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निजता का आधार

इधर नौकरी-पेशा होने के नाते पिछले वर्षों में कई पहचान पत्र अलग-अलग संस्थाओं ने बनवा कर दिए हैं, जिनको मशीन पर चिपकाने से कई दरवाजे खुलते रहे हैं। शक्ल से अब कोई नहीं पहचानता है, कार्ड के बिना आप अपनों में भी पराए हैं।
विशिष्ट पहचान संख्या या आधार कार्ड।

मेरे पास आधार कार्ड नहीं है। मैं बनवाना भी नहीं चाहता हंू। मेरा उससे कोई विशेष विरोध नहीं है, पर बनवा नहीं रहा हंू, क्योंकि मैं थक गया हंू।
मेरे पास पहले सिर्फ राशन कार्ड था। वही काफी था रोजमर्रा की जिंदगी चलाने के लिए। फिर विदेश जाना पड़ा तो अपनी राष्ट्रीय पहचान दिखाने के लिए पासपोर्ट बनवाया। वहां से निपटा तो बताया गया कि अब वित्तीय पहचान बनाना जरूरी हो गया है। सो, पैन कार्ड का फॉर्म भरने में लग गया। इस बीच बैंकों ने केवाईसी (नो योर कस्टमर) लागू कर दिया। मैंने अपनी ‘बैंक पहचान’ भी बनवा ली। ड्राईवर न रखने का फैसला किया, तो वाहन चालक होने की पहचान भी बनवाई। और हां, वोटर पहचान बनवाना तो बहुत जरूरी था। आखिरकार, लोकतंत्र के सिपाही के नाते इतना हथियारबंद होना तो लाजमी था।
इधर नौकरी-पेशा होने के नाते पिछले वर्षों में कई पहचान पत्र अलग-अलग संस्थाओं ने बनवा कर दिए हैं, जिनको मशीन पर चिपकाने से कई दरवाजे खुलते रहे हैं। शक्ल से अब कोई नहीं पहचानता है, कार्ड के बिना आप अपनों में भी पराए हैं।

अभी हाल ही में घर बदला। सोसाइटी के अफसरों ने सारे कार्ड दरकिनार कर के आदेश दिया कि फ्लैट पुलिस वेरिफिकेशन के बाद ही किराए पर मिलेगा। उन्होंने कहा पासपोर्ट आदि का उनसे कोई मतलब नहीं है, जिसमें वेरिफिकेशन हो चुका है। चरित्र पर असली मोहर तो मोहल्ले के थानेदार जी ही लगाएंगे। रेंट अग्रीमेंट लेकर जब आधार कार्ड बनवाने पहुंचे तो उन्होंने मना कर दिया। आपका यह एड्रेस प्रूफ नहीं माना जा सकता। बैंक की पासबुक पर फोटो चिपका कर मोहर लगवाओ, जिसमें नया पता हो। बैंक ने कहा, बहुत अरसे से आपका केवाईसी नहीं हुआ, करवा लीजिए- आधार कार्ड है?

उधर पैन को आधार से जोड़ना है, आधार को बैंक अकाउंट से, फोन को भी आधार से और उसके बाद ही उस सफर पर हम निकल सकेंगे, जिसका टिकट बे-आधार नहीं होगा। मतलब हमारी हर नित्य क्रिया का ठोस आधार होगा- मरते-मरते भी हम आधारभूत चिह्न छोड़ जाएंगे। मुखाग्नि की क्रिया का आधार हमारे कभी जिंदा होने का सबूत देगा। जैसा मैंने पहले कहा है, आधार या किसी भी कार्ड से मुझे कोई समस्या नहीं है। यह एक सुविचार है। हर समाज का और हर सामाजिक प्राणी का कोई न कोई आधार तो होना ही चाहिए। निजता जब तक सार्वजनिक न हो, तब तक समाज और सरकार आपकी पहचान कैसे करेगा? पर अब मैं थक गया हंू अपनी पहचान बनवाते-बनवाते और उसको हर दरोगा के आगे साबित करते-करते। न जाने कितने फोटो लगा कर हमने सरकारी मोहरें लगवाई हैं और फिर भी पहचान आज तक पुख्ता नहीं हो पाई है। यह फैसला नहीं हो पा रहा है कि मैं कौन हंू और कहां रहता हंू। मैं असली हंू या नकली।

‘तू कौन?’ की गंभीर तहकीकात में निजी संस्थाएं भी लगी हैं। अपने को निजी कहती हैं, पर उनको दूसरे की निजता से कोई लेना-देना नहीं है। वास्तव में निजता को खंगालना व्यावासिक मुनाफे का नया संसाधन बन गया है। आप कब सोते हैं, कब उठते हैं, क्या खाते-पहनते, सोचते हैं आदि जानने के लिए आनलाइन और आफलाइन तमाम ऐसे हथकंडे सृजित किए जा रहे हैं, जिनसे हर व्यक्ति के हलक में अंगुली डाल कर उसकी निजता को आखिरी कण तक उगलवाया जा सके और फिर उसकी निजता को बाजार की नाली में बहाया जा सके। वैसे अगर देखा जाए तो हिंदुस्तान में निजता की अवधारणा ही नहीं है। हम शौच भी खुले में करना पसंद करते हैं। खाना-पीना साझा चूल्हा है। रीति-रिवाज, त्योहार, मोहल्ले-टोलों में सामूहिक तरीके से मनाते हैं। शादी-ब्याह भी सड़क घेर कर करते हैं और पड़ोसी के घर की हर हलचल फौरन से पेश्तर हम तक पहुंचती है।

हम कौमी जिंदगी जरूर जीते हैं, पर अपने अलग-अलग तरीकों से। कोई उस पर अपना नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाया है और न ही उसका संचालन अपने हाथों में ले पाया है। एक तरह से अपनी विशिष्ट जीवन शैली चुनने का अधिकार हमारे मानस में निहित हो गया है। इसी को हम अपनी निजता कहते हैं, जो कि सार्वजनिक होने के साथ-साथ बहुत ही व्यक्तिगत भी है। वास्तव में आधार कार्ड का मुद्दा कोई मुद्दा नहीं है। अगर एक और कार्ड बन गया तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला है। फोटो तो हम ऐसे भी बहुत खिंचा चुके हैं, अब पंजों के निशान भी दे देंगे, आखों का स्कैन भी करा लेंगे और अपनी नागरिक, वित्तीय, कानूनी आदि पहचान को एक-दूसरे से जोड़ भी देंगे, जिससे देखने वाला हमें एक नजर में पूरा पहचान कर ले और हमारी जिंदगी का हर कोना टटोल ले। इसमें कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि मेरे जैसे लगभग सभी नागरिकों की जिंदगी एक खुली किताब है। पैन नंबर से पहले पहचान धर्म, जाति, गोत्र, क्षेत्र, शहर और वंशावली से होती थी और आज भी यह पहचान सबसे कारगर है।

असल मुद्दा पहचान के जरिए नियंत्रण का है। निजता पर नियंत्रण का है। शरीर के जरिए रूह को स्कैन से बचाने का है। किस जीवन शैली का चुनाव हम कैसे करते हैं, उसकी प्रक्रिया को बचाने का है। यह चुनाव व्यक्तिगत भी हो सकता है, सामाजिक भी, संस्थागत और राजनीतिक भी। इन सभी क्षेत्रों में चुनाव करने की क्षमता और स्वतंत्रता हमारे देश में निजता को परिभाषित करते हैं। हिंदुस्तान की यह अनूठी पद्धति और संस्कृति है, जो दुनिया के अधिकतर देशों से नदारद है। आज की दुनिया में बहुत सी वजहों से कार्ड जरूरी है। कार्ड बहुत सारी सुविधाएं उपलब्ध करा सकता है और व्यवस्था को सुचारू रूप से चला सकता है। वह हमारे सार्वजनिक जीवन की प्रभावी पृष्ठभूमि बन कर उसको सरल कर सकता है।

पर वह निजी जीवन का नियंत्रक नहीं बन सकता है। उससे ऐसी स्थिति नहीं उत्पन्न होनी चाहिए, जिसमे कोई भी प्रशासनिक अधिकारी भेदभाव के तहत किसी का हुक्का-पानी बंद करने में सक्षम हो जाए। वास्तव में निजता हमारे लिए एक ऐसी अद्भुत जीवन शैली है, जिसमें सूरदास कृष्ण को बालसखा की तरह चुनते हैं, तो बिहारी उनके शृंगार रूप से अटखेली करते हैं। वाल्मीकि राम को राजा राम कहते हैं, तो तुलसीदास के लिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं। हमने अनंत काल से रूप और प्रकार का चुनाव निज बुद्धि और प्रेम भाव पर छोड़ा है, जिसमे बाहरी हस्तक्षेप मान्य नहीं है। ऐसे में निजता सिर्फ संवैधानिक मुद्दा नहीं है। यह उससे भी बड़ा सांस्कृतिक धरोहर का मसला है, जिसमे भारत की आत्मा रचती-बसती है। इस धरोहर को हमें उजड़ने नहीं देना चाहिए।

 

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