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वक्त की नब्ज- समस्या कुछ और है

सच यह है कि समस्या ही कुछ और है। असली समस्या यह है कि वामपंथियों का बोलबाला काफी हद तक कम हो गया है भारत में। एक समय था जब वामपंथी विचारधारा का प्रभाव हर जगह दिखता था।
Author September 10, 2017 05:07 am
पत्रकार गौरी लंकेश की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। (तस्वीर- फेसबुक)

गौरी लंकेश का नाम मैंने पहली बार सुना, उनकी हत्या के बाद। मैंने न उनके कोई लेख पढ़े हैं और न ही पत्रकारिता की दुनिया में उनका रास्ता मेरे रास्ते से कभी मिला। लेकिन उनकी हत्या से मुझे उतना ही अफसोस हुआ जितना उनके दोस्तों और समर्थकों को हुआ और जिन्होंने अपने दर्द को पिछले हफ्ते हर तरह जाहिर किया। किसी पत्रकार की हत्या अक्सर उसके विचारों की वजह से की जाती है, सो वे लोग गलत नहीं थे जब उन्होंने कहा कि गौरी की हत्या भी उनके विचारों के कारण ही हुई। समस्या यह है कि गौरी के समर्थकों ने उनकी हत्या के घंटों बाद ही तय कर लिया कि उनके हत्यारे संघ परिवार से जुड़े हुए थे। पहल कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने की यह कह कर कि आरएसएस की विचारधारा का जो लोग विरोध करते हैं उनको ‘पीटा जाता है, उन पर हमले होते हैं और उनको जान से मारा जाता है।’

राहुल गांधी के इस वक्तव्य के बाद इस तरह की बातें कई वामपंथी राजनेताओं और पत्रकारों ने भी कही, कभी टीवी पर आकर, कभी प्रेस क्लब में आमसभा बुला कर, तो कभी अखबारों में अपने लेखों में अफसोस व्यक्त करते हुए। सो, फिर से भारत के बारे में दुनिया भर में खबर फैलने लगी है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस देश में सहनशीलता इस हद तक खत्म कर दी गई है कि संघ का विरोध करने वालों को जान से मार दिया जाता है। यानी गौरी लंकेश की हत्या का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है अब और मोदी को बदनाम करने के लिए वामपंथियों के हाथ में एक नया हथियार आ गया है।
सो, क्या वास्तव में मोदी की आलोचना करने वालों की सजा मौत होती है? यह सवाल जब मन में आया तो याद आया मुझे कि इस तरह के आरोप उन पर शुरू से लग रहे हैं। याद आया इंडियन एक्सप्रेस में मई 17, 2014 वाला वह लेख, जो उस व्यक्ति ने लिखा था, जिसने कभी कहा था कि चायवाले को भारत का प्रधानमंत्री बनने का कोई अधिकार नहीं है। इस लेख की पहली पंक्ति के शब्द थे, ‘अंधेरा छा गया है। वह चिराग बुझ गया है, जिसने रौशन किया था हमारे स्वतंत्रता आंदोलन को और जो हमारे राष्ट्र की पहचान था।’ ऐसे कई लेख छपे थे मोदी के कार्यकाल के पहले दिनों में ही और तबसे लेकर आज तक उनके आलोचकों की तादाद बढ़ती ही गई है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी पत्रकारों से इतना कम मिले हैं कि ऐसा लगता है कि वास्तव में हमसे उनको दुश्मनी है।  सच यह है कि समस्या ही कुछ और है। असली समस्या यह है कि वामपंथियों का बोलबाला काफी हद तक कम हो गया है भारत में। एक समय था जब वामपंथी विचारधारा का प्रभाव हर जगह दिखता था। अखबारों के दफ्तरों में, हिंदी फिल्मों की दुनिया में, लेखकों और शायरों के कलाम में, राजनीति और आर्थिक नीतियों में भी। यह प्रभाव इतना गहरा था कि आज भी शायद ही कोई राजनेता मिलेगा आपको जो गर्व से कह सके कि वह समाजवादी विचारधारा के खिलाफ है। फिर भी मोदी सरकार के आने के बाद वामपंथी इतना खतरा महसूस करते हैं कि मोदी को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं।  सो, 2014 से ही वामपंथी हर तरह से हमले करते आए हैं। याद कीजिए किस तरह जब पुणे में एक मुसलिम छात्र की हत्या कुछ हिंदुत्ववादी गुंडों ने मोदी के कार्यकाल के पहले हफ्तों में की थी, दोष मोदी के सिर थोपा गया था। महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन कहा गया कि मोदी के आने से कट्टरपंथी हिंदुत्ववादियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि कहीं पर किसी की हत्या कर सकते हैं। इसके बाद सिलसिला शुरू हुआ ईसाई समुदाय को असुरक्षित महसूस होने का। एक दो गिरजाघरों में चोरियां और तोड़फोड़ हुई और इतना बवाल मचा कि जूलियो रिबेरो जैसे व्यक्तियों ने बड़े-बड़े लेख लिखे यह कहने के लिए कि भारत में उनके लिए कोई जगह नहीं रही है। यह सिलसिला खत्म हुआ तो मोहम्मद अखलाक की निर्मम हत्या की गई, जिसको लेकर अवार्ड-वापसी का दौर आया। पिछले कुछ महीनों से वास्तव में गोरक्षकों की हरकतों से चिंता हम जैसों को भी हुई है। अब इन घटनाओं की कड़ी में जुड़ गई है गौरी लंकेश की हत्या।

वही वामपंथी विचारधारा से जुड़े पत्रकार और राजनीतिज्ञ सामने आए हैं, जिनके चेहरे हमने हर बार देखे हैं। भाषण भी वही देते आए हैं हर बार, जो पिछले तीन साल से देते आए हैं हर नई वारदात के बाद और चूंकि प्रधानमंत्री ज्यादातर चुप्पी साधे रहते हैं, ऐसा लगता है कि उनके आरोप सही हैं। ऐसा भी नहीं कि उनको अपने आप को हर बार निर्दोष साबित करने में लग जाना चाहिए, लेकिन जिस तरह ट्विटर पर दूर-दराज घटनाओं पर अफसोस व्यक्त करते हैं, उसी तरह अगर देश के अंदर वाली घटनाओं के बारे में कुछ कहते, तो शायद असहनशीलता को लेकर भारत इतना बदनाम न हुआ होता। गौरी लंकेश की हत्या की खबर दुनिया के बड़े-बड़े अखबारों में छपी है और जाने-माने टीवी के समाचारों में भी इस हत्या का जिक्र आया है, जिसमें अक्सर यही कहा गया है कि मोदी के दौर में पत्रकारों की स्वतंत्रता को खतरा है। इन सारी बातों की वजह से जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात है उसको तकरीबन भुला दिया गया है और वह है कि गौरी लंकेश के हत्यारों को जल्दी से जल्दी पकड़ा जाना चाहिए और उनको सजा होनी चाहिए। अफसोस की बात है कि यह मांग ऊंची आवाजों में सिर्फ गौरी के परिजन कर रहे हैं।

 

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  1. B
    b k gupta
    Sep 10, 2017 at 9:56 am
    एकतरफा लेख ! पहली बार पिछले तीन सालो से ऐसा हो रहा है की सरकार समर्थक वर्ग इस मौत का उत्सव मना रहे है, और तो और गौरी को मरणोपरांत जैसे अलंकारों से नवाज़ा जा रहा है. तवलीन जी आप यह लिखना भूल गयी या जानबूझ कर नहीं लिखा पता नहीं.
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