April 27, 2017

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परदे पर बच्चे

‘तारे जमीं पर’ की रिकॉर्ड सफलता के बाद बाल-केंद्रित फिल्मों का चलन बढ़ा है।

Author March 26, 2017 06:36 am
प्रतीकात्मक चित्र

राजकुमार

पश्चिमी सिनेमा में ‘न्यू वेब सिनेमा’ की जो धारा बही, उससे दुनिया भर की फिल्में प्रभावित हुर्इं। उसने फिल्म की दिशा ही नहीं बदली, कथा के परंपरागत ढर्रे को तोड़ कर कथ्य और भाषा भी पुनर्गठित की। बौद्धिक और दार्शनिक चिंतन भी। फिल्में दृष्टि और विचार संपन्न लगने लगीं। बॉलीवुड भी उसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। फिल्में नए यथार्थ से लैस होकर उभरीं। राजकपूर की ‘बूट पॉलिश’ (1954) उसी यथार्थवादी प्रभाव के भीतर निर्मित क्लासिकल फिल्म है। अनाथ बच्चों को केंद्र में रख कर बनी यह फिल्म आज भी हिंदी सिनेमा की उन सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में है, जिनके केंद्र में बच्चे हैं। बॉलीवुड की मुख्यधारा सिनेमा में बच्चों को केंद्र में रख कर बहुत कम फिल्में बनीं।

बच्चों पर फिल्म बनाने का चलन बॉलीवुड में भी पिछले दो-ढाई दशक में बढ़ा है, लेकिन सवाल है कि क्या इन फिल्मों ने पूर्व निर्मित फिल्मों की परंपरा को आगे बढ़ाया? या उसके समांतर कोई दूसरी-तीसरी लकीर खींच पाए? ‘मासूम’, ‘सफेद हाथी’, ‘तारे जमीं पर’, ‘तहान’ को अपवाद स्वरूप छोड़ दें, तो ज्यादातर फिल्में प्रभावहीन रही हैं। कुछ फिल्में लोकप्रिय जरूर हुई हैं, व्यावसायिक दृष्टि से सफल रही हैं, लेकिन कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाई हैं। यह जरूर कहा जा सकता है कि आज के फिल्मकार बच्चों को फिल्म का दर्शक और उपभोक्ता बनाने में सफल हुए हैं। ‘बूट पॉलिश’ या ‘मासूम’ बच्चों के बीच लोकप्रिय हुर्इं, ऐसा पढ़ने या सुनने में नहीं आता, लेकिन ‘चिल्लर पार्टी’, ‘स्टेनली का डिब्बा’, ‘आबरा का डाबरा’ या ‘भूतनाथ’ बच्चों में लोकप्रिय फिल्में हैं।

‘तारे जमीं पर’ शायद एकमात्र फिल्म है, जो समाज के सभी वर्गों में प्रभावशाली और लोकप्रिय रही। बॉक्स आॅफिस पर भी सर्वाधिक हिट और सफल फिल्म साबित हुई। बच्चों को कौन-सी चीजें मुग्ध करती हैं, उनकी रुचियां किन-किन चीजों को देखने और समझने में है, शायद यह पहले अधिक विकसित नहीं था। आज के वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक-भाषाई शोध और सर्वे के माध्यम से यह समझना आसान हो गया है कि बच्चों की रुचियां और कल्पनात्मक दुनिया में कौन-सी चीजें लोकप्रिय हो सकती हैं। जैसे-जैसे इन क्षेत्रों में नए-नए शोध सामने आएंगे, बच्चों पर केंद्रित फिल्में और गति पकड़ेंगी। अभी तक मनोवैज्ञानिक रूप से डर, दोस्ती, पारिवारिक दायरे और संबंधों की दुनिया, खेल, पशुप्रेम, अकेलापन, चमत्कार, जादू, हास्य आदि विषयों का ही दोहन होता रहा है।

यही कारण है कि प्रवृत्तिगत दृष्टि से देखें तो ज्यादातर फिल्मों में यही मौजूद है। पहले व्यावसायिक दृष्टि से बच्चों को सफल उपभोक्ता नहीं माना जाता था। लेकिन हाल के वर्षों में इस दृष्टिकोण में फिल्मकारों में बदलाव आया है। ‘तारे जमीं पर’ की रिकॉर्ड सफलता के बाद बाल-केंद्रित फिल्मों का चलन बढ़ा है। ‘आय ऐम कलाम’, ‘स्टेनली का डिब्बा’, ‘चिल्लर पार्टी’, ‘तहान’, ‘उड़ान’, ‘भूतनाथ’, ‘भूतनाथ रिटर्न्स’, ‘छुटकन की महाभारत’, ‘गट््टू’, ‘लिल्की’, ‘बम बम बोले’, ‘काफल’ जैसी दर्जनों फिल्में बनीं। ‘द ब्लू अमब्रेला’, ‘बाजा’, ‘गोल’, ‘कभी पास कभी फेल’, ‘आबरा का डाबरा’ आदि फिल्में ‘तारे जमीं पर’ के पहले बनीं। इनमें से कई फिल्में व्यावसायिक रूप से सफल हुर्इं, तो कई कलात्मक दृष्टि से। ‘तहान’ फिल्म ‘चिल्लर पार्टी’ या ‘स्टेनली का डिब्बा’ या ‘भूतनाथ’ सफल फिल्में भले न हों, लेकिन इनकी तरह अतियथार्थ, चमत्कारवाद से ग्रस्त नहीं है, बल्कि सेना और आतंकवाद के माहौल में संगीनों के साए में जी रहे कश्मीर और वहां पल रहे बच्चों के यथार्थ को दिखाती है।

मनुष्य के साथ प्रकृति और पशु का जो अभिन्न रिश्ता और प्रेम तपन सिन्हा की फिल्म ‘सफेद हाथी’ में है, वही लगाव, प्रेम और अभिन्नता ‘तहान’ में भी सासें ले रही है। ‘चिल्लर पार्टी’ अतिराजनीतिक (बच्चों की दृष्टि से) वितंडावाद में फंस कर फार्मूलेबद्ध फिल्म बन कर रह जाती है। ‘बूट पॉलिश’ विकासवाद की नेहरुवीयन मॉडल के भीतर आखें खोलती है, तो ‘आबरा का डाबरा’ मनमोहनोमिक्स के भीतर। ‘बूट पॉलिश’ से ‘आबरा का डाबरा’ तक आते-आते निर्देशक-प्रोड्यूसर समझ गए हैं कि फिल्म कलात्मकता, लोकरंजकता से बहुत आगे मुनाफाखोरी का धंधा है। इसलिए फिल्म की स्क्रिप्ट इस ढंग से लिखी जाती है कि वह बच्चे को उपभोक्ता बना देती है। इन फिल्मों के महीन रेशे में मिश्रित अर्थव्यवस्था से नवपूंजीवाद तक के सफर बुने हुए हैं।

‘बम बम बोले’ फिल्म ‘चिल्ड्रेन आॅफ हैवेन’ का एडॉप्टेशन है। माजिद मजीदी ने इसे अपनी बड़ी सोच और अंतर्दृष्टि से विश्व सिनेमा की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया, जबकि प्रियदर्शन ने ‘बम बम बोले’ का अंत करते-करते एडिडॉस जूते के विज्ञापन में बदल दिया। एक बड़ी सोच, अंतर्दृष्टि और महान विचार को हिंदी फिल्मों की व्यावसायिक बुद्धि हास्यास्पद और फूहड़ स्थिति में ले जाकर खड़ा कर रही है। ‘बूट पॉलिश’ ने जिस अंतर्दृष्टि को जन्म दिया था, वह या तो दम तोड़ रही है या उसकी हल्की पैरोडी होकर रह गई। ‘आय ऐम कलाम’ का अंत भी स्कूल के दरवाजे में प्रवेश करने पर होता है और ‘बूट पॉलिश’ का भी। उच्च वर्ग द्वारा वहां भी बच्चे को अपनाया जाता है, यहां भी। हृदय परिवर्तन वहां भी है, यहां भी। फिल्म का यथार्थवादी खांचा, आदर्शवादी खांचे में शिफ्ट वहां भी करता है, यहां भी।

लेकिन ‘बूट पॉलिश’ के लिए आवश्यक कच्चा माल और सिलसिलेवार तर्क हैं, लेकिन ‘आय ऐम कलाम’ के लिए? बल्कि यह चमकदार आदर्श ऊपर से चिपका दिया गया लगता है। ‘बूट पॉलिश’ और ‘हम पंछी एक डाल के’ फिल्म में आजाद भारत के सपने हैं। दोनों ही फिल्मों में गांधी और नेहरू के विचारों को सेल्यूलॉयड पर उतारने की कोशिश हुई है। ‘कर्म सौंदर्य’ की स्थापना दोनों में है। ‘बूट पॉलिश’ मृत्यु का प्रतिकार करती, जिंदगी के स्वीकार के महाआख्यान में तब्दील होती है। यह दया और भीख के खिलाफ अनवरत व्यूह रचती है। असुरक्षा, असहायता, परिस्थितियों की प्रतिकूलता, बारिश के मौसम की मार से जीने की आखिरी उम्मीद ‘बूट पॉलिश’ के धंधे बंद हो जाने के बाबजूद, भूख से बिलबिलाते, दुनिया के प्रेम से वंचित दो मासूम बच्चे, एक-दूसरे को दिलासा देते हुए जीवन जीने का संघर्ष करते हैं।

जितनी उम्मीदें ‘बूट पॉलिश’ जगाती है, उतनी ही ‘हम पंछी एक डाल के’। ‘हम पंछी एक डाल के’ अमीरी-गरीबी की खाई को समतल कर देती है। उच्च वर्ग में पैदा हुआ बच्चा, जिसे बार-बार निम्न वर्ग के अन्य बच्चों से अलग रखने की कोशिश की जाती है, बार-बार उस संभ्रांतता के दायरे से छिटक कर उसमें शामिल हो जाता है। बीमार-बिस्तर पर पड़े अपने उस दोस्त का अखबार ‘नया जमाना’ बेचता है, जिसके हाथ में चोट लगी है। यह ‘नया जमाना’ नए और बदले हुए हिंदुस्तान का रूपक है। ग्रामीण हिंदुस्तान में जनचेतना जगाती, नहरों-बांधों, खेत-खलिहानों, कल-कारखानों को नए मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे का दर्जा देती यह फिल्म गांधी-नेहरू के विचारों का हिंदुस्तान है। आदर्श, नैतिकता और सच्चाई आज के फिल्मों में भी बच्चों के मुंह से कहलवाई गई है, लेकिन मुनाफाई दृष्टि, हास्य, अतिमनोरंजकता, अतिनाटकीयता ने उसे ढक लिया है।

 

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First Published on March 26, 2017 5:53 am

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