ताज़ा खबर
 

वक्त की नब्ज- सिर्फ नसीहत से कुछ नहीं होगा

गोरक्षा के नाम पर हिंसा रोकना मुश्किल होगा अब, क्योंकि आज के ‘नए भारत’ में इस तरह की हिंसा को देशभक्ति माना जाता है।
Author July 2, 2017 09:58 am
साबरमती आश्रम में पीएम मोदी। (Source: PTI)

साबरमती आश्रम में पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री मोदी ने गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा की सख्त निंदा की। स्पष्ट शब्दों में उन्होंने कहा कि गोरक्षा के बहाने इंसानों की जान लेना गोरक्षा नहीं माना जा सकता। हिंसा से कुछ अच्छा नहीं हो सकता, मोदी ने कहा, लेकिन सवाल है कि क्या उनके इस भाषण के बाद गोरक्षा के नाम पर हिंसा रुक जाएगी? मैं उनमें से हूं जिन्होंने बहुत बार लिखा है कि अगर प्रधानमंत्री ने मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद आवाज उठाई होती, तो शायद गोरक्षक इतने बेकाबू न होते जो आज हो गए हैं। लेकिन आज मुझे ऐसा लगता है कि गोरक्षा के नाम पर हिंसा रोकना मुश्किल होगा अब, क्योंकि आज के ‘नए भारत’ में इस तरह की हिंसा को देशभक्ति माना जाता है। हिंदुत्व के समर्थक उनकी नजर में गोरक्षक हत्यारे नहीं, देशभक्त हैं। प्रधानमंत्री ने साबरमती आश्रम को चुना अपनी बात कहने के लिए यह सोच कर कि बापू का नाम लेने से असर ज्यादा होगा उनकी बात का, लेकिन प्रधानमंत्री शायद जानते नहीं हैं कि आज के नए भारत में गांधीजी हीरो नहीं हैं। प्रधानमंत्री के भाषण के फौरन बाद सोशल मीडिया पर हिंदुत्ववादियों का हल्ला शुरू हो गया, जिसका मुख्य संदेश था कि गांधीजी के जमाने में भारत ‘नपुंसक’ देश था, जो अब नहीं है। कई लोगों ने प्रधानमंत्री की आलोचना भी की यह कह कर कि जिस अहिंसा के महात्मा का वह इतना सम्मान से नाम ले रहे थे, उन्होंने चुपचाप लाखों हिंदुओं का कत्लेआम होने दिया देश के बंटवारे के समय।

प्रधानमंत्री अपना भाषण दे ही रहे थे कि झारखंड से खबर आई एक नई हत्या की। गोरक्षकों ने अलीमदीन अंसारी नाम के एक व्यक्ति को उसकी गाड़ी से निकाल कर सिर्फ इसलिए जान से मारा, क्योंकि उसकी गाड़ी में मांस पाया गया था। अंसारी के हत्यारों ने उसकी हत्या का गर्व से वीडियो बनाया, जिसमें उसके आखिरी क्षणों को पूरी तरह कैमरे में कैद किया गया। जान से मारने के बाद अंसारी की गाड़ी को जला दिया गया, सो हम कभी नहीं जान पाएंगे कि उसमें गोश्त किसका था। यह सब काम इन गोरक्षकों ने आराम से किया, जैसे कि उनको न कानून का कोई डर था और न पुलिस के आने का।प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि किसी को अधिकार नहीं होना चाहिए कानून को अपने हाथों में लेने का, सो अब उनको तहकीकात करानी चाहिए कि कानून व्यवस्था क्यों इतनी कमजोर है कि गोरक्षक खुलेआम हत्याएं करते फिर रहे हैं। यह भी मालूम करना चाहिए उन्हें कि इस तरह की हत्याएं क्यों उन राज्यों में ज्यादा हो रही हैं जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। क्या गोरक्षकों को इन राज्यों में राजनीतिक शरण मिलती है? क्या उनको मालूम है कि गिरफ्तार होते भी हैं अगर तो उनको बाद में छोड़ दिया जाएगा चुपके से, जब मीडियावाले चले जाएंगे?

यथार्थ यह है कि अपने देश में हिंसा जब राजनीतिक रूप धारण कर लेती है तो उसको कोई रोकता नहीं है। यही कारण है कि सांप्रदायिक दंगों के बाद बहुत कम लोग पकड़े जाते हैं। आज तक हम नहीं जानते कि 1984 में सिखों के कत्लेआम में शामिल कौन थे। कुछ एक लोगों की गिरफ्तारियां जरूर हुर्इं, लेकिन आज तक न कोई दंडित हुआ है और न ही भविष्य में न्याय की कोई उम्मीद है। एक समय था, जब भारत में हर साल कोई बड़ा दंगा होता था। सूची लंबी है इन दंगों की- मेरठ, मलियाना, भागलपुर, मुंबई, मुरादाबाद- लेकिन न्याय अगर हुआ है किसी बड़े दंगे के बाद तो सिर्फ गुजरात में उस 2002 वाले दंगे के बाद, जिसकी वजह से मोदी बदनाम हुए। इस दंगे के बाद भी शायद न्याय न होता, अगर सप्रीम कोर्ट ने दखल न दिया होता।कहने का मतलब यह कि जब राजनीतिक पोशाक पहन लेते हैं हत्यारे, तो अक्सर उनको ताकतवर राजनेताओं की शरण मिलती है। गोरक्षकों को भी इस तरह की राजनीतिक शरण मिल रही है कहीं से। सो, प्रधानमंत्रीजी अगर आप वास्तव में ऐसी हिंसा को रोकना चाहते हैं, तो अपने मुख्यमंत्रियों को बुला कर पूछिए कि उनके राज्यों में गोरक्षकों के हाथों मुसलमान क्यों ज्यादा मारे जा रहे हैं? इन दिनों मैं जब भी किसी नए शहर में जाती हूं, वहां की बड़ी मस्जिद के आसपास जो मुसलिम मोहल्ले हैं, वहां आम मुसलमानों से बातें करती हूं। इन बातों से मालूम यह हुआ है कि न सिर्फ खौफ का माहौल है लोगों में, उनको यह भी डर है कि गोरक्षकों का असली मकसद है गरीब मुसलमानों की रोजी-रोटी के तमाम साधन तबाह करना।

उनका कहना है कि कई कारोबार बंद हो गए हैं। चमड़े का कारोबार तकरीबन बंद हो गया है, मांस के कारखाने बंद हो गए हैं काफी हद तक और मुसलिम किसान अब गाय-भैंसों को खरीदने नहीं जाते हैं मंडियों से, क्योंकि गोरक्षकों का इतना भय है। यह सब ऐसे कारोबार हैं, जिन पर रोजगार के लिए निर्भर हैं गरीब मुसलमान और गरीब दलित। ये ऐसे लोग हैं, जिनको वैसे भी रोजगार के अवसर कम मिलते हैं, क्योंकि अक्सर ये अनपढ़ होते हैं।प्रधानमंत्री शायद जानते हैं कि इन अति-कमजोर वर्गों को कितने मुश्किल दौर से गुजरना पड़ रहा है और शायद इसलिए उन्होंने पिछले हफ्ते गोरक्षकों को चेतावनी दी थी। लेकिन उनके इस एक भाषण से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। गोरक्षकों की हिंसा को अगर वास्तव में रोकना चाहते हैं मोदी, तो उनको साबित करना होगा कि जो लोग कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं उनको कड़ी से कड़ी सजाएं होंगी। क्या ऐसा कर सकते हैं?

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग