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‘साहित्य’ कॉलम में उमेश प्रसाद सिंह का लेख : कविता की चिंता में

कविता हम क्यों लिखते हैं? इस सवाल के सामने हमें अपने को ईमानदारी के साथ खड़ा करना होगा। हमें बिल्कुल एकांत में अपनी अंतश्चेतना से जवाब सुनना होगा।
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कविता विलक्षण है। सारे लक्षणों को गिनाने के बावजूद कुछ और गिनाने के लिए कविता में कविता के लक्षण बचे रह जाते हैं। बारंबार गढ़ी जाती हुई परिभाषाओं के बाद भी कविता फिर फिर परिभाषा गढ़ने के लिए बची रह जाती है।

कविता केवल भाषा में नहीं है। वह भाषा में होने से पहले भी है और भाषा में होने के बाद भी है। मगर हमारी दिक्कत यह है कि हम कविता के केवल उस रूप को पकड़ कर बैठ जाते हैं, जो भाषा में है। यहीं हम धोखा खा जाते हैं। कविता हमेशा भाषा से बाहर निकल कर हमें मुंह चिढ़ाती निरखती रहती है।

आज कविता को लेकर कविता से किसी भी तरह का रिश्ता रखने वाले लोग परेशान हैं। शिकायत है कि कविता के प्रकाशक नहीं हैं। कविता के पाठक नहीं हैं। कविता के खरीददार नहीं हैं। मगर हम इस बात से कतई परेशान नहीं हैं कि कविता हमारे भीतर नहीं है। कविता का हमारे भीतर न होना हमारे जीवन में, जीवन-व्यवहार में, हमारे बर्ताव में न होना परेशानी की बात है। उसका न होना हमारे लिए परेशानी और चिंता का विषय होना चाहिए। मगर इस विषय पर हम कभी बात नहीं करते। कभी विचार नहीं करते। हम जब भी बात करते हैं, केवल भाषा में कविता के बारे में बात करते हैं। हम जब भी बात करते हैं, कविता की किताब के बारे में बात करते हैं। कविता की बिक्री के बारे में बात करते हैं। हम बात करते हैं और बिना किसी नतीजे पर पहुंचे फिर बात करने के अवसर का इंतजार करते हैं। हम दुखी होते हैं कि कविता यहां नहीं है, वहां नहीं है, मगर हम इस बात से तनिक दुखी नहीं होते कि कविता हमारे भीतर क्यों नहीं है।

हम चाहते हैं कि कविता हमारे भीतर हो न हो, मगर बाकी सब जगह हो। प्रकाशन संस्थानों में हो, पुस्तकालयों में हो, पुरस्कार प्रतिष्ठानों में, सम्मान समारोहों में, अनुवाद केंद्रों में हो, यानी कि पूरे बाजार में हो। हमारी कविता की चिंता पता नहीं कैसे कविता के बाजार की चिंता बन गई है। कविता के उसी बाजार की चिंता, जिसे कबीर ने लुकाठी लेकर फूंक दिया था। हम कबीर के वारिस हैं जरूर, मगर पता नहीं कैसे वारिस हैं? जिस बाजार को कबीर ने आग लगा दिया था, हम उसी बाजार के मुखापेक्षी होकर, उसी के गुलाम होकर कबीर की विरासत को संभालने का दंभ पाले हैं।

बगैर किसी आंतरिक उद्वेलन के लिखी हुई कविता चाहे और कुछ भी कर ले, मगर प्राणों में उद्वेलन पैदा नहीं कर सकती। जो कविता प्राणों में उद्वेलन नहीं पैदा कर सकती, उसका बाकी जगहों पर होना भी न होने से अलग नहीं है।

कविता मनुष्य की आंतरिक दशा को प्रभावित करने के लिए है। कविता को न तो केवल ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, न केवल तलवार की तरह। कविता हथियार नहीं है। किसी भी तरह के हथियार केवल हमारे जीवन की बाह्य स्थितियों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। हथियार का प्रवेश मनुष्य की चेतना की आंतरिक सतह में संभव नहीं होता। कविता का अनुप्रवेश जीवन की आंतरिक चेतना में होता है। वह हमारी चेतना से संयुक्त होती है। चेतना से संयुक्त होने की योग्यता के कारण ही कविता किसी भी तरह के हथियार से बहुत अधिक शक्तिशाली है।

कविता केवल कुछ जीवन स्थितियों के विरुद्ध असहमति की आवाज नहीं है। वह केवल सत्ता के विरोध का नाम नहीं है। यह काम तो विपक्षी दल करता है। कविता केवल व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह का आंदोलन नहीं है। कविता व्यक्ति और समाज के अंतर्संबंधों के बीच अंतर्क्रियाओं के अर्थ की तलाश है। वह समय की ऐतिहासिक विरासत के साथ होने वाली मानवीय चेतना की अभिक्रिया की अनुभव जन्य अभिव्यक्ति है।

गरीबी, अन्याय, अत्याचार आदि अमानवीय वृत्तियों के प्रति मनुष्य की आंतरिक चेतना में जुगुप्सा और भर्त्सना के भावों को जगाना कविता का काम है। कविता का काम मनुष्य की आंतरिक चेतना में अस्तित्ववान होना है। अंतर में विद्यमान होकर बाह्य स्थितियों को प्रेरित और प्रभावित करने का काम कविता का है। बगैर आंतरिक दशाओं को प्रभावित किए केवल भाषा में, बाजार में उपस्थित हो लेना कविता नहीं, कविता का व्यापार है। व्यापार की चिंता जीवन की नहीं, बाजार की चिंता है। कविता बाजार की वस्तु नहीं है, वह जीवन की जरूरत है। कविता का संबंध मनुष्य और मनुष्य जाति के जीवन से है।

कविता हम क्यों लिखते हैं? इस सवाल के सामने हमें अपने को ईमानदारी के साथ खड़ा करना होगा। हमें बिल्कुल एकांत में अपनी अंतश्चेतना से जवाब सुनना होगा। क्या हम कविता अपने को समाज में कवि के रूप में स्थापित करने के लिए रचते हैं? क्या हम कविता अपने को सामान्य से अलग विशिष्ट रूप में प्रचारित करने के लिए लिखते हैं? क्या हम कविता अपनी श्रेष्ठता और महत्ता को प्रमाणित करने के लिए लिखते हैं? क्या कविता हमारे लिए सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का साधन है? क्या कविता लिखने के पीछे सम्मान और पुरस्कार अर्जित करने की लालसा हमारे भीतर कहीं छिपी बैठी है?

अगर हां, तो कविता हम मनुष्य जाति की हितचिंता की उत्प्रेरणा से नहीं, बाजार के लिए लिख रहे हैं। हमारी कविता बाजार की कविता है। बाजारू कविता है। इसका मूल्य और मान भी बाजार के नियमों के तहत निर्धारित होगा। जो निर्धारित होगा उसे हमें स्वीकार करना ही होगा। यह कविता प्रतिषेध और प्रतिरोध की कविता नहीं हो सकती। यह कविता मनुष्य के जीवन में नहीं हो सकती। यह कविता मनुष्य जाति के जीवन के लिए नहीं हो सकती। वह मनुष्य जीवन को और अधिक सुंदर और अधिक समुन्नत, और अधिक समृद्ध बनाने में सहायक नहीं हो सकती। जहां हम हैं, वहां कविता नहीं है। जहां कविता है, वहां हम नहीं हैं। फिर भी हम कविता को पकड़ने के लिए विकल हैं। बेचैन हैं।

अपने लिए सुविधा, सुख और समृद्धि की लालसा को दुलारते रख कर दुखों के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन कविता नहीं है। दूसरों के दुख को अपना दुख समझने का बोध कविता की योग्यता है। कविता बोध से ही उपजती है और बोध को ही बोती है। कविता की उत्प्रेरणा और कविता की फलश्रुति दोनों बोध में ही है। दूसरों के सुख-दुख को अबाध रूप में अपने में आने देना और अपने को अबाध रूप में दूसरों में जाने देना ही कविता कर्म है। कविता कर्म शब्द कर्म नहीं, संवेदना कर्म है। यह विरल, विलक्षण और संश्लिष्ट कर्म है। कवि कर्म ‘स्व’ और ‘पर’ के संश्लेषण की प्रक्रिया में निहित है। इस प्रक्रिया में अपने अस्तित्व को बगैर किसी परवाह के छोड़ देने के अलावा कविता रचने का दूसरा रास्ता नहीं है। अपने समय में हमें सोचना है कि हमारी चिंता कविता के प्रति है या कविता के बाजार के प्रति? बाजार की चिंता कविता की चिंता नहीं हो सकती।

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