March 23, 2017

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विपक्ष में साहित्य

जहां सत्ता और उसकी राजनीति का विजन तात्कालिक और छोटा होता है, वहीं साहित्य का विजन व्यापक और दूरगामी होता है।

Author March 19, 2017 04:45 am
प्रतीकात्मक चित्र
राजेश मल्ल
साहित्य शुरू से अपने समय की सत्ता के विपक्ष की भूमिका में रहा है। थोड़ी-सी चारणकाल की कविताएं और सत्ता के लाभ-लोभ को समर्पित रचनाओं को छोड़ दें, तो यह सत्ता और साहित्य का अंतर्विरोध सनातन है। हर समय की सत्ता का समीकरण धर्म, जाति, राष्ट्र आदि पर टिका रहा है, पर रचनाकार की भावभूमि इनसे परे, समस्त मानव समाज की बेहतरी के लिए समर्पित रहा है। यही बात हर समय में मौजूद बुद्धिजीवियों की भी होती है।
जहां सत्ता और उसकी राजनीति का विजन तात्कालिक और छोटा होता है, वहीं साहित्य का विजन व्यापक और दूरगामी होता है। यही कारण है कि सत्ता की साहित्य से अनबन रहती है। इस संदर्भ में धार्मिक कट्टरवादिता और वैचारिक दुराग्रह भी साहित्य को रास नहीं आता है। आधुनिक युग के बड़े विचारकों ने इसे लक्षित भी किया है। ग्राम्शी और बाद में एडवर्ड सईद ने तो विस्तार से बुद्धिजीवी और साहित्य, खासकर जनबुद्धिजीवी की भूमिका को सरकारों से आगे समाज विकास और मानव चेतना के विकास को अपरिहार्य हिस्सा माना है। कबीर से लेकर केदारनाथ सिंह तक और मीर से लेकर जान ऐलिया तक के रचना संसार इसकी तस्दीक करते दिखाई पड़ते हैं।
जब कबीर कह रहे थे कि- ‘पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ’ या ‘सांच बराबर तप नहीं’ तो वे अपने समय की सत्ता के आधार पोथी और झूठ का क्रिटीक रच रहे थे। कुंभन दास के कहा कि ‘संतन को कहा सिकरी सों काम’, तो वे सत्ता को नकार रहे थे। अनायास ही नहीं, इस बात को केदारनाथ सिंह ने इसे समकालीन महत्त्वपूर्ण संदर्भ दिया- ‘संतन को कहा सीकरी सों काम/ सदियों पुरानी एक छोटी सी पंक्ति/ और इसमें इतना ताप/ कि लगभग पांच सौ वर्षों से हिला रही है हिंदी को।’
हर कवि-साहित्यकार अपने समय के सत्ता के विरुद्ध एक प्रतिपक्ष खड़ा करता दिखता है। बहुत कम साहित्य मिलेगा, जो सत्ता के पक्ष में हो। इसे दूसरे शब्दों में कहें कि साहित्य का सरोकार और प्रतिश्रुत समस्त मानव सभ्यता और उसके भीतर संचरित मानवीय संवेदना को अपना लक्ष्य मानता है। वह अपने समय-समाज के भीतर स्पंदित भाव को ग्रहण करता है। रचनाकार को सत्ता में इस भाव संवेदना का अभाव दिखाई पड़ती है। आज जब वामपंथी विचारधारा को आरोपित किया जाता है, तो हमें यह भी देखना चाहिए कि वामपंथी सत्ताओं के विरुद्ध भी ढेर सारा साहित्य सृजित हुआ है, जो व्यक्तित्व विहीन समाज के विरुद्ध व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता का जयघोष करता दिखाई पड़ता है।
मुश्किल यह है कि सत्तासीन लोगों के पास इस प्रतिपक्ष को सुनने-समझने का अवकाश नहीं रहता। जन-जयघोष के भेड़ियाधसान में वे कवि-साहित्यकार-बुद्धिजीवी को भी शामिल करना चाहते हैं। यहीं से यह विरोध उपजता है। इतिहास पर नजर न डालने और दर्पण से मुंह चुराने का यह प्रतिफल है। प्रचीन कविता और साहित्य में तत्कालीन सत्ता के विरुद्ध जनपक्ष की आवाज शुरू से ही सुनी जा सकती है। नाथों, सिद्धों की कविता तत्कालीन सामाजिक विषमताओं के विरोध में बहुत सारा लिखा और गाया है। सत्ता समाज की विकृतियों, खासकर वर्णव्यवस्था की तीखी आलोचना मिल जाएगी। अश्वघोष कृत ‘वज्रसूची’ इसका महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
मध्यकालीन कविता अपने समय के धर्म और राज्यसत्ता की मिली-जुली सरकार में सच, पोथी, कर्मकांड, वर्णव्यवस्था, अत्याचार, सत्ता की क्षणभंगुरता, अहंकार जैसे भावों को प्रश्नांकित करती ही है, बल्कि बेलौस अपने समय के चालू सत्ता पोषित विचार सरणि के विपक्ष में खड़ी दिखती है, तो इसे साहित्य का आंतरिक चरित्र समझना चाहिए। नवजागरण काल में तो सीधे अंग्रेज सरकार की नीतियों के खिलाफ खूब लिखा गया। बालमुकुंद गुप्त ने बनाम लार्ड कर्जन नाम से चिट्ठा ही लिखा है, जिसमें सरकार की ढेर सारी कमियों पर कटाक्ष किया है। बालकृष्ण भट्ट और प्रताप नारायण मिश्र ने सत्ता और समाज दोनों का क्रिटीक रचा है। इससे भी आगे जाकर राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष की भी आलोचना प्रेमचंद्र, निराला, राहुल सांकृत्यायन की रचनाओं में प्रचुर मात्रा में मिल जाएगी। किसानों, मजदूरों, दलितों, स्त्रियों के सवालों को अगर राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में केंद्रीयता मिली, तो वह साहित्य द्वारा उठाए गए इस प्रतिपक्षी स्वर से संभव हुआ।
लोहिया के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसवाद का नारा और आपातकाल के समय जब अपने को क्रांतिकारी कहने वाले राजनीतिक दल ‘अनुशासन पर्व’ कह रहे थे, तो नागार्जुन, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर, धूमिल असका प्रतिपक्ष गढ़ रहे थे। खासकर रघुवीर सहाय की कविताएं इस मुश्किल दौर का महत्त्वपूर्ण प्रतिपक्ष हैं। इसका पुनर्पाठ होना चाहिए। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘अधिनायक’ आज भी प्रासंगिक है- ‘राष्ट्रगीत में भला कौन/ वह भारत-भग्य-विधाता है/ फटा सुथन्ना पहने जिसका/ गुन हरचना गाता है।’ नागार्जुन और धूमिल ने तो बहुत आगे बढ़ कर सत्ता का सरकार के निर्मम चरित्र को उजागर किया है। नागार्जुन ने नाम लेकर इंदिरा गांधी और उनकी तानाशाही प्रवृत्तियों पर हल्ला बोला था। वे जेल भी गए, लेकिन डिगे नहीं।
इस संदर्भ में उर्दू कविता ने एक साथ धार्मिक सत्ता और भौतिक सत्ता दोनों का कभी व्यंग्य में, तो कभी गंभीरता से आलोचना की और मानवीय सत्ता को सर्वोपरि बनाए रखा। वाइज का मजाक बनाने, धार्मिक कर्मकांड का विरोध, यहां तक कि कई बार इस्लामिक प्रतीकों पर भी टिप्पणी करने से बाज आए। मीर ने तो यहां तक कह दिया कि ‘मीर के दीनों-मजहब को अब पूछते क्या हो उसने तो/ कस्का खैचा दैर में बैठा कबका तर्क इस्लाम किया।’ गलिब ने टिप्पणी की कि ‘खुदा के वास्ते परदा न काबे से उठा जालिम/ कहीं ऐसा न हो यां भी वहीं काफिर सनम निकले।’
दुर्भाग्यपूर्ण है कि जनता की वास्तविक तस्वीर सृजित करने वाले लोग आज जनता से ही दूर जा पड़े हैं। ऐसे में साहित्य अपने विपक्ष की भूमिका, जो इसकी सार्थक भूमिका है, उसे कैसे निभा पाएगा। इससे भी कठिन स्थिति यह है कि सत्ता और उसकी नीतियों के विरोध में उठा हर स्वर, हर राग, चेतना और तर्क को प्रश्नांकित किया जा रहा है। सरकार की नीतियों, तात्कालिक और दूरगामी दोनों के संदर्भ में कुछ न कहते हुए भी आदर्शों और मूल्यों में मौजूद विविधता और बहुलता की चर्चा करना कठिन होता जा रहा है। साहित्य का काम अपने समय के सत्ता विमर्श की आलोचना प्रस्तुत करना होता है। यह उसका धर्म है। वर्तमान समय में ऐसा बहुत कुछ लिखा और रचा जा रहा है, उसे मद्धिम स्वर में सुनना और गुनना जरूरी है। हां, यह अलग बात है कि यह साहित्य-स्वर प्रतिपक्ष की ईमानदार आवाज हो।
ऐसे मुश्किल समय में साहित्य को अपनी विरासत से शक्ति लेनी होगी और खरी-खरी कहने की ईमानदार कोशिश करनी होगी, तभी वह अपनी ऐतिहासिक भूमिका अदा कर पाएगी।

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First Published on March 19, 2017 4:45 am

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