February 26, 2017

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वक्त की नब्ज कॉलम में तवलीन सिंह का लेख: बदहाली के गांव

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मनरेगा जैसी योजनाओं को बेकार बताया, लेकिन उसके बाद इन्हीं योजनाओं पर फिर से निवेश किया गया।

Author February 5, 2017 11:46 am
गांवों के लोग। (Photo-Indian Express)

पहले सुनिए इस गांव का हाल, फिर आप ही बताइए कि गरीबी हटाने के तरीकों में परिवर्तन लाने की जरूरत है कि नहीं। जिस गांव का हाल मैं बताने जा रही हूं, वह उत्तर प्रदेश में है। हालांकि भारत के देहातों में हजारों गांवों का यही हाल है, सो इस गांव को मैं बेनाम ही रखूंगी। यहां जाना हुआ पिछले हफ्ते इसलिए कि दिल्ली में राकेश नाम का मेरा एक जानकार है, जो बहुत दिनों से मुझे अपने गांव ले जाना चाहता था, सो चुनावों के इस मौसम में मैंने जाना मुनासिब समझा। राकेश का मकसद था मुझे यह दिखाना कि उसके गांव में हालात दशकों से सुधरे नहीं हैं, बावजूद इसके कि जो भी यहां के लोगों से वोट मांगने आता है विकास का वादा करके जाता है। राकेश के शब्दों में, ‘अपने विधायक को हमने पिछले पांच वर्षों में एक बार नहीं देखा है, लेकिन अब चूंकि चुनाव फिर आ गए हैं, वह शायद आएगा फिर से वोट मांगने।’ यह शिकायत भी तकरीबन हर राज्य में, हर गांव में सुनने को मिलती है।

राकेश के गांव तक पक्की सड़क नहीं जाती। सो, काफी दूर हमको धूल फांकनी पड़ी एक टूटी, कच्ची सड़क पर, जिसके अंत में हमने हरियाली भरे खेतों के बीच कुछ अधकच्चे मकान देखे। गांव के अंदर दाखिल होते ही वही नजारे देखने को मिले, जो भारत के देहातों में अक्सर दिखते हैं- गंदी नालियां, जिनके पानी से औरतें बर्तन धो रही थीं, बच्चे नंगे पांव घूमते हुए और जगह-जगह गंदगी के ढेर और आवारा, लाचार जानवर। राकेश के घर के सामने गांव के कुछ बुजुर्ग और बुद्धिजीवी एकत्रित हुए थे, जिन्होंने गांव का हाल मुझे सुनाया। बिजली अठारह घंटे आती है, लेकिन अपनी मर्जी से, सो ठंडी रातों में किसान अपने खेतों में पानी देने पर मजबूर हैं। पीने का पानी मिलता है हैंडपंपों से और स्वच्छ भारत अभियान का अभी तक कोई असर नहीं पड़ा है यहां, सो नब्बे फीसद गांववासी खुले में शौच करते हैं।

मनरेगा पहुंच चुका है, लेकिन इसका पैसा गरीबों को नहीं, सरपंच के दोस्तों और रिश्तेदारों को मिलता है। पेंशन योजना भी है, लेकिन बुजुर्गों को पेंशन का पैसा अक्सर नहीं मिलता और ज्यादातर ऐसे हाल में हैं कि जाकर अपना हक मांगने के काबिल नहीं। बूढ़ी महिलाओं का सबसे बुरा हाल है, क्योंकि उनके बच्चे शहरों में चले गए हैं रोजगार की खोज में, सो उनको निर्भर रहना पड़ता है गांववालों की खैरात पर। सड़कें चूंकि कच्ची हैं, न अधिकारी आते हैं लोगों का हाल जानने और न राजनेता। चुनाव के समय जब आम सभाएं होती हैं बड़े राजनेताओं की, तो गांव से काफी दूर। कहने का मतलब यह कि जिस ग्रामीण विकास पर इस देश के करदाताओं का पैसा खर्च किया गया है दशकों से, वह तकरीबन पूरी तरह जाया हुआ है, क्योंकि विकास का नामो-निशान ही नहीं दिखता है।
यह कहानी एक गांव की नहीं, भारत के हजारों गांवों की है। पिछले सत्तर वर्षों में लाखों करोड़ रुपए निवेश किए हैं केंद्र और राज्य सरकारों ने ग्रामीण विकास योजनाओं में। ये योजनाएं गरीबी हटाने के नाम पर बनाई गई हैं। सवाल यह है कि गरीबी अभी तक हटने का नाम क्यों नहीं ले रही? क्या इसलिए कि इन बड़ी-बड़ी योजनाओं से गरीबी हट ही नहीं सकती, क्योंकि ऐसी योजनाएं दूर किसी महानगर में बनती हैं, ऐसे लोगों द्वारा, जो जानते ही नहीं कि इन योजनाओं का हाल जमीनी तौर पर क्या होता है? सो, क्या दिशा बदलने की जरूरत नहीं है अब?

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मनरेगा जैसी योजनाओं को बेकार बताया, लेकिन उसके बाद इन्हीं योजनाओं पर फिर से निवेश किया गया। वित्तमंत्री ने अपने बजट में पिछले सप्ताह मनरेगा में निवेश बढ़ाया, कम नहीं किया। ऐसा क्यों? क्या बेहतर न होता कि जो लाखों-करोड़ रुपए इस योजना पर खर्चे गए हैं, उसे उन सुविधाओं पर लगाया गया होता, जिनका विशेष अभाव है ग्रामीण भारत में? प्रधानमंत्री कई बार रर्बन नाम की नई योजना का जिक्र कर चुके हैं, जो इस मकसद से तैयार की गई है कि ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि इंडिया और भारत के बीच की खाई को मिटाया जाए। अब इसकी आवश्यकता और बढ़ गई है, क्योंकि नोटबंदी के कारण देहातों में लोगों को काफी परेशानी हुई है। इससे भी ज्यादा जरूरत है ग्रामीण विकास को नए सिरे से शुरू करने की।

पुरानी योजनाओं से गरीबों को सिर्फ राहत मिली है थोड़ी-बहुत, गरीबी हटी नहीं है। इस बात का अहसास अब उनको भी होने लगा है, जिनके लिए ये योजनाएं बनाई गई थीं। वे खुद मांग कर रहे हैं उन बेहतर सुविधाओं की, जो वे जानते हैं कि शहरों और कस्बों में रहने वाले लोगों को बहुत पहले मिल चुकी हैं। असली परिवर्तन और असली विकास ग्रामीण भारत में तभी आएगा जब निवेश होना शुरू होगा उन बुनियादी सुविधाओं में, जिनके बिना गरीबी का हटना असंभव है। जहां सड़कें ही नहीं बनी हैं वहां कैसे आएगा विकास या परिवर्तन? दुख की बात तो यह है कि ग्रामीण भारत के लोगों की मांगें इतनी थोड़ी हैं कि हमारे राजनेताओं को शर्म आनी चाहिए कि अभी तक इन मांगों को वे पूरा नहीं कर पाए हैं।  क्या इतना मुश्किल है ग्रामीण भारत में अच्छे स्कूल बनाना? क्या इतना मुश्किल है पीने का पानी उपलब्ध कराना? क्या इतना मुश्किल है पक्की सड़कें बनाना या बिजली उपलब्ध कराना? खैरात बांटने का काम जरूर किया है बड़ी-बड़ी समाज कल्याण योजनाओं ने, लेकिन ग्रामीण भारत के लोग खैरात नहीं मांग रहे हैं, बुनियादी सुविधाएं मांग रहे हैं।

 

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First Published on February 5, 2017 4:14 am

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