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तीरंदाज- डोकलाम की बिसात

यह स्वाभाविक है कि लद्दाख में घुसपैठ की कोशिश के बाद वह डोकलाम जैसे संवेदनशील इलाके में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगा और एक तरह से भारत की कूटनीति और सैन्य संकल्प की परीक्षा लेगा।
चीन, भूटान व भारत की सीमा डोकलाम में मिलती है।

भारत-चीन-भूटान के तिराहे पर स्थित डोकलाम भारत की विदेश नीति का एक ऐतिहासिक मोड़ होने जा रहा है। तकनीकी दृष्टि से डोकलाम भूटान में है और इस भूभाग को लेकर चीन का विवाद भूटान से है, पर यह छोटा-सा इलाका सामरिक हितों के मद्देनजर भारत के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। चीन ने कुछ हफ्ते पहले जब यहां शुरुआती घुसपैठ की कोशिश की, तो उसको शायद अंदाजा नहीं था कि भारत इस मुद्दे को तूल देगा। वह मान कर चल रहा था कि भारत कुछ कूटनीतिक माध्यमों से अपना विरोध जताएगा, बातचीत की पेशकश होगी और इस लंबी प्रक्रिया के चलते चीन न सिर्फ अपना कब्जा बनाए रखेगा, बल्कि उसको और मजबूत कर लेगा। 1950 से लेकर अब तक ऐसा ही होता आया है। वास्तव में 1950 की तुलना में चीन आज ज्यादा मजबूत स्थिति में है। उसकी आर्थिक और रक्षा व्यवस्था पिछले सत्तर साल में इस स्तर तक पहुंच गई है कि वह अमेरिका और रूस को कारगर चुनौती दे सकता है। ऐसे हालात के चलते यह स्वाभाविक है कि लद्दाख में घुसपैठ की कोशिश के बाद वह डोकलाम जैसे संवेदनशील इलाके में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगा और एक तरह से भारत की कूटनीति और सैन्य संकल्प की परीक्षा लेगा।

चीन की चाल का जिस तरह भारत जवाब दे रहा है, उससे साफ संकेत मिलते हैं कि डोकलाम का मोड़ उसकी विदेश नीति के नए परिवर्तनात्मक अभिनव दौर की शुरुआत है। नरेंद्र मोदी सरकार आने तक भारत की विदेश नीति का आधार विश्व में न्यायसंगत और न्यायसम्मत व्यवस्था बनाना था। जवाहरलाल नेहरू ने इस आदर्शवादी नीति की नींव रखी थी और इसके चलते पंचशील और गुट निरपेक्ष के सिद्धांतों पर उन्होंने बड़ी संजीदगी से अमल किया था। नेहरू को सफलता मिली भी- गुटनिरपेक्ष के सिद्धांतों ने बड़े आंदोलन का रूप लिया था, पर चीन से वे धोखा खा गए। नेहरू ने विदेश नीति का जो रास्ता चुना, वह भारत की तत्कालीन हकीकत पर आधारित था। भारत तभी स्वतंत्र हुआ था, विभाजन की विभिषिकाओं से जूझ रहा था, आर्थिक विषमताएं मुंह बाए खड़ी थीं और सैन्य बल अभावों से घिरा था। ऐसे में कूटनीति आदर्शवादी सिद्धांतों पर ही हो सकती थी। चीन से 1962 में शिकस्त इस बात का सबूत है कि भारत की कूटनीति के पीछे सैनिक और आर्थिक बल नहीं था और न ही रणनीतिक सोच थी। वह सिर्फ आशा पर टिकी थी।  1962 के तीन साल बाद ही 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय ने सैन्य साहस और बल की स्थापना तो जरूर की थी, पर भारत अंतरराष्ट्रीय दबाव से नहीं बच पाया था। ताशकंद समझौता उन्हीं दबावों के तहत हुआ था। पर छह साल बाद ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैन्य पराक्रम को कूटनीति से सफलता पूर्वक जोड़ कर पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे। उन्होंने अमेरिका की धमकियों की परवाह नहीं की थी और अपने तरीके से राजनीतिक लक्ष्य हासिल किया था। पोकरण परमाणु परीक्षण भारत को सैन्य शक्ति के रूप में विश्व मंच पर स्थापित करने में एक बड़ा कदम था।
पर 1974 के बाद भारत की कूटनीति आलसी ढर्रे पर चल निकली, जिसमें आसान आदर्शवाद और आशावाद फिर से हावी हो गए थे। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा (1999), उसके तुरंत बाद करगिल युद्ध और फिर पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की आगरा यात्रा (2001) से भारत को कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

पर अस्सी के दशक के मध्य से लेकर 2010 तक, खासकर 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद, भारत ने तेजी से आर्थिक प्रगति की और चीन के लगभग समांतर पहुंच गया। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्थिति बन गई कि वे कूटनीति को सैन्य और आर्थिक बल से जोड़ कर भारत को विश्व मंच पर अपनी निश्चित जगह दिलाने के लिए सक्रिय प्रयास करे। शायद इसीलिए उन्होंने पदभार संभालते ही दुनिया के बड़े मुल्कों की यात्राएं की और वहां के राष्ट्राध्यक्षों से नजदीकी रिश्ते बनाए हैं। वास्तव में, भारत के वैश्विक नजरिए में बदलाव का संकेत मोदी ने पहले दिन से ही दे दिया था, जब उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी आए और वहीं से भारत-पाक संबंधों का वह सिला शुरू हुआ था, जिसमें पाकिस्तानी फौज और चुनी हुई सरकार के बीच फासला बनाने की शरीफ की कोशिश को भारत ने मूक समर्थन दिया था। नरेंद्र मोदी की औंचक पाकिस्तान यात्रा (25 दिसंबर, 2015) शायद उसी समर्थन का हिस्सा थी, जिससे वहां की फौज सकते में आ गई थी। कूटनीतिक स्तर पर पिछले सालों में भारत परोक्ष रूप से नवाज शरीफ सरकार की हौसला अफजाई करता रहा है, जिससे वह फौज की महत्त्वकांक्षा पर अंकुश लगा सके और भारत से संबंध बेहतर करने की स्थिति में आ सके। पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने अभी नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते पद से हटने पर मजबूर तो कर दिया, पर इससे सिविल-मिलिट्री दरार और चौड़ी हो गई है। यह भारत के लिए अल्प और दीर्घ काल में फायदेमंद साबित हो सकती है। कश्मीर में धर-पकड़ इसी फायदे की ओर इशारा करती है।

चीन के प्रति भारत के रवैए में भी मूलभूत परिवर्तन आया है। आर्थिक कूटनीति के अंतर्गत उसने चीन की वन बेल्ट वन रोड महायोजना से अपने हाथ खींच लिए हैं। चीन को विश्वास था कि वह भारत पर दबाव बना कर इस योजना में शामिल होने के लिए मजबूर कर देगा। पर तमाम कोशिशों के बावजूद जब ऐसा नहीं हुआ तो उसने बल प्रयोग की ठानी है। पिछले साल से ही उसके सैनिक लद्दाख, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में हरकत में हैं और एक के बाद एक सीमा विवाद उठाने की कोशिश कर रहे हैं। डोकलाम चीन की धमकाने की रणनीति का हिस्सा है, जिसका जवाब भारत पूरी बराबरी से दे रहा है। अगर देखा जाए तो डोकलाम विश्व कूटनीति के एक बहुत नाजुक दौर में हो रहा है। चीन की विस्तारवादी हरकतों से अमेरिका, जापान, रूस और कई दक्षिण पूर्व एशिया के देश त्रस्त हैं। उत्तर कोरिया आक्रामक तेवर दिखा रहा है, जिससे विश्व शांति को सीधा खतरा है। चीन और कोरिया के खिलाफ लामबंद देशों में भारत ने अपनी बड़ी और सक्रिय भूमिका बना ली है, जिसमें चीन पर विश्व स्तर पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया तभी कारगर होगी जब डोकलाम में भारत चीन को बराबरी से चुनौती देने में सफल होगा। इस बाजी में दुनिया के कई शक्तिशाली देशों की हिस्सेदारी भारत ने उपलब्ध कर ली है। दरअसल, डोकलाम एक यथार्थवादी, पर साहसिक कूटनीतिक मोड़ है, जिस पर भारत अपने मजबूत आर्थिक और सैन्य पैरों पर खड़ा है। यह कदम भारत के आत्मविश्वास को परिभाषित करता है, जिससे वह अपने विश्व शक्ति होने को जाहिर कर रहा है। इसकी सफलता भारत की विदेश नीति को नई ऊंचाई दे सकती है।

 

 

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