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शहर में दुश्वारियां

संजय कुंदन के संग्रह श्यामलाल का अकेलापन में कुल ग्यारह कहानियां हैं। अधिकतर में शहर है। भूले-भटके अगर कोई पात्र गांव का आ भी जाता है, तो उसकी असल दुनिया शहर की होकर रह जाती है।
Author November 21, 2015 23:10 pm

संजय कुंदन के संग्रह श्यामलाल का अकेलापन में कुल ग्यारह कहानियां हैं। अधिकतर में शहर है। भूले-भटके अगर कोई पात्र गांव का आ भी जाता है, तो उसकी असल दुनिया शहर की होकर रह जाती है। शहर ने मनुष्य के जीवन में जहां सकारात्मक परिवर्तन किया, वहीं बदलते समय के साथ कई मुश्किलें भी पैदा की। संजय कुंदन महानगरीय जीवन की इन्हीं मुश्किलों, आपाधापी, बेचैनी और अकेलेपन को इन कहानियों के माध्यम से व्यक्त करते हैं।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘श्यामलाल का अकेलापन’ का श्यामलाल दिल्ली में नौकरी करता है। बच्चों की शिक्षा, रहन-सहन को ध्यान में रखते हुए वह एक अपार्टमेंट में रहने आ जाता है। वर्षों दिल्ली में रहते हुए महसूस करता है कि अब इस शहर का मन-मिजाज तेजी से बदल रहा है। जीवन के नए विचार बिंदुओं से टकराने पर पाता है कि वह इस समाज में धीरे-धीरे मिसफिट और अकेला होता जा रहा है। घर से लेकर दफ्तर तक, यहां तक कि रोजमर्रा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखावे की संस्कृति फैल चुकी है। मगर वह अपने आप को झूठ-मूठ में क्यों बदले? शायद यह सब उसको आता भी नहीं है। जबकि बदलते हालात में उसके पुराने मित्र और कार्यालय के सहकर्मी हरगोविंद शास्त्री भी इस खाऊ-पकाऊ और दिखाऊ संस्कृति के कायल हो गए। श्यामलाल की समस्या दरअसल उत्पाद के उपभोग की नहीं, मनुष्य के उत्पाद बन जाने की है।

श्यामलाल ऐसी जगह जाना चाहता है, जहां उसे सुख और शांति मिल सके। उसकी चिंता यह भी है कि अगर हम ऐसे ही चलते रहे, तो कहां पहुंचेंगे? और कहां पहुंचेगा हमारा समाज। श्यामलाल की यह चिंता पूरी मनुष्य जाति की चिंता बन जाती है।
इस संग्रह की पहली कहानी ‘हीरो’ है। चंदर यानी हीरो आॅटोरिक्शा चलाता है। गजब का उत्साही और नैतिक है। धुन है कि एक दिन प्रसिद्ध होना है। एकदम हीरो माफिक। तरह-तरह से जुगाड़ भिड़ाता रहता है। किस्सागोई शैली में लिखी गई इस कहानी में नायक की जिंदगी से जुड़ी कुछ दूसरी कथाएं हैं, जिनमें दलित, स्त्री के सामाजिक दर्द से लेकर आधुनिक राजनीति के तिकड़म के बीच मीडिया की बनती-बिगड़ती भूमिका भी है। इन तमाम भूमिकाओं के बीच हीरो का अच्छा करने और बनने का सपना, सपना ही रह जाता है।

‘रैली’ और ‘अगला जनम’ कहानियां मध्यवर्गीय जीवन की उस व्यथा को व्यक्त करती हैं, जहां व्यक्ति अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण समय शिक्षा और नौकरी पाने में खर्च करता है और शेष जीवन परिवार, समाज और दफ्तर के बीच सामंजस्य बिठाने में लगा देता है। इस सामंजस्य में खुद के लिए समय न निकाल पाने का दर्द जहां-तहां वह व्यक्त करता रहता है। ‘अगले जनम’ के वर्माजी की स्थिति इससे अलग नहीं है। उनकी विडंबना है कि वे जो कर नहीं सकते उसके सपने देखते हैं और जो कर सकते हैं उससे दूर भागते हैं।

संजय कुंदन आज की बनती-बिगड़ती सामाजिक स्थितियों पर गंभीर नजर रखते हैं। ‘निवेशक’ कहानी में उन्होंने पुराने जातिगत संस्कार और आज के आर्थिक संबंधों के बीच उभरने वाले द्वंद्व को नया अर्थ देने की कोशिश की है। फूलन सिंह अपने दोस्त की बात में आकर लालचवश गांव की अपनी पैतृक संपत्ति बेच कर शहर में निवेशक बनने की आशा में आते हैं। लेकिन विफल होते और दोस्त से ठगे जाते हैं। जमा पैसा खर्च होने को है और पूरे परिवार की जिम्मेदारी फूलन सिंह पर है। गांव का ठाकुर दूसरे की चाकरी कैसे कर सकता है? फूलन सिंह कई दिनों तक इस दुविधा में रहते हैं। आखिरकार परिवार की खातिर, घर बैठ कर खाने के बजाय काम करना स्वीकार करते हैं।

बाउंसरों के बारे में लोगों की सामान्य धारणा अच्छी नहीं है। संजय कुंदन ने ‘बाउंसर’ कहानी में गोपी के माध्यम से यह धारणा तोड़ने और बताने की कोशिश की है कि ये लोग भी उन तमाम समस्याओं से घिरे हैं, जो रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करते हैं। रिश्ते-नाते, संवेदनशीलता सब कुछ उनमें वैसा ही होता है, जैसा एक आम आदमी में होता है।

‘टैगोर वाटिका’ इस संग्रह की एक और संजीदा कहानी है। गांव-कस्बा ही नहीं, शहरी समाज में भी, बिना पुरुष के परिवार की जिम्मेदारी संभालती स्त्री के लिए चुनौतियां कई गुना बढ़ जाती हैं। लोग-बाग उसके रहन-सहन और चरित्र पर शक करते हैं। स्थिति की जटिलता तब और बढ़ जाती है जब इस खेल में पुरुषों के साथ महिलाएं भी बराबर की सहभागी होती हैं। लेकिन इस कहानी की मुख्य पात्र शांता और उसकी बेटी अर्चना अपने व्यक्तित्व को इतना मजबूत बनाती हैं कि उनको किसी के सहारे की जरूरत ही नहीं पड़ती।

‘डार्क रूम’ पिता-पुत्र के संबंधों पर लिखी कहानी है। धनंजय शर्मा के मन में हमेशा इस बात का मलाल था कि उनके पिता से जो प्यार, नजदीकी, दुलार, संवाद मिलना चाहिए वह नहीं मिला। यही कारण है कि उन्होंने अपने बेटे विक्रांत के साथ शुरू से दोस्ती का रिश्ता रखने की कोशिश की। लेकिन परिवेश के अंतर के चलते विक्रांत ने अपने जन्मदिन की पार्टी में शरीक होने से पिता को मना कर दिया, क्योंकि पापा के रहने पर वह दोस्तों के साथ पार्टी का पूरा मजा नहीं ले पाएगा।

संजय कुंदन कहन की परंपरागत विशेषताओं से लाभ उठाते हुए भी कहानी कहने की अपनी निजी शैली बनाए रखते हैं। वे आज के मायावी बाजार के बनने और संचालित होने की प्रक्रियाओं को एक्सपोज करते और जोर देकर कहना चाहते हैं कि मनुष्य बुरी तरह एक मकड़जाल में फंस गया है।
राजेश कुमार राव
श्यामलाल का अकेलापन: संजय कुंदन; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 300 रुपए।

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