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वक्त की नब्ज: नए भारत का सपना

हाइवे के दोनों तरफ दिख रही थीं बदसूरत नई इमारतें और पुरानी, बेहाल बस्तियां, जिनकी तंग गलियों में दिख रही थीं गंदी नालियां और कूड़े के सड़ते ढेर। इन गलियों में बच्चे खेल रहे थे नंगे पांव और आवारा कुत्ते कूड़ा खा रहे थे।
Author September 3, 2017 05:22 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

प्रधानमंत्री के ‘न्यू इंडिया’ को ढूंढ़ने मैं पिछले सप्ताह देहातों में निकली, एक ऐसे राज्य में जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। राज्य का नाम लेना जरूरी नहीं समझती, क्योंकि हर राज्य में यही नजारे देखने को मिलते हैं। हाइवे में गड्ढे इतने गहरे और चौड़े थे कि जिन विशाल ट्रकों में विदेशी गाड़ियां और अन्य सामान लाद कर ले जाया जा रहा था, रुक-रुक कर लुढ़क-लुढ़क कर चल रहे थे। हाइवे के दोनों तरफ दिख रही थीं बदसूरत नई इमारतें और पुरानी, बेहाल बस्तियां, जिनकी तंग गलियों में दिख रही थीं गंदी नालियां और कूड़े के सड़ते ढेर। इन गलियों में बच्चे खेल रहे थे नंगे पांव और आवारा कुत्ते कूड़ा खा रहे थे। आधुनिक भारत के निशान सिर्फ दो थे: सेलफोन के खंभे और टीवी के डिश।

कहने का मतलब यह है कि अगर प्रधानमंत्री वास्तव में ‘न्यू इंडिया’ वाले सपने को साकार करना चाहते हैं, तो सबसे पहले उनको अपने मुख्यमंत्रियों को प्रशासनिक सुधारों की तरफ घसीट कर ले जाना पड़ेगा। उनको समझाना होगा कि प्रगति वही देश करते हैं जहां शासक लोगों को ध्यान में रख कर अपनी योजनाएं बनाते हैं। हमारे आला अधिकारी अब भी नकल करते हैं ब्रिटिश राज के प्रशासनिक तरीकों की, सो जनता की सेवा करने के बदले सेवा करते हैं सरकार की। इनको नई दिशा तब दिखती है जब कोई ऐसा मुख्यमंत्री आता है, जो नई दिशा दिखाने के काबिल हो और अफसोस के साथ कहना होगा कि भाजपा के एक भी मुख्यमंत्री ने अभी तक प्रशासनिक परिवर्तन लाने की हिम्मत नहीं दिखाई है। वे जानते हैं कि ऐसा करना बहुत जरूरी हो गया है, लेकिन डरते हैं कि ज्यादा परिवर्तन लाने की कोशिश की तो अधिकारी उनके दुश्मन बन जाएंगे। चुनाव के समय ऐसी दुश्मनी महंगी पड़ सकती है।
नरेंद्र मोदी की समस्या यह भी है कि उनके अपने मंत्री भी जब किसी बड़ी योजना का श्रेय लेते हैं तो अपनी पीठ थपथपाते हैं यह कह कर कि उन्होंने कितने किलोमीटर लंबी नई सड़क बनाई या कितनी नई रेल पटरियां बिछार्इं। भूल जाते हैं कि ऐसी चीजें मकसद नहीं, साधन हैं मकसद तक पहुंचने के। मकसद उनका हमेशा एक ही होना चाहिए और वह है भारत के आम नागरिक के बेहाल जीवन में सुधार लाना। सरकारी अधिकारियों की मानसिकता में परिवर्तन लाना आसान नहीं है, लेकिन जब तक यह परिवर्तन नहीं आता है तब तक असली विकास भी असंभव है और नए भारत का सपना भी।

पिछले सप्ताह एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने एक आंकड़ा पेश किया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और यह आंकड़ा है कि दस वर्षों बाद भारत में सौ करोड़ लोग होंगे, जिनको रोजगार की जरूरत होगी। प्रधानमंत्री बहुत बार कहते हैं कि उनकी इज्जत दुनिया में इससे है कि उनके पीछे हैं सवा सौ करोड़ देशवासी। क्या जानते हैं कि इनमें से सौ करोड़ इस उम्र के हैं, जो 2027 में नौकरी करने के काबिल होंगे? समस्या रोजगार पैदा करने की कम है और रोजगार के काबिल बनाने की ज्यादा अपने भारत महान में, क्योंकि हमारे शासकों ने विकास की योजनाएं बनाते समय लोगों को ध्यान में नहीं रखा है। सो, सरकारी स्कूल हर गांव में हैं या हर गांव के पास, लेकिन उनमें पढ़ाई इतनी बेकार होती है अक्सर कि बच्चे अनपढ़ ही रह जाते हैं, बावजूद इसके कि सरकारी स्कूलों में अध्यापकों का वेतन आज प्राइवेट स्कूलों के अध्यापकों से कहीं ज्यादा है। ऊपर से सरकारी नौकरी है, सो इतनी पक्की कि किसी को निकालना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।

स्वास्थ्य सेवाओं का भी हाल कुछ ऐसा ही है। सो, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लाखों की तादाद में बन चुके हैं और अस्पताल भी, लेकिन देहातों में इनका हाल यह है कि मरीज ठीक होकर निकल सके तो चमत्कार माना जाता है। जो हाल हमने गोरखपुर के उस अस्पताल में देखा पिछले दिनों, वह हाल हर ऐसे अस्पताल में मिलेगा, जो देहातों या छोटे शहरों में हैं। समस्या इतनी गंभीर है कि गरीब से गरीब भारतवासी प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराते हैं अपने बेटों का और बेटी कुछ ज्याद बीमार हो जती है तो उसको अपनी किस्मत पर छोड़ दिया जाता है, क्योंकि बेटी के इलाज का खर्चा प्राइवेट में कितने मां-बाप करने को तैयार हैं?
यह स्थिति इसलिए पैदा हुई है, क्योंकि हमारे शासकों ने इस देश के आम आदमी को आदमी न समझ कर मानव संसाधन समझ रखा है। पहली गलती राजीव गांधी ने की थी जब शिक्षा मंत्रालय की जगह उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्रालय बनाया था। बहुत अफसोस की बात है कि आज तक किसी प्रधानमंत्री ने इस गलती को सुधारने की कोशिश नहीं की। इंसान जब सिर्फ संसाधन बन जाता है, तो उसके लिए विकास भी वैसा होगा, जो संसाधनों के लिए होता है। इस मानसिकता को आधार बना कर चलती रही भारत की गाड़ी, तो किसी भी हाल में न्यू इंडिया नहीं बनेगा।

सो, प्रधानमंत्रीजी विनम्रता से अर्ज करना चाहूंगी कि अगर आप अपने इस सपने को साकार होते देखना चाहते हैं तो आपको अपने मुख्यमंत्रियों की मानसिकता बदलनी होगी। उनको याद दिलाना होगा कि जिन प्रशासनिक तरीकों को कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने अंग्रेजों से सीखे थी, उनकी जगह अब कूड़ेदान में है। न्यू इंडिया में विकास आम भारतवासी की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर होगा और ऐसा तब होगा जब हमारे शासक जनता के सेवक बन कर दिखाएंगे, सरकार के नहीं। न्यू इंडिया का सपना सुंदर है और इसको साकार करने में वास्तव में सवा सौ करोड़ भारतवासियों का दिल से समर्थन मिलेगा प्रधानमंत्रीजी आपको, लेकिन पहले आप अपने मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों की मानसिकता बदल कर दिखाएं। याद दिलाएं उनको कि इंसान सिर्फ इंसान होते हैं किसी के संसाधन नहीं।

 

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