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दक्षिणावर्त: भरोसा सरहद पार

तरुण विजय अगर ठान लिया गया है कि बस विरोध करना है, चाहे उसकी वजह सिर्फ ईर्ष्या हो, तो विरोध ही होगा। हम तय कर चुके हैं कि दफ्तरों में भ्रष्टाचार, रेलों का सड़ापन, आम भारतीय की दैनंदिन तकलीफें ऐसी ही रहेंगी, पर राजनीति का रंग नहीं बदलेंगे, गरीब का सिर्फ इस्तेमाल करेंगे। फिर तो […]
Author April 12, 2015 17:01 pm

तरुण विजय

अगर ठान लिया गया है कि बस विरोध करना है, चाहे उसकी वजह सिर्फ ईर्ष्या हो, तो विरोध ही होगा। हम तय कर चुके हैं कि दफ्तरों में भ्रष्टाचार, रेलों का सड़ापन, आम भारतीय की दैनंदिन तकलीफें ऐसी ही रहेंगी, पर राजनीति का रंग नहीं बदलेंगे, गरीब का सिर्फ इस्तेमाल करेंगे। फिर तो नेताओं, अफसरों के पेट और पूंजी में लगातार इजाफा होता रहेगा। बड़े बंगले, बड़े खाते वाले कभी यह महसूस नहीं कर पाएंगे कि फुटपाथ पर प्लास्टिक की चादर का घर बना कर रहने और मजूरी करने का अर्थ क्या होता है। बच्चा अच्छे स्कूल में भर्ती न हो पाए तो उसका दर्द क्या होता है। गांव में सड़क न हो, बिजली लगातार जाती रहे, इंटरनेट चले नहीं, मोबाइल पर एक बार बात के लिए चार बार नंबर मिलाना पड़े, हलो हलो करते रहना पड़े तो कितनी झल्लाहट और चिढ़ होती है!

पर यह हमारी आदत और स्वभाव में शुमार हो गया है कि सरहद पार के दुश्मन पर भरोसा करने का जलसा करेंगे, क्रूर अपराधी हाफिज सईद को साहब कह कर अपने पाखंडी ‘उदारमन’ का प्रचार करेंगे, फिरंगियों के मुल्क से डॉलर में अनुदान और कोई वजीफा लेने के लिए देश के विरुद्ध भी लिख डालेंगे, पर अपने ही देश का, अपना कोई स्वदेशी मुल्क बदलने की जद्दोजहद में अगर कामयाब होता दिखे तो उसे विफल, निरर्थक बताने की मुहिम में जिहादी समर्पण के साथ जुट जाएंगे। सड़क, पानी, बिजली, स्कूल, अस्पताल, पीने का पानी, सरल-सुगम यात्रा, किसान की फसल, घरेलू र्इंधन यह सब हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के वे मुकाम हैं, जिन पर चर्चा करते-करते नेता करोड़पति से अरबपति हो गए, अफसर नोएडा, गुड़गांव, मोहाली, मलाबार हिल से लेकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में सौ-सौ बीघे के फार्म हाउसों के मालिक बन गए। पर जनता वहीं की वहीं ठिठकी रही।

अभी कल तक हर अखबार का पहला पन्ना नित नए भ्रष्टाचार, घोटाले, अपकर्म की खबरों से रंगा रहता था। हर दिन सूरज नया अंधेरा लेकर उगता प्रतीत होता था। जिन पर जिम्मेदारी थी कि देश बनाएंगे, बचाएंगे, वे पैसे खाकर मंत्रालयों में अफसरों की भर्ती करते हुए, लाखों-करोड़ के घोटाले को ‘शून्य क्षति’ का विषय समझाते हुए दिखते थे। अहंकार, तौबा, इतना अहंकार कि सामने वाले को मिट््टी के समान देखने लगे थे।
वे दिन खत्म हुए या नहीं? मन भले ही मानता हो, पर भीतर की ईर्ष्या, राजनीतिक ग्रंथियां और जड़बद्ध घृणा यह मानने से मना करती है। सच सामने दिखे और उसे सच कह दिया जाए तो फिर राजनीति क्या हुई? राजनीति का पर्व तो वह है कि सूरज उगता दिखे तो सिद्ध कर दिया जाए कि चंद्रमा कुछ अलग तेवर से ज्यादा अंधकार क्यों फैला रहा है? तालियां और सुर्खियां तो तभी मिलेंगी। क्या यह संभव नहीं कि कुछ भी ठीक होता दिखे तो उसे मौका दिया जाए?

सारे संदेह, सारे अपशकुन, सारे अविश्वास केवल और केवल हम अपने उन भारतीयों के लिए क्यों सुरक्षित रखते हैं, जो कर्तृत्व और व्यक्तित्व में कुछ भिन्न होंगे, पर काम तो देश के लिए कर रहे होते हैं। यह देश क्या अपने ठहराव और नदी के तालाब बनते जाते हुए काई जमने की विडंबना से तंग नहीं आ गया? कुछ तो ऐसा हो कि जड़ता टूटे। जब जड़ता टूटती है तो जरूरी क्यों होना चाहिए कि हमारे अपने राग, छंद, गीत और मुहावरों से ही उसका उच्चाटन हो? कोई अलग भाषा, भाव और भंगिमा से भी कुछ ऐसा हो सकना संभव है, जो गांव, गरीब की हालत को तनिक सुधार दे। क्या वह भी सहन नहीं?

राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताएं रहेंगी ही। पर इन प्रतिबद्धताओं के पीछे कौन-से विचार हैं कि जिनका वास्तव में कोई गहरा ज्ञान-बोध हो? कश्मीर के आतंकवादियों को समर्थन? दिल्ली के ‘लोकतंत्र-वीरों’ का आपसी कलह कौन-सी बौद्धिक-श्रेष्ठता और जनहित साधना का दर्शन कराता है। देश की इन महान लोकतांत्रिक विचारवान पार्टियों का दर्शनशास्त्र क्या आप उनके चुनावी घोषणा-पत्रों या दलीय प्रचार साहित्य से मापेंगे, जिन पार्टियों को उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके स्वामी-नेताओं से चीन्हा जाता है? ये तमाम पार्टियां व्यक्तिगत जमींदारियां ही तो हैं- लोकतंत्र तो जलसे की चकरघिन्नी की नार्इं सिर्फ दिखावा है। किस राजनीतिक दल में आंतरिक चुनाव होते हैं? एक लल्ला हमारा बाहर चला गया तो पार्टी खतरे में आ जाती है। पहले हुजूर माई बाप सामंत, नवाब और जमींदार होते थे, अब हुजूर माई बाप अध्यक्षजी होते हैं। चलने, फिरने, बात करने, पायलागू भक्तों की ओर तनिक दृष्टि निपात कर उन्हें धन्य करने की शैली देख लीजिए। यही तो लोकतंत्र है।

क्या इसमें बदलाव नहीं चाहिए? क्या यह सड़-गल चुका, दुर्गंधयुक्त हवा-पानी बदलना नहीं चाहिए। उस बदलाव में अड़चन डालना, उसमें शक पैदा करना क्या देश और समाज के प्रति हमारा सश्रद्ध योगदान माना जाएगा?

खतरे अब भी बहुत हैं। सत्ता और प्रभाव की प्रचुरता मद और निरंकुश एकतरफापन भी पैदा करती है। कम्युनिस्टों की तरह असहिष्णुता, सूची से नाम हटाना, जोड़ना, नीचे-ऊपर करना अब सामंतों की राजनीति का सामान्य हिस्सा है। इससे बचेंगे तो देश बचेगा। वरना डर है कि भीतरी आतंक, गरीबी और राजनीतिक विश्वासघात का दंश झेलता देश विकास का सदियों बाद आया एक नया सबेरा फिर कहीं खो न दे। यह हुआ तो किस विपक्ष या किस शब्द-सूरमा का भला होगा? देश होगा तभी तो सब होंगे।

देश का हर नागरिक, विदेशों में बसा हर भारतीय देश को बढ़ते देखना चाहता है। उसके मन की यह तड़प हर संगठन, विचारधारा और राजनीतिक दल के दायरों से परे है।

हर पार्टी के कार्यकर्ता भले अपने नेता, अपने दल के लिए काम करते हुए दूसरों को बुरा-भला कहते रहें। पर ऐसा कहना या सोचना भी संभव नहीं कि उनके मन में देश की भलाई का भाव कम होगा। बस, इसी भाव को पकड़ने की जरूरत है। कोई नहीं चाहता कि यह बड़ा, महान, विशाल देश गरीबी और पिछड़ेपन के अतल में धंसा हमेशा ऐसा ही बना रहे। अगर हर भारतीय एक बार एकजुट होकर, भारतहित के बिंदु पर सारे विरोध एक बार भुला कर सक्रिय हो जाए तो फिर देश को और क्या चाहिए? कोई दल नहीं, कोई नेता नहीं, बस भारत एक बार हम सबसे, हमारी सब विचारधाराओं से बड़ा हो जाए- यही एक बात सबको बड़ा बना देगी।

 

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