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वक्त की नब्ज: नरेंद्र मोदी का जादू!

मेरा मानना है कि दोष हमारे तमाम विपक्ष के ‘सेक्युलर’ राजनेताओं का है।
Author April 30, 2017 04:04 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (PTI Photo)

नरेंद्र मोदी का जादू क्या है? पूरी गंभीरता से इस सवाल को हम राजनीतिक पंडित पूछ रहे हैं इन दिनों। इसलिए कि हमने तय कर लिया है कि भारतीय जनता पार्टी लगातार चुनाव नहीं जीत रही है, मोदी जीत रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चुनावों में अगर मोदी, मोदी, मोदी का नारा लगा हर आमसभा में तो आश्चर्य की बात नहीं, लेकिन दिल्ली में भी नगर निगम चुनावों में वोट पड़ा है मोदी के नाम पर। ऐसा हुआ बावजूद इसके कि एक दशक तक नगर निगम पर भाजपा का कब्जा रहा है और इस महानगर के लोग जानते हैं अच्छी तरह कि कितनी रद्दी आम सेवाएं उपलब्द हैं दिल्ली में। सो, अगर एक बार फिर दिल्ली वालों ने भाजपा को मौका दिया है, तो सिर्फ मोदी के नाम पर। हां, कुछ मदद अरविंद केजरीवाल ने जरूर की थी मतदाताओं को धमका कर, लेकिन शायद मोदी के नाम पर वोट फिर भी पड़ता। सो, क्या मोदी वास्तव में जादूगर हैं या यथार्थ यह है कि विपक्ष में अब दम नहीं रहा?
मेरा मानना है कि दोष हमारे तमाम विपक्ष के ‘सेक्युलर’ राजनेताओं का है। मोदी राज में इन्होंने इतना भी नहीं किया कि मोदी की कमजोरियों का लाभ उठाएं। मोदी की सबसे बड़ी कमजोरी है कि उनकी छत्रछाया में कुछ ऐसी संस्थाएं फल-फूल रही हैं, जो हिंदुत्व के नाम पर दाग हैं, लेकिन इनको प्रधानमंत्री रोक नहीं पा रहे हैं, क्योंकि इनका गहरा रिश्ता है संघ के साथ और संघ के खिलाफ मोदी विद्रोह नहीं कर सकते। एक ही बार बोले हैं पिछले तीन वर्षों में गोरक्षकों के खिलाफ, वह भी मोहम्मद अखलाक की हत्या के कई महीने बाद।
पहलू खान की हत्या सरेआम की गई थी अलवर जिले में एक भाजपा मुख्यमंत्री के तहत। इस हत्या का वीडिओ दुनिया भर में लोगों ने देखा और बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय अखबारों ने इस हत्या की निंदा की, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री अभी तक चुप हैं। इस चुप्पी को मुद्दा बना सकते थे विपक्ष के राजनेता, लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं किया। हाल में जब सोनिया गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रपति भवन पहुंचे कांग्रेस के वरिष्ठ राजनेता तो वोटिंग मशीनों की शिकायत करने। क्या उन्होंने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि उन्हीं मशीनों से पंजाब में कांग्रेस की जीत हुई इस बार?

पिछले कुछ महीनों में एक ही बार विपक्ष हरकत में आया था और उसका कारण था नोटबंदी। बड़े-बड़े जलसे किए राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी ने दिल्ली में और इन जलसों में पूरी कोशिश की इस बात को साबित करने की कि नोटबंदी द्वारा मोदी गरीबों का पैसा लूट कर अपने उद्योगपति दोस्तों को दे रहे हैं। इसी मुद्दे को उत्तर प्रदेश के चुनावों में खूब उछाला गया, लेकिन विपक्ष के राजनेताओं और जनता के बीच दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि वे इतना भी नहीं समझ सके कि नोटबंदी को जनता का समर्थन था। ढिंढोरा पीटते रहे नोटबंदी के विरोध में और मतदाताओं पर असर सिर्फ यह हुआ कि मोदी के नाम पर और वोट पड़े। ऐसा हुआ तो उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने हार स्वीकार करते हुए कहा कि लोगों ने उनके काम पर वोट नहीं दिया है, उस सपने को देख कर वोट डाला, जो मोदी उनको दिखा रहे थे। सपना ही सही, लेकिन मोदी सपना दिखाने की कम से कम हिम्मत कर रहे हैं ऐसे लोगों को, जिनका यथार्थ है गुरबत और बेरोजगारी। परिवर्तन और विकास इन लोगों के लिए महज शब्द नहीं, एक लक्ष्य है। वे जानते हैं कि परिवर्तन और विकास आसानी से हासिल नहीं होंगे उन्हें, लेकिन उनको विश्वास है कि मोदी इन चीजों को लाना चाहते हैं। विश्वास यह भी है उन्हें कि मोदी जो भी कर रहे हैं, देश के लिए कर रहे हैं, अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं। दूसरी तरफ हैं ऐसे राजनेता, जिन्होंने जाति-धर्म को इस्तेमाल किया है कई बार चुनाव के समय और चुनाव के बाद उनको याद रहा है सिर्फ अपना परिवार। ऐसा नहीं कि परिवारवाद उनको भारतीय जनता पार्टी में नहीं दिखता, लेकिन मोदी में नहीं दिखता, सो मोदी को आम मतदाता एक अलग किस्म का राजनेता मानने लगे हैं।

ऐसे राजनेता का मुकाबला करना कठिन है, लेकिन विपक्ष की तरफ से कोशिश भी नहीं दिख रही है अभी तक। और जब भी कोशिश करते हैं मोदी का मुकाबला करने की, तो ऐसे मुद्दे उठाते हैं, जो बिल्कुल बेमतलब हैं। सो, राहुल गांधी ने एक बार किसी कॉलेज के छात्रों के सामने स्वच्छ भारत अभियान की निंदा की, तो छात्रों ने उनसे पूछा कि क्या आप नहीं चाहते कि भारत में स्वच्छता हो? जब खूब हल्ला किया छात्रों ने तो कांग्रेस उपाध्यक्ष ने मुस्करा कर विषय बदल डाला। हर चुनाव के बाद विपक्षी दल इकट्ठा होकर ऐलान करते हैं कि 2019 से पहले वे महगठबंधन बनाएंगे मोदी को हराने के लिए। अच्छी बात है अगर ऐसा हो, लेकिन इस गठबंधन के विचार क्या होंगे, इस पर अभी तक किसी ने कुछ नहीं कहा है। मोदी को हराना है तो उनके राजनीतिक और आर्थिक विचारों का विरोध करना होगा। अभी तक जितना विरोध हुआ है वह प्रधानमंत्री का हुआ है व्यक्तिगत तौर पर, जो काफी नहीं है, क्योंकि किसी लोकप्रिय, ताकतवर राजनेता को जनता की नजरों में नीचा दिखाने की कोशिश अक्सर नाकाम होती है। लगता है कि हमारे सारे विपक्षी राजनेता भूल गए हैं कि व्यक्तिगत हमलों का किस तरह इंदिरा गांधी ने लाभ उठाया था। ऐसा ही कुछ हो रहा है इन दिनों मोदी के साथ। विपक्ष बार-बार चुनाव हार रहा है अपनी नासमझी के कारण।

 

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