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वक्त की नब्ज- शिक्षा की खोखली बुनियाद पर

आज हाल यह है कि हमारे बच्चे जब कुछ वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय पीसा स्पर्धा में भाग लेने गए तो इतना बुरा हाल रहा उनका कि उनसे पीछे सिर्फ किरगिस्तान के बच्चे थे।
Author August 13, 2017 04:56 am
प्रतीकात्मक चित्र।

हर वर्ष पंद्रह अगस्त को मुझे याद आता है भारत के पहले प्रधानमंत्री का वह भाषण, जो उनका सबसे ऐतिहासिक और महत्त्वपूर्ण भाषण माना जाता है। मेरी मां पंडितजी की भक्त थीं, सो बचपन में हमें बार-बार सुनने पर मजबूर करती थीं इस भाषण को एक पुराने ग्रामोफोन पर। सो, मुझे जबानी याद हो गई थी उस भाषण की पहली पंक्ति ‘कई सालों पहले, हमने किस्मत के साथ एक वादा (संकल्प) किया था और अब समय आ गया है कि हम अपना वादा निभाएं, पूरी तरह से न सही, पर बहुत हद तक तो निभाएं।’ अंग्रेजी में दिया था पंडितजी ने यह भाषण, एक ऐसे देश में जहां उस समय एक प्रतिशत लोग भी अंग्रेजी नहीं समझते थे। बड़ी होने के बाद मैंने कई राजनीतिक पंडितों से इसका कारण पूछा, तो किसी के पास इसका जवाब नहीं था। लेकिन इसके बारे में खूब सोचने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि शायद पंडितजी में अंग्रेजी सभ्यता और भाषा कूट-कूट कर इतनी भारी हुई थी कि वे पूरी तरह कभी भारतीय सभ्यता और हिंदी भाषा नहीं अपना सके। उन्होंने मजाक में खुद कहा था अपने बारे में कि वे भारत के आखिरी अंग्रेजी शासक हैं।

क्या यही कारण है कि उन्होंने कभी नहीं देखा कि अगर भारतवासियों को वास्तव में गरीबी और लाचारी से स्वतंत्रता दिलानी हो तो उनको शिक्षा का औजार देना सबसे जरूरी है? पंडितजी ने उच्च शिक्षा पर इतना ध्यान दिया कि उनके दौर में आइआइटी जैसे बेहतरीन कॉलेज और विश्वविद्यालय बने, लेकिन कांग्रेस की सरकारें देश भर में होने के बावजूद प्राथमिक शिक्षा में न पूरा निवेश हुआ, न ध्यान दिया गया। ध्यान दिया होता 1947 में तो शायद भारत के बच्चों में भी किस्मत से वादा करने की क्षमता होती। आज हाल यह है कि हमारे बच्चे जब कुछ वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय पीसा स्पर्धा में भाग लेने गए तो इतना बुरा हाल रहा उनका कि उनसे पीछे सिर्फ किरगिस्तान के बच्चे थे। इस शर्मनाक घटना के बाद हमने अपने बच्चों को इस स्पर्धा में भेजना बंद कर दिया और हमारे राजनेता शिक्षा को सुधारने के बदले पीसा को गालियां देते रहे।एक मोदी भक्त कहलाने के नाते मुझे बड़ी उम्मीदें थीं कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही शिक्षा संस्थाओं में सुधार लाया जाएगा। इसलिए अफसोस होता है यह कहते हुए कि उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी नाकामी रही है कोई तो शिक्षा के क्षेत्र में। स्वास्थ्य सेवाओं में भी विशेष परिवर्तन नहीं दिखा है, लेकिन मैं शिक्षा को ज्यादा अहमियत इसलिए देती हूं, क्योंकि मुझे यकीन है कि भारत का आम आदमी जब शिक्षित होगा तो खुद उतने जोर से मांगेगा अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं, जितने जोर से किसान आज कर्जे माफ करवाने की मांग रखते हैं।

शिक्षित होने और साक्षर होने में जमीन आसमान का फर्क है, लेकिन लगता है इस अंतर को मोदी के मानव संसाधन विकास मंत्री नहीं पहचान पाए हैं। सो, पिछले दिनों प्रकाश जावडेकर साहब ने गर्व से कहा कि 1947 में सिर्फ अठारह प्रतिशत भारतीय साक्षर थे और आज यह आंकड़ा अस्सी प्रतिशत के करीब पहुंच गया है। मंत्रीजी, आप अगर किसी देहाती सरकारी स्कूल में जाने की तकलीफ करेंगे किसी रोज, तो आपको फौरन दिख जाएगा शिक्षित और साक्षर होने में अंतर। मसलन, मैंने राजस्थान के एक स्कूल में बच्चों को अंग्रेजी की किताबें पढ़ते तो देखा, लेकिन जब उनसे पूछा कि वे पढ़ क्या रहे हैं, तो किसी के पास जवाब न था। कड़वा सच यह है कि प्राथमिक शिक्षा का इतना बुरा हाल है देहातों में कि शायद ही कोई गांव या कस्बा होगा पूरे भारत में, जहां आपको आम लोगों के लिए पुस्तकालय दिखेगा। लाइब्रेरी तो बहुत बड़ी चीज है, देहाती बाजारों में आपको किताबों की दुकानें भी दिख जाएं तो चमत्कार समझिए। इन चीजों के बिना कैसे असली शिक्षा दे सकेंगे भारत के बच्चों को? जिन देशों में आम लोग शिक्षित होते हैं (साक्षर नहीं) वहां लाखों की तादाद में दिखती हैं किताबों की दुकानें और हर शहर, हर गांव में पब्लिक लाइब्रेरी होती है।

माना कि इस अभाव को प्रधानमंत्री नहीं पूरा कर सकते, इसलिए कि प्राथमिक शिक्षा का जिम्मा होता है राज्य सरकारों का, लेकिन आज भारतीय जनता पार्टी की सरकारें सोलह राज्यों में हैं, सो क्यों न इन राज्यों में हम प्राथमिक शिक्षा में सुधार देख सके हैं अभी तक? यह सवाल अगर प्रधानमंत्री अपने मुख्यमंत्रियों से पूछेंगे, तो शायद पाएंगे कि शिक्षा पर उन्होंने ध्यान दिया ही नहीं है अभी तक। हां, राजस्थान में कोशिश हुई है इतिहास में परिवर्तन लाने की, सो हल्दीघाटी के विजेता अकबर नहीं, अब महाराणा प्रताप हो गए हैं। महाराष्ट्र ने एक कदम आगे बढ़ कर इतिहास की किताबों में से मुगल दौर को पूरी तरह निकालने की कोशिश की है।सो, अगले पंद्रह अगस्त तक अगर हमारे प्रधान सेवक इस गरीब देश की असली सेवा करना चाहते हैं, तो विनम्रता से मेरा सुझाव है कि वे मनरेगा द्वारा हर गांव में लाइब्रेरी के निर्माण का संकल्प करें। संकल्प कई रखें हैं प्रधानमंत्री ने देश के सामने 2022 तक- गरीबी, जातिवाद, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और आतंकवाद समाप्त करने के लिए- लेकिन क्या ये संकल्प पूरे कर सकेंगे हम, जब तक हमारे बच्चे अशिक्षित रहेंगे? क्या सच यह नहीं है कि जब तक सरकारी स्कूलों में सुधार नहीं लाएंगे हम, तब तक भारत को स्वच्छ बनाने का संकल्प भी पूरा नहीं कर पाएंगे? इससे महान संकल्प क्या हो सकता है कि हम तय करें कि पंद्रह अगस्त, 2022 से पहले एक भी गांव नहीं रहेगा भारत में, जहां अच्छा सरकारी स्कूल न हो, जहां अच्छी पब्लिक लाइब्रेरी न हो? स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं आप सबको।

 

 

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  1. Sidheswar Misra
    Aug 13, 2017 at 9:53 am
    आप ने अपने लेख में लिखा ही शिछित हो जाये गे .हक़ मांगे .सत्ता जनता को हक़ देना ही नहीं चाहती .सत्ता अपने हाथो अपना क़त्ल कयाए . दूसरा प्रश्न प्राइमरी शिछा की पढाई पर जो भी पत्रकार गांवो के प्राइमरी विद्यालयों में जाता है उनका निरीछण करने वह यह यह नहीं देखता की कमरे कितने ,अध्यापक कितने ,अध्यापक से शासन कितने काम लेता है . हम तुलना करते है निजी स्कूलों से जहाँ अध्यापक का कार्य केवल पढ़ें पढ़ाना ही है अन्य कार्य के लिए अन्य कर्मचारी इसपर फिर घूम कर एक लेख लिखे ताकि शासन जनता जाने
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