का उद्धारक नहीं, बल्कि उनका सेवक और सहायक बनना चाहिए।’ विवेकानंद चाहते थे कि स्त्रियां खुद अपना मार्ग चुनने में सक्षम हो सकें। मगर सदियों की मानसिक गुलामी ने स्त्रियों के आत्मजागरण की गति धीमी बनाए रखी।

समाज में अगर स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्जे की है तो उसके लिए पुरुष जितने जिम्मेदार हैं, उससे आधा प्रतिशत खुद स्त्रियां भी जिम्मेदार हैं। किसी भी सरकार की कोई भी योजना, किसी भी संगठन के कोई भी प्रयास तब तक कारगर नहीं हो सकते जब तक कि स्त्री आत्मशक्ति को नहीं पहचानेगी। इतिहास साक्षी है कि जब भी स्त्रियों ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन किया, उसमें उन्हें सफलता मिली। अगर इस प्रकार के आंदोलन मध्यकाल से ही आरंभ हो गए होते तो भारतीय स्त्री को कई शताब्दियों तक दलित अवस्था में नहीं रहना पड़ता। आज भी देहजप्रथा जैसे मुद्दे हैं। ‘बेटी बचाओ’, ‘बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान साबित करते हैं कि स्त्री अपनी बुनियाद से कितनी दूर है। इन समस्याओं का हल खुद स्त्रियों को तलाशना होगा। इसके लिए जरूरी है कि वे खुद अपनी आकांक्षाओं को जांचती-परखती रहें।

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